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Bhopal Toilet Planning Fail

भोपाल में ‘दीवार के पीछे’ बंद टॉयलेट! लाखों खर्च, जनता के लिए जीरो उपयोग; कौन जिम्मेदार?

भोपाल के ऐशबाग में लाखों खर्च कर बना पब्लिक टॉयलेट रेलवे दीवार में फंस गया। न इस्तेमाल, न पहुंच—जानिए कैसे प्लानिंग की गलती बनी जनता के पैसे की बर्बादी।


भोपाल में ‘दीवार के पीछे’ बंद टॉयलेट लाखों खर्च जनता के लिए जीरो उपयोग कौन जिम्मेदार

MP News |

भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के ऐशबाग इलाके में एक और अजीबोगरीब निर्माण सामने आया है। लाखों रुपये खर्च कर बनाया गया पब्लिक टॉयलेट अब पूरी तरह बेकार साबित हो रहा है। कारण चौंकाने वाला है। टॉयलेट के ठीक सामने रेलवे ने दीवार खड़ी कर दी, जिससे उसका रास्ता ही बंद हो गया। पहले 90-डिग्री फ्लाईओवर पर सवाल उठे थे, अब यह नया मामला शहर की प्लानिंग पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

चेतावनी के बावजूद हुआ निर्माण

स्थानीय लोगों के मुताबिक, जहां टॉयलेट बनाया गया, वहां पहले कचरा जमा होता था। नगर निगम ने सफाई के उद्देश्य से यहां निर्माण शुरू किया। लेकिन शुरुआत में ही व्यापारियों और रहवासियों ने चेतावनी दी थी कि यह जमीन रेलवे की है। लोगों ने सुझाव दिया कि पास की निगम की जमीन पर टॉयलेट बनाया जाए, लेकिन अधिकारियों ने इसे नजरअंदाज कर दिया।

रेलवे की दीवार ने बंद किया रास्ता

पिछले दो हफ्तों में रेलवे ने अपनी जमीन को सुरक्षित करने के लिए वहां पक्की दीवार खड़ी कर दी। इसका सीधा असर यह हुआ कि टॉयलेट पूरी तरह अंदर बंद हो गया और उसकी एंट्री खत्म हो गई। अब यह ढांचा एक बंद डिब्बे जैसा दिखता है, जिसका कोई उपयोग नहीं हो सकता।

जनता का पैसा, लेकिन फायदा शून्य

स्थानीय व्यापारियों ने इस पूरे मामले को सीधी लापरवाही बताया है। उनका कहना है कि जब जमीन निगम की थी ही नहीं, तो वहां निर्माण क्यों कराया गया। अब यह स्थिति जनता के टैक्स के पैसे की बर्बादी का उदाहरण बन गई है।

अफसरों की चुप्पी और जांच का इंतजार

इस पूरे मामले पर जिम्मेदार अधिकारियों की तरफ से कोई स्पष्ट जवाब नहीं आया है। वार्ड पार्षद और संबंधित इंजीनियरों ने चुप्पी साध रखी है, जबकि एक अधिकारी ने जांच की बात कही है। इससे साफ है कि जवाबदेही तय होने में अभी वक्त लग सकता है।

ऐशबाग में प्लानिंग पर लगातार सवाल

ऐशबाग पहले से ही अधूरे और विवादित प्रोजेक्ट्स के लिए चर्चा में रहा है। 90-डिग्री फ्लाईओवर के बाद अब यह टॉयलेट भी खराब प्लानिंग का नया उदाहरण बन गया है। यह मामला दिखाता है कि बिना समन्वय और दूरदर्शिता के लिए गए फैसले कैसे जमीन पर फेल हो जाते हैं और आम जनता को नुकसान उठाना पड़ता है।

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