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माओवादी भूपति का बड़ा खुलासा: बस्तर में कांग्रेस का चुनावी माहौल कैसे बनाते थे?

माओवादी भूपति का बड़ा खुलासा: बस्तर में कांग्रेस का चुनावी माहौल कैसे बनाते थे?

पूर्व माओवादी भूपति ने बताया कैसे बस्तर में चुनावी माहौल बनता था, कैसे चलता था माओवादी नेटवर्क। पूरा सच इस रिपोर्ट में।

माओवादी भूपति का बड़ा खुलासा बस्तर में कांग्रेस का चुनावी माहौल कैसे बनाते थे

बस्तर… वो इलाका जहां जंगल की हर सरसराहट में एक बेचैनी होती है। जहां दिन ढलते ही सन्नाटा भी पूछता है कितनी देर और? इसी डर के बीच दशकों तक एक नाम चलता था मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ़ भूपति उर्फ़ सोनू दादा। बस्तर के घने जंगलों में क्या होता था, कैसे माओवादी चुनावों में माहौल बनाते थे, कैसे ग्रामीणों पर दबाव डाला जाता था, और संगठन के भीतर किन नियमों से प्लाटून से लेकर एम्बुश तैयार होते थे, इन सब पर भूपति की खुलकर बातचीत चौंकाती भी है और सोचने पर मजबूर भी करती है। हथियार छोड़ चुके भूपति ने The Narrative के पोडकास्ट में वो सच सामने रखा है जिसका सिर्फ़ अंदाजा लगाया जाता था।

माओवादी राजनीति: जंगल से चुनावी बूथ तक

भूपति ने स्वीकार किया कि माओवादी कई बार एक पार्टी को टार्गेट करके अप्रत्यक्ष रूप से दूसरी पार्टी को चुनावी लाभ दिलाते थे। यानी, “भाजपा को मार भगाओ” का अर्थ था दूसरी पार्टी को वोट जाना ही है। यह पहली बार है जब कोई टॉप-कमांडर इस तरह खुलकर मानता है कि बस्तर की चुनावी राजनीति पर माओवादियों का सीधा असर था।

क्या माओवादी विचारधारा लोकतंत्र से हार गई?

भूपति का जवाब बेहद दिलचस्प है उन्होंने कहा कि संघर्ष जारी रहेगा, लेकिन अब कानूनी रास्ते से, क्योंकि दुनिया बदल चुकी है, भारत बदल चुका है, और हमारी प्रैक्टिस पीछे छूट गई थी। उन्होंने लेनिन और माओ की रणनीतियों का हवाला देते हुए माना कि बंदूक की राजनीति अब जनता से दूरी बढ़ा रही थी, न कि समाधान दे रही थी।

विकास, सड़कें और संचार ने माओवादी मॉडल को तोड़ दिया

भूपति ने स्वीकार किया कि जिस लंबे जनयुद्ध की अवधारणा पर संगठन चलता था, वह आज के भारत में प्रासंगिक नहीं रही। गांवों तक सड़कें, मोबाइल नेटवर्क और सरकारी योजनाओं ने उस खाली जगह को भर दिया जहां कभी माओवादी विचारधारा अपना आधार बनाती थी।

अर्बन नेटवर्क का सच

अर्बन नक्सल शब्द पर भूपति ने कहा अर्बन नेटवर्क अब 15 साल से लगभग खत्म है। जो लोग कहते हैं, वही जानते हैं… हमारे पास वह संरचना अब बची ही नहीं।

सलवा जुडूम और माओवादी भर्ती

भूपति ने माना कि सलवा जुडूम के दौरान माओवादी भर्ती में जबरदस्त तेजी आई। क्योंकि संघर्ष का माहौल ऐसा बन गया था जहां हथियार उठाने के अलावा विकल्प दिखता ही नहीं था।

स्थानीय नेतृत्व क्यों नहीं उभर सका?

भूपति ने माना कि टॉप लीडरशिप में बस्तर का जनजाति से नहीं रहा हालांकि उन्होंने उदाहरण भी दिए, लेकिन वास्तविक शीर्ष कमान में किसी बस्तरिया जनजाति की मौजूदगी लगभग शून्य ही रही।