धार की भोजशाला में ASI सर्वे में 244 शिलालेखों का अध्ययन। कई अक्षर जानबूझकर मिटाए गए, 50 नए शिलालेख खंड और प्राचीन शिल्पकारों के नाम भी सामने आए।
धार। मध्यप्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला एक बार फिर इतिहास और विवाद के केंद्र में आ गई है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की मैसूर स्थित एपिग्राफी शाखा ने वर्ष 2024 में यहां किए गए सर्वे में 244 शिलालेखों का अध्ययन किया है। इन शिलालेखों को 12वीं से 16वीं शताब्दी के बीच का माना जा रहा है। खास बात यह है कि इनमें नागरी लिपि में संस्कृत, प्राकृत और स्थानीय बोलियों में रचनाएं अंकित मिली हैं।
सर्वे के दौरान एक चौंकाने वाली बात सामने आई है। भोजशाला के कई शिलालेखों के अक्षरों को जानबूझकर छेनी से मिटाया गया और बाद में उन पत्थरों को भवन के अलग-अलग हिस्सों में दोबारा इस्तेमाल कर लिया गया।
हाई कोर्ट में पेश हुई सर्वे रिपोर्ट
इन सभी निष्कर्षों का उल्लेख एएसआइ की उस रिपोर्ट में किया गया है जो मध्यप्रदेश हाई कोर्ट में प्रस्तुत की गई है। इस मामले में अगली सुनवाई 16 मार्च को होनी है। याचिकाकर्ता आशीष गोयल के अनुसार अभिलेखविदों ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि ये पत्थर कभी बड़े शिलालेखों का हिस्सा रहे होंगे। इन पर साहित्यिक रचनाएं और ऐतिहासिक विवरण अंकित थे। अक्षरों को जानबूझकर मिटाना मध्यकालीन सांस्कृतिक धरोहर को नुकसान पहुंचाने जैसा माना जा रहा है।
सर्वे में मिले 50 नए शिलालेख खंड
हालिया सर्वे के दौरान विशेषज्ञों ने 50 नए शिलालेख खंड और एक टूटी हुई प्रतिमा के आसन के टुकड़े का भी अध्ययन किया। इन अवशेषों से यह संकेत मिलता है कि भोजशाला परिसर कभी साहित्य, शिक्षा और सांस्कृतिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र रहा होगा।
भोजशाला में मिले महत्वपूर्ण शिलालेख
सर्वे में तीन शिलालेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण बताए गए हैं। पारिजातमंजरी नाटिका शिलालेख- इस शिलालेख से पता चलता है कि ‘पारिजातमंजरी’ नामक नाटक की रचना धार के राजा अर्जुनवर्मन के गुरु मदन ने की थी। इसका पहला मंचन ‘शारदा देवी के सदन’ में हुआ था। अवनिकूर्मशतम शिलालेख-इसमें प्राकृत भाषा के दो काव्य मिले हैं, जिनमें प्रत्येक में 109 श्लोक हैं। माना जाता है कि इनकी रचना सम्राट भोजदेव ने की थी। नागबंध शिलालेख- यह शिलालेख व्याकरण और शिक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसमें परमार वंश के राजा नरवर्मन का उल्लेख मिलता है।
सदियों पुराने शिल्पकारों के नाम भी सामने आए
सर्वे के दौरान 34 छोटे उत्कीर्ण नाम भी सामने आए हैं। इनमें 13वीं सदी के शिल्पकार मदन, माधव और जकिजु के नाम दर्ज हैं। वहीं 16वीं सदी के समय के मोहिला, कामदेव, सोमदेव, रणपाल और परमार सहित कई कारीगरों के नाम भी मिले हैं। इतिहासकारों के मुताबिक ये नाम उन शिल्पकारों की पहचान हैं, जो सदियों पहले इस धरोहर के निर्माण और सजावट में लगे थे।
पहला अध्ययन 1951 में हुआ था
भोजशाला से जुड़े शिलालेखों का पहला व्यवस्थित अध्ययन 1951 में किया गया था। इसके बाद 1970, 1972, 1978, 1989 और 1994 में भी सर्वे हुए। इन सर्वे रिपोर्टों के आधार पर अब तक 135 शिलालेखों की प्रतिलिपि तैयार की जा चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल पत्थरों का अध्ययन नहीं है, बल्कि उस सांस्कृतिक स्मृति को फिर से सामने लाने का प्रयास है, जिसे समय के साथ मिटाने की कोशिश की गई थी।