अंबिकापुर के करजी गांव में होलिका दहन के बाद ग्रामीण दहकते अंगारों पर नंगे पांव चलते हैं। वर्षों पुरानी इस परंपरा को लोग देवी की कृपा और अटूट आस्था से जोड़ते हैं।
रायपुरः होली का नाम आते ही रंग गुलाल और मस्ती की तस्वीर सामने आती है। लेकिन छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, आस्था और साहस की परीक्षा भी है। यहां होलिका दहन के बाद जब लकड़ियां अंगारों में बदल जाती हैं। फिर ग्रामीण उन्हीं दहकते कोयलों पर नंगे पांव चलकर अपनी श्रद्धा जताते हैं। हैरानी की बात यह कि उनके पैरों में छाले तक नहीं पड़ते।
अंबिकापुर से लगे दरिमा थाना क्षेत्र के करजी गांव में यह परंपरा आज भी उतनी ही मजबूती से निभाई जाती है, जितनी वर्षों पहले निभाई जाती थी।
होलिका दहन के बाद शुरू होती है असली परंपरा
गांव करजी में होली की रात विधि-विधान से होलिका दहन किया जाता है। जैसे ही आग शांत होकर लाल-लाल अंगारों में बदलती है, उन्हें समतल कर एक परत बिछाई जाती है। फिर गांव के पुरुष एक-एक कर नंगे पांव उन पर चलते हैं। दूर-दूर से लोग यह दृश्य देखने पहुंचते हैं। कुछ के चेहरे पर कौतूहल, कुछ के मन में डर, लेकिन ग्रामीणों के चेहरे पर अटूट विश्वास साफ झलकता है। उनका कहना है 'सच्ची श्रद्धा हो तो देवी रक्षा करती हैं।”
न छाले, न जलन बस आस्था का भरोसा
अंगारों पर चलने के बाद भी किसी के पैरों में जलन या फफोले नहीं पड़ते। ग्रामीण इसे देवी की कृपा मानते हैं। यह सिलसिला देर रात तक चलता है और पूरा माहौल ढोल-नगाड़ों की थाप और जयकारों से गूंजता रहता है। यह परंपरा सिर्फ साहस का प्रदर्शन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सामाजिक एकजुटता का भी प्रतीक है।
जनजातीय संस्कृति की अलग पहचान
सरगुजा अंचल की होली केवल अंगारों तक सीमित नहीं है। कोड़ाकू जनजाति में जली हुई सेमर की ठूंठ पर लगभग 50 मीटर दूर से पत्थर और तीर-धनुष से निशाना लगाने की परंपरा भी है। जो निशाना साध ले, उसे इनाम में महुआ के दो पेड़ दिए जाते हैं। फागुन महीने भर ‘होरी’ गीतों की गूंज रहती है। झांझ, मंजीरा और मांदर की थाप पर पूरा गांव रंग और रस में डूब जाता है। यहां होली सिर्फ एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि पूरे महीने चलने वाला लोक उत्सव है।
परंपरा, विश्वास और उत्सव का संगम
अंबिकापुर की यह अनोखी होली दिखाती है कि आधुनिकता के दौर में भी परंपराएं जिंदा हैं। जहां शहरों में होली रंगों तक सिमटती जा रही है, वहीं यहां आस्था की आंच पर विश्वास तपता है, और हर साल पहले से ज्यादा मजबूत होकर निकलता है।