जश्न-ए-उर्दू की संध्या में उस्ताद सलीम अल्लाहवाले की प्रस्तुति बनी सांस्कृतिक समरसता का प्रतीक
भोपाल। भारत सरकार द्वारा वंदे मातरम् को अनिवार्य किए जाने के निर्णय के बाद जहाँ कुछ कट्टरपंथी मौलानाओं की तरफ से विरोध के स्वर सुनाई दिए, वहीं भोपाल की सरजमीं से एक ऐसा उत्तर सामने आया जिसने बहस को सांस्कृतिक धरातल पर ला खड़ा किया है। यह उत्तर राजनीति की भाषा में नहीं, बल्कि सुरों की भाषा में दिया गया।
1 फरवरी को आयोजित ‘जश्न-ए-उर्दू’ कार्यक्रम में प्रख्यात गायक एवं तबला वादक उस्ताद सलीम अल्लाहवाले ने जब कव्वाली अंदाज़ में वंदे मातरम् का गायन आरंभ किया, तो सभागार एक सुरमयी एकता में डूब गया। उनकी प्रस्तुति में केवल संगीत नहीं, भावों की निर्मलता थी। हर आलाप में मातृभूमि के प्रति आदर झलक रहा था। श्रोता गीत नहीं, एक सांस्कृतिक सेतु का अनुभव कर रहे थे, जहाँ भाषा और पंथ की सीमाएँ गौण हो जाती हैं।
प्रख्यात गायक और तबला वादक नवाज उस्ताद सलीम अल्लाह वाले
उस्ताद सलीम अल्लाहवाले ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “मैं सबसे पहले एक कलाकार हूँ। कला का धर्म सौंदर्य और सत्य है। जब हम राग शंकरा की बंदिश ‘दर्शन देओ शंकर महादेव’ पूरी श्रद्धा से गाते हैं, तो वंदे मातरम् गाने में कैसी आपत्ति? भारतीय संगीत परंपरा में असंख्य रचनाएँ देवी-देवताओं की स्तुति में हैं, जिन्हें मुस्लिम कलाकार भी गाते हैं। उसी तरह सूफी संतों की रचनाएँ सब मिलकर गाते हैं। यही हमारी साझा विरासत है।” उन्होंने आगे कहा कि देशप्रेम किसी एक समुदाय की बपौती नहीं, बल्कि सभी भारतवासियों की साझी भावना है। उस्ताद ने यह भी स्मरण कराया कि 25 दिसंबर 2024 को ग्वालियर के तानसेन समारोह में तबला वादन के विश्व रिकॉर्ड के अवसर पर भी वंदे मातरम् की प्रस्तुति हुई थी, जो व्यापक रूप से सराही गई।इस प्रयास में भी वे शामिल थे।
नुशरत मेहंदी, निदेशक, मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी
कार्यक्रम की आयोजक और मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी की निदेशक नुशरत मेहंदी ने बताया कि कार्यक्रम की थीम थी - “आत्मबोध से विश्वबोध तक: वंदे मातरम् की साहित्यिक निष्पत्ति।” उन्होंने स्वयं उस्ताद सलीम से अनुरोध किया था कि वे इसे कव्वाली शैली में प्रस्तुत करें। देशभक्ति के कुछ शेर भी गीत के बीच पिरोए गए, जिससे प्रस्तुति और प्रभावशाली बनी।
उन्होंने कहा, “कार्यक्रम मुस्लिम बहुल क्षेत्र में था और इसे पूरे उत्साह से स्वीकार किया गया। जब हम ‘मादरे-वतन’ कह सकते हैं, तो ‘वंदे मातरम्’ कहने में क्या संकोच? भाव एक ही है - मातृभूमि के प्रति सम्मान।” संस्कृत की विद्यार्थी रहीं नुशरत मेहंदी ने यह भी स्पष्ट किया कि वंदे मातरम् में उन्हें कोई आपत्तिजनक तत्व नहीं दिखता। उनके अनुसार, यह गीत भारतीय साहित्यिक और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है।
भोपाल में आयोजित जश्न-ए-उर्दू
भोपाल की इस संध्या ने यह संदेश दिया कि जब सुर सच्चे हों और भावना निर्मल, तब विवादों की तीव्रता स्वयं क्षीण पड़ जाती है। गंगा-जमुनी तहज़ीब की जीवंत परंपरा आज भी हमारे सांस्कृतिक जीवन में धड़कती है। विरोध के स्वरों के बीच भोपाल से उठी यह सुरलहरी मानो कह रही थी - राष्ट्रप्रेम विभाजन नहीं, मिलन की अनुभूति है।