अमित चौहान, रायपुर। छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा, सक्ती, रायगढ़ आदि क्षेत्रों में वर्षों से ‘भगवान तिहार’ मनाने की परंपरा चली आ रही है। इस अनुष्ठान को पूरे गांव के लोग मिलजुलकर करते हैं। इसमें सभी जाति-वर्गों की समान सहभागिता रहती है। इसका आयोजन श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के बाद फसलों में पोटरी आने से पहले किया जाता है। इस आयोजन को ‘गर्भाती’ के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि कुछ गांवों में बलि देने की प्रथा रही है। हालांकि सक्ती जिले के चरौदा, अड़भार, मालखरौदा क्षेत्रों में इसे पूरी तरह सादे रूप में मनाया जाता है। यहां प्राकृतिक रूप से यज्ञ व प्रकृति को समर्पित विधान का अनुसरण किया जाता है।
इस तरह मनाया जाता है भगवान तिहार
ग्राम चरौदा के धरम लाल चौहान ने बताया कि हमारे पूर्वज आदिकाल से इस अनुष्ठान को करते आ रहे हैं। सालभर में केवल एक बार भगवान तिहार का आयोजन होता है। गांव के हर घर से चंदा लेकर सामूहिक यज्ञ-पूजा की जाती है। गांव के भीतर बीच में एक निश्चित स्थान पर हर साल आयोजन होता है। एक जगह यज्ञकुंड तैयार किया जाता है। यज्ञ के दौरान भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का आह्वान किया जाता है। हवन के दौरान फल, नारियल, दूध, धूप आदि का प्रयोग किया जाता है। किसी साल अगर गांव के किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाए तो उस साल यह आयोजन नहीं होता है।
दु:ख-बीमारी से मुक्ति और अच्छी फसल की कामना
गांव में किसी प्रकार की दु:ख-बीमारी न आए और खेतों में अच्छी फसल हो, इसकी कामना के साथ अनुष्ठान किया जाता है। अनुष्ठान के पूर्व गांव का बैगा पूरे गांव की कुलदेवी-कुलदेवता की पूजा करता है। इसमें ठाकुरदेव, बूढ़ादेव, बूढ़ीमाई का आशीर्वाद लिया जाता है। इसके बाद गांव का मुख्य पुरोहित आयोजन को पूर्ण कराता है। यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। इस अनुष्ठान का आयोजन कोई निजी तौर पर नहीं करा सकता।
हर घर से ‘जी-बरार’ की परंपरा
गांव की लुकिया देवी ने बताया कि आयोजन के लिए हर घर से ‘जी-बरार’ लिया जाता है। अर्थात् घर में जितने सदस्य होते हैं, उनके एक-एक के हिसाब से। इस साल चरौदा में सात रुपए एक व्यक्ति लिया गया। इस चंदे से ही पूरा अनुष्ठान पूरा कराया जाता है।
खेत में नारियल व तालाब में चीला
यज्ञ-हवन पूरा होने के बाद तैयार कुंड में सभी पूजा की वस्तुओं को गर्भ में डाल दिया जाता है। इसके बाद किसान अपने-अपने खेतों में जाकर नारियल फोड़ते हैं। महिलाएं चीला बनाकर तालाबों में विसर्जित करती हैं, ताकि दूसरे जीव-जंतु भी भोजन पा सकें। यह पूरा आयोजन सामाजिक सौहार्द, समरसता व प्रकृति के साथ तारतम्य स्थापित करते हुए अपने आराध्य और धरती माता के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का अवसर होता है। इस तिहार के माध्यम से भगवान विष्णु, जो सृष्टि के पालनहार हैं, उनके प्रति भी विशेष भक्ति प्रदर्शित की जाती है।
सुख-समृद्धि की कामना
आखिर में गांव के सभी घरों में समान रूप से प्रसाद वितरण किया जाता है, जिसमें नारियल, लाई, बूंदी बांटी जाती है। इस दिन गांव में खेती-किसानी, निर्माण कार्य, मजदूरी जैसे सभी तरह के काम बंद रहते हैं। रात्रि में रामायण पाठ होता है, जिसमें पूरे गांव के लोग सहभागिता निभाते हैं। इस दिन लोग घरों से लेकर गांव के मुख्य व सार्वजनिक स्थानों में आम के पत्तों का तोरण टांगते हैं। गांव के सरपंच शंकर सिदार का कहना है कि यह तिहार गांव में एकजुटता व भाईचारे का प्रतीक है। गांव के पंडित संतोष तिवारी ने कहा कि सभी लोग मिलजुलकर इस आयोजन को करते आ रहे हैं और इस दिन व्यक्तिगत कामना न करके सभी की सुख-समृद्धि व अच्छे स्वास्थ्य की कामना की जाती है। आयोजन में गांव के गौटिया छेदी लाल यादव, पं. संजय पांडे, राकेश यादव, संजय यादव, फूलसाय बरेठ आदि उपस्थित रहे।