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थाने में दफन हुआ कानून...जल गई एक बेटी! नहीं जागी पुलिस... अब जांच का नाटक

थाने में दफन हुआ कानून...जल गई एक बेटी! नहीं जागी पुलिस... अब जांच का नाटक

थाने में दफन हुआ कानूनजल गई एक बेटी नहीं जागी पुलिस अब जांच का नाटक

अयोध्या। रामजन्मभूमि क्षेत्र में खुद को आग लगाने वाली 17 वर्षीय किशोरी ने बुधवार सुबह मेडिकल कॉलेज में दम तोड़ दिया। इस दर्दनाक घटना के बाद सवाल अब सिर्फ मौत पर नहीं, बल्कि पुलिस की लापरवाह कार्यशैली पर भी उठ रहे हैं। नियमों का खुला उल्लंघन कर नाबालिग को सीधे परिजनों को सौंपने वाली पुलिस अब कटघरे में है।

पुलिस का दावा है कि परिजनों की इच्छा पर कार्रवाई नहीं की गई, लेकिन कानून के मुताबिक पुलिस को किशोरी को वन स्टॉप सेंटर भेजकर बाल कल्याण समिति के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए था। न कोई केस, न काउंसलिंग, न मानसिक स्थिति का मूल्यांकन—सब कुछ दरकिनार कर दिया गया और आखिरकार किशोरी की जीवनलीला समाप्त हो गई।

सीओ आशुतोष तिवारी खुद मानते हैं कि प्रक्रियागत चूक हुई है और जांच की जाएगी। किशोरी के मोबाइल संवादों की सीडीआर खंगालने की बात कही जा रही है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या जांच का दायरा पुलिस की लापरवाही तक भी जाएगा?

इनायतनगर से रामजन्मभूमि तक...थानाध्यक्ष अभिमन्यु शुक्ला की कार्यशैली सवालों में

पूर्व में इनायतनगर थाने पर भी पोक्सो एक्ट में नियमों के उल्लंघन को लेकर उनकी कार्यशैली पर सवाल उठे थे। महिला एवं बाल सुरक्षा संगठन ने इसकी शिकायत सीधे एसएसपी से की थी। अब रामजन्मभूमि थाने पर भी वही लापरवाही दोहराई गई।

बाल कल्याण समिति ने की कार्रवाई की मांग

सीडब्लूसी के अध्यक्ष सर्वेश अवस्थी ने एसएसपी को पत्र भेजकर नियमों के उल्लंघन की जांच और कड़ी कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने कहा, “किशोरी को परिजनों को सौंपना नियमों के विरुद्ध था। ऐसे पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई न हुई तो बाल हितों की रक्षा नामुमकिन है।”

जब कानून रक्षक ही कानून की राह से भटकें, तो मासूमों की जान पर बन आती है। एक चूक ने एक जान ले ली। क्या अब कोई ज़िम्मेदारी तय होगी, या फिर यह मौत भी पुलिस डायरी में एक ‘औपचारिक केस नंबर’ बनकर रह जाएगी?

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