अदालती आदेशों की अनदेखी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि लंबित याचिका किसी को आदेश न मानने का अधिकार नहीं देती।
अदालती आदेशों की अवहेलना को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि किसी भी पक्ष को यह छूट नहीं दी जा सकती कि वह अदालत के आदेश को अपनी सुविधा के हिसाब से माने या नजरअंदाज कर दे। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने न्यायिक व्यवस्था पर बढ़ते दबाव का भी जिक्र किया। अदालत ने कहा कि मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन इससे आदेशों की बाध्यता कम नहीं हो जाती। यह टिप्पणी एक अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जहां अदालत के आदेश के बावजूद वर्षों तक उसका पालन नहीं किया गया था।
अदालतों पर बढ़ते बोझ की तस्वीर
मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट जैसे संवैधानिक न्यायालयों में एक-एक जज के सामने कई बार 400 से लेकर 800 से अधिक मामले प्रतिदिन सूचीबद्ध होते हैं। ऐसे में मुकदमों के अंतिम निपटारे में समय लगना स्वाभाविक है। कोर्ट ने कहा कि समाज अक्सर न्यायाधीशों से सुपरह्यूमन या मशीन जैसी कार्यक्षमता की उम्मीद करता है, जबकि वास्तविकता यह है कि सीमित संसाधनों और भारी कार्यभार के बीच न्यायिक प्रक्रिया संचालित होती है।
आदेश मानना विकल्प नहीं
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी आदेश के खिलाफ आवेदन दायर कर देने भर से उसका प्रभाव खत्म नहीं हो जाता। जब तक किसी सक्षम अदालत द्वारा आदेश को बदला या निरस्त नहीं किया जाता, तब तक उसका पालन करना अनिवार्य है। कोर्ट ने कहा कि यदि लोगों को अपनी मर्जी से यह तय करने की छूट मिल जाए कि कौन सा आदेश मानना है और कौन सा नहीं, तो न्याय व्यवस्था की बुनियाद कमजोर पड़ जाएगी।
राज्य सरकार के जवाब पर जताई नाराजगी
सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से कहा गया कि संबंधित आदेश के खिलाफ आवेदन लंबित होने के कारण उसका पालन नहीं किया गया। इस दलील पर अदालत ने कड़ी आपत्ति दर्ज की। कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक अदालत का आदेश कोई सलाह नहीं होता और न ही ऐसा दस्तावेज जिसे सुविधानुसार अलग रख दिया जाए। उसके पीछे संविधान की शक्ति और कानून के शासन की पूरी व्यवस्था खड़ी होती है।
चार साल से लंबित था आदेश
विवाद एक शिक्षक के वेतन से जुड़े मामले से जुड़ा था। आरोप था कि गाजीपुर के जिला विद्यालय निरीक्षक ने अप्रैल 2022 में दिए गए अदालती आदेश को लागू नहीं किया। रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों को देखते हुए अदालत ने माना कि आदेश के अनुपालन में अनावश्यक देरी हुई है। न्यायालय ने कहा कि इतने लंबे समय तक आदेश लागू न होना गंभीर विषय है।
महात्मा गांधी के विचार का भी जिक्र
सुनवाई के दौरान अदालत ने महात्मा गांधी की पुस्तक 'सत्य के साथ मेरे प्रयोग' का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि सम्मान और अधिकार तभी कायम रहते हैं जब उन्हें व्यवहार में भी स्वीकार किया जाए। बेंच ने टिप्पणी की कि यदि अदालतें अपने आदेशों की अवहेलना पर कार्रवाई न करें, तो इससे न्यायपालिका की संस्थागत साख प्रभावित होती है और कानून के शासन पर भी असर पड़ता है।
अधिकारी को अवमानना का दोषी माना
चार वर्षों तक आदेश का पालन न होने को गंभीर मानते हुए अदालत ने जिला विद्यालय निरीक्षक को प्रथम दृष्टया अवमानना का दोषी माना है। मामले में 8 जुलाई को आरोप तय किए जाएंगे। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित अधिकारी अब भी वर्ष 2022 के आदेश का पालन कर सकते हैं। ऐसा करने पर उनके लिए अवमानना कार्यवाही में राहत की संभावना बनी रह सकती है।