बरगी बांध हादसे की मार्मिक कहानी मां-बेटे को एक ही कब्र में दफनाया गया। ममता का ऐसा बंधन जिसने मौत के बाद भी साथ नहीं छोड़ा।
मध्यप्रदेश के जबलपुर स्थित बरगी बांध में हुए दर्दनाक क्रूज हादसे ने न केवल कई जिंदगियां छीन लीं, बल्कि एक ऐसी कहानी भी छोड़ गया जिसे सुनकर हर आंख नम हो जाए। यह कहानी है मां की ममता की, जो मौत के मुंह में भी अपने बच्चे को छोड़ने को तैयार नहीं हुई।
हादसे में जान गंवाने वाले मसीह परिवार के तीन सदस्य मधुर मसीह, उनकी बेटी मैरिना और चार वर्षीय नाती त्रिशान के शव जब शनिवार को दिल्ली पहुंचे, तो मायापुरी की खजान बस्ती की तंग गलियां मातम में डूब गईं। एम्बुलेंस के पहुंचते ही चीख-पुकार और सिसकियों ने माहौल को और भारी कर दिया। हर आंख नम थी, हर चेहरा गमगीन था।
मां ने जिस तरह अपनी अंतिम सांस तक ही नहीं, बल्कि मरने के बाद भी अपने मासूम को सीने से चिपकाए रखा, उस मार्मिक दृश्य को ध्यान में रखते हुए परिवार ने भी ममता के इस अटूट बंधन को भावुक विदाई देने का फैसला लिया।
सदमे में डूबा है परिवार
हादसे में जीवित बचे परिवार के सदस्य जूलियस मसीह, दामाद प्रदीप और छोटी बच्ची सिया अब भी गहरे सदमे में हैं। अपनों को अपनी आंखों के सामने डूबते देखने का दर्द इतना गहरा है कि शब्द भी उनका साथ नहीं दे पा रहे हैं।
जब लोगों ने उन्हें सांत्वना देने की कोशिश की, तो उन्होंने बस इतना ही कहा, “हमें शोक मनाने दीजिए, बाद में बात करेंगे।” यह एक वाक्य उनके भीतर के अथाह दुख को बयां करने के लिए काफी था।
ममता के अटूट बंधन को एक भावुक विदाई देने के लिए परिवार ने मां और बेटे को एक ही कब्र में दफनाने का फैसला लिया। द्वारका स्थित ईसाई कब्रिस्तान में मां और बेटे को एक साथ दफनाया गया, ताकि अनंत यात्रा में भी बेटा अपनी मां की गोद में सुरक्षित रह सके।
अंतिम संस्कार के दौरान माहौल बेहद भावुक था। पादरी की प्रार्थनाओं और धार्मिक रीति-रिवाजों के बीच जब परिजनों ने कांपते हाथों से ताबूतों पर मिट्टी डाली, तो पूरा कब्रिस्तान सिसकियों से गूंज उठा। वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम थीं और हर दिल में एक ही दुआ थी ऐसा दुख किसी को न मिले।