अमेरिका-ईरान तनाव और होर्मुज स्ट्रेट पर टकराव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। ब्रेंट और WTI क्रूड में 6-7% तक तेजी, वैश्विक बाजार पर असर स्पष्ट।
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का असर एक बार फिर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई दे रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच टकराव तेज होने और होर्मुज स्ट्रेट को लेकर अनिश्चितता बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों में अचानक उछाल दर्ज किया गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट और WTI क्रूड दोनों में 6 से 7 प्रतिशत तक की तेजी देखी गई है।
ब्रेंट और WTI क्रूड में तेज बढ़ोतरी
रिपोर्ट्स के मुताबिक, शुरुआती ट्रेडिंग में अमेरिकी कच्चा तेल (WTI) करीब 6.4 प्रतिशत बढ़कर 87.88 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। वहीं अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड की कीमत 6.5 प्रतिशत उछलकर 96.25 डॉलर प्रति बैरल तक दर्ज की गई। यह तेजी उस समय आई जब शांति वार्ता की उम्मीदें कमजोर पड़ गईं।
होर्मुज स्ट्रेट बना तनाव का केंद्र
दुनिया के सबसे अहम तेल आपूर्ति मार्गों में शामिल होर्मुज स्ट्रेट को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच सहमति नहीं बन पाई है। अमेरिका द्वारा ईरानी जहाजों को रोकने और कब्जे में लेने की कार्रवाई जारी है, जबकि ईरान की ओर से जवाबी कदम उठाए जा रहे हैं। हाल के घटनाक्रम में ड्रोन हमलों और जहाजों पर कार्रवाई की खबरों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
शांति वार्ता विफल, बढ़ा जोखिम
इस्लामाबाद में प्रस्तावित दूसरे दौर की शांति वार्ता शुरू होने से पहले ही विफल होती नजर आ रही है। अमेरिकी नेतृत्व ने ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी जारी रखने का संकेत दिया है। इसके जवाब में ईरान ने समुद्री गतिविधियों में आक्रामक रुख अपनाया है। इससे क्षेत्रीय अस्थिरता और बढ़ गई है।
वैश्विक ऊर्जा संकट की आशंका गहराई
विशेषज्ञों का मानना है कि यह टकराव लंबे समय तक जारी रहा तो वैश्विक ऊर्जा संकट और गहरा सकता है। एशिया और यूरोप के वे देश, जो खाड़ी क्षेत्र से बड़े पैमाने पर तेल आयात करते हैं, उन्हें सप्लाई बाधित होने और कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर झेलना पड़ सकता है।
भारत पर संभावित प्रभाव
भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने का दबाव बन सकता है। साथ ही महंगाई दर पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि होर्मुज स्ट्रेट में तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो सकती है, जिसका असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।