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Bhopal Shia Protest on Khamenei Death

खामेनेई के निधन की खबर से भोपाल में उबाल, शिया समुदाय ने निकाला जुलूस, अमेरिका-इजराइल के खिलाफ नारे

ईरान के सुप्रीम लीडर अयोतुल्लाह खामेनेई के निधन की खबर के बाद भोपाल में शिया समुदाय ने श्रद्धांजलि सभा और जुलूस निकाला। लखनऊ और कश्मीर में भी शोक सभाएं, प्रशासन सतर्क।


खामेनेई के निधन की खबर से भोपाल में उबाल शिया समुदाय ने निकाला जुलूस अमेरिका-इजराइल के खिलाफ नारे

Iran Americi-israel War |

भोपाल। इजराइल- अमेरिकी हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई है। निधन की खबर का असर भारत में दिखाई दिया। देशभर में जगह-जगह शिया समुदाय के लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। इसी कड़ी में एमपी की राजधानी भोपाल में भी विरोध जताया गया। शिया मस्जिद में रविवार के दिन जोहर की नमाज के बाद श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई। इसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। इसके बाद उपस्थित लोगों ने जुलूस निकालकर अमेरिका और इजराइल के खिलाफ नारे भी लगाए। इस दौरान शिया समुदाय ने इसे शहादत बताया

वहीं, श्रद्धांजलि सभा को संबोधित करते हुए इमाम बाकर हुसैन ने कहा पूरी दुनिया उस शख्सियत को जानती है, जिसने जुल्म के खिलाफ आवाज उठाई और मजलूमों का साथ दिया। खामेनेई ने अपने जीवन में अत्याचार का विरोध किया और इस्लामी इंकलाब के सिद्धांतों को आगे बढ़ाया। इस दौरान लोगों से एकजुट रहने के साथ सब्र बनाए रखने की अपील की गई। 

देश के अन्य शहरों में भी हुईं सभाएं

मिली जानकारी के अनुसार, भोपाल के अलावा उत्तर प्रदेश के लखनऊ और कश्मीर में भी शोक सभा का आयोजन हुआ। इस दौरान लोगों ने श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान स्थानीय प्रशासन शोक सभाओं के आयोजन के दौरान काफी सतर्क है। फिलहाल सभी जगह स्थिति सामान्य बताई जा रही है।

सालों से थे सर्वोच्च सत्ता पर काबिज

करीब साढ़े तीन दशक तक ईरान की सत्ता का असली केंद्र रहे अयातुल्ला अली खामेनेई का राजनीतिक सफर देश के हालिया इतिहास से गहराई से जुड़ा रहा है। 1989 में रुहोल्लाह खुमैनी के निधन के बाद उन्होंने सर्वोच्च नेता का पद संभाला और तब से ही देश की नीति, सुरक्षा और विदेश संबंधों पर अंतिम निर्णय उन्हीं के हाथ में रहा।

इस्लामिक क्रांति से उभरकर राष्ट्रीय नेतृत्व तक

1979 की इस्लामिक क्रांति ईरान के इतिहास का निर्णायक मोड़ थी। उस दौर में शाह मोहम्मद रजा पहलवी की सत्ता के खिलाफ व्यापक आंदोलन खड़ा हुआ। इसी आंदोलन में खामेनेई भी सक्रिय रहे। क्रांति सफल होने के बाद नई व्यवस्था में उनकी भूमिका लगातार मजबूत होती चली गई।

राष्ट्रपति से सुप्रीम लीडर तक का सफर

क्रांति के दो साल बाद, 1981 में उन्हें ईरान का राष्ट्रपति चुना गया। उन्होंने लगातार दो कार्यकाल पूरे किए और आठ वर्षों तक इस पद पर रहे। उस समय देश ईरान-इराक युद्ध जैसे कठिन दौर से गुजर रहा था, और नेतृत्व की कसौटी भी कड़ी थी। 1989 में जब तत्कालीन सुप्रीम लीडर रुहोल्लाह खुमैनी का निधन हुआ, तब खामेनेई को उनका उत्तराधिकारी घोषित किया गया। इसके साथ ही वे ईरान के सर्वोच्च पद पर आसीन हो गए, जो देश की राजनीतिक और धार्मिक संरचना का सबसे शक्तिशाली पद माना जाता है।

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