सतना के एयरोस्पेस इंजीनियर रत्नेंद्र सिंह भी रहे। वह बीते साढ़े चार वर्षों से विक्रम-1 की सफलता के लिए टीम के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे थे।
Engineer Ratnendra Singh: रॉकेट का ब्रेन कंट्रोल कर रहा था सतना का युवा एयरोस्पेस इंजीनियर |
अमन शुक्ला, सतना: देश का पहला प्राइवेट रॉकेट स्काईरूट एयरोस्पेस का विक्रम-1 सफलता पूर्वक प्रक्षेपित किया गया। प्रक्षेपण आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (एसडीएससी-शार) के फर्स्ट लॉन्च पैड से किया गया। विक्रम-1 के सफल प्रक्षेपण में यूं तो स्काईरूट की पूरी टीम का योगदान रहा, लेकिन इस गौरवशाली क्षण का साक्षी सतना के एयरोस्पेस इंजीनियर रत्नेंद्र सिंह भी रहे। वह बीते साढ़े चार वर्षों से विक्रम-1 की सफलता के लिए टीम के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे थे। कहा जाता है कि विक्रम-1 के हर मूवमेंट को वही गाइड कर रहे थे। उन्होंने विक्रम-1 के ब्रेन को कंट्रोल करते हुए उसे निर्धारित ऑर्बिट तक पहुंचाया।
2022 से कर रहे थे विक्रम-1 पर काम
नव स्वदेश से चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि रॉकेट के फ्यूल, दिशा, जीएनसी (गाइडेंस, नेविगेशन एंड कंट्रोल), एल्गोरिद्म डिजाइन करना तथा ऑर्बिट को वेरिफाई करने की जिम्मेदारी कंपनी की ओर से उन्हें दी गई थी। वर्ष 2022 से वह लगातार विक्रम-1 प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। 18 जुलाई 2026 को यह प्रोजेक्ट अपनी सफलता तक पहुंचा। उन्होंने बताया कि उनकी सिमुलेशन टीम में तीन अन्य लोग भी काम कर रहे थे।
टीवी पर लॉन्चिंग देखते हुए बढ़ा रुझान
रत्नेंद्र सिंह एयरोस्पेस इंजीनियर हैं। उन्होंने एमटेक की डिग्री आईआईएसटी (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी), तिरुवनंतपुरम से पूरी की। हालांकि उनके अंदर इस क्षेत्र में काम करने की इच्छा बचपन में ही जागृत हो चुकी थी। कुछ बड़े हुए तो कल्पना चावला को देखकर यह इच्छा और मजबूत हुई।
कक्षा तीसरी से जागृत हुई इच्छा
चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि जब वे कक्षा तीसरी में पढ़ते थे, तब उन्होंने टीवी पर रॉकेट की लॉन्चिंग देखी। उसी दौरान उनके अंदर इस क्षेत्र में काम करने की इच्छा जागृत हुई। आर्मी स्कूल से स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने देहरादून के कॉलेज से बीटेक किया और वर्ष 2015 में मैकेनिकल इंजीनियर बने। इंजीनियरिंग के साथ ही निजी क्षेत्र में नौकरी शुरू की, लेकिन करीब एक वर्ष बाद नौकरी छोड़ दी। उनके मन में स्पेस सेक्टर में काम करने की ललक थी, लिहाजा उन्होंने एमटेक में प्रवेश लिया और एयरोस्पेस इंजीनियर बन गए। उनके पिता चाहते थे कि बेटा यूपीएससी क्रैक कर आईएएस अधिकारी बने, लेकिन उन्होंने अपने मन की बात सुनी और आज पूरा देश उनकी इस सफलता पर गौरवान्वित है।
स्पेस के लिए रेलवे की नौकरी छोड़ी
उन्होंने चर्चा के दौरान बताया कि पिता चाहते थे कि वे सिविल सेवा में जाएं। इसके लिए प्रयास भी किए, लेकिन मन मानने को तैयार नहीं था। यही कारण रहा कि उन्होंने रेलवे में इंजीनियर की नौकरी ज्वाइन नहीं की। निजी क्षेत्र के अच्छे पैकेज भी छोड़ दिए। एमटेक पूरा करने के बाद उन्हें निजी क्षेत्र की कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस में काम करने का अवसर मिला।
विक्रम-1 की सफलता के बाद उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि जीएनसी एवं फ्लाइट डायनेमिक्स इंजीनियर के तौर पर यहां का कार्य वातावरण बेहद सहयोगात्मक, तेज गति वाला और बौद्धिक रूप से प्रेरणादायक है। यहां प्रतिभाशाली सहकर्मियों के साथ चुनौतीपूर्ण समस्याओं पर काम करने का अवसर मिलता है, जिससे निरंतर सीखने और पेशेवर विकास को बढ़ावा मिलता है। विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय और महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को हासिल करने की साझा प्रतिबद्धता हर कर्मचारी में उद्देश्य और जिम्मेदारी की मजबूत भावना पैदा करती है। यहां काम करने वाले अधिकांश युवा हैं, जिनकी औसत आयु लगभग 28 वर्ष है। हर व्यक्ति पूरे जुनून और समर्पण के साथ काम करता है और उसे ऐसा महसूस होता है मानो वह अपना स्वयं का रॉकेट उड़ाने के मिशन का हिस्सा हो।
कोठरा गांव से है रिश्ता
रत्नेंद्र सिंह का जन्म सतना जिले के कोठरा गांव में हुआ। उनके पिता पुष्पेंद्र सिंह सेना से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। उनकी मां ऋतु सिंह गृहिणी हैं। उनकी एक बहन शिल्पा सिंह हैं, जो आईटी क्षेत्र में कार्यरत हैं। इसी वर्ष उनका विवाह स्मृता सिंह के साथ हुआ।
आर्मी स्कूल से शिक्षित है रत्नेंद्र
उन्होंने बताया कि उनकी प्राथमिक शिक्षा फैजाबाद (अयोध्या) के आर्मी स्कूल में हुई। कक्षा 9वीं से 12वीं तक की पढ़ाई रांची (झारखंड) के आर्मी स्कूल से पूरी की। इसके बाद उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई पूरी की। वर्तमान में उनका परिवार सतना शहर के बरदाडीह रेलवे फाटक, आर्मी ट्रेडर्स के पीछे, गली नंबर-1 में निवास करता है। रत्नेंद्र सिंह ने कहा कि विक्रम-1 की सफलता में स्काईरूट की पूरी टीम और उनके परिवार का अभिन्न सहयोग रहा।