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Trump Hormuz Strategy Faces Global Pushback

होर्मुज पर ट्रंप को झटका: साथ छोड़ गए करीबी देश, अमेरिका लगभग अकेला

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान तनाव के बीच ट्रंप की अपील को कई सहयोगी देशों ने ठुकरा दिया। जापान, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया ने नौसैनिक जहाज भेजने से दूरी बनाई, जिससे अमेरिका की रणनीति पर सवाल उठने लगे


होर्मुज पर ट्रंप को झटका साथ छोड़ गए करीबी देश अमेरिका लगभग अकेला

Trump Request Denied Friend Country |

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच एक ऐसा मोड़ आया है जिसने वॉशिंगटन की कूटनीतिक ताकत पर सवाल खड़े कर दिए हैं। दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में गिने जाने वाले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर अमेरिका ने सहयोगियों से साथ मांगा था, लेकिन उम्मीद के मुताबिक समर्थन नहीं मिला।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई देशों से अपील की थी कि वे भी इस समुद्री मार्ग की सुरक्षा के लिए अपने नौसैनिक जहाज तैनात करें। मगर कई पुराने सहयोगियों ने इस पर ठंडी प्रतिक्रिया दी, कुछ ने तो साफ इनकार भी कर दिया।

दुनिया का सबसे अहम समुद्री रास्ता

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खाड़ी क्षेत्र का वह संकरा समुद्री रास्ता है जहां से दुनिया की बड़ी मात्रा में तेल और गैस की सप्लाई गुजरती है। ऊर्जा बाजार के आंकड़ों के मुताबिक, वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। यही वजह है कि यहां किसी भी तरह का सैन्य तनाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

अमेरिका का तर्क था कि जब दुनिया भर के देशों का व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति इस रास्ते पर निर्भर है, तो उसकी सुरक्षा में भी उन्हें हिस्सेदारी करनी चाहिए।

ट्रंप की अपील, लेकिन जवाब ठंडा

रिपोर्टों के मुताबिक ट्रंप ने सोशल मीडिया के जरिए कई देशों से अपील की थी कि वे अपने जहाजों की सुरक्षा खुद सुनिश्चित करें और इस मिशन में अमेरिका का साथ दें। उनका कहना था कि अमेरिका सालों से दूसरे देशों के जहाजों की सुरक्षा करता रहा है, जबकि असल फायदा उन देशों को ही मिलता है। लेकिन कूटनीतिक गलियारों में इसका असर उम्मीद से काफी कम दिखा।

जापान ने सबसे पहले दूरी बनाई

सबसे बड़ा झटका जापान से आया। टोक्यो ने साफ कर दिया कि वह फिलहाल होर्मुज में किसी भी तरह के समुद्री सुरक्षा अभियान में शामिल होने की योजना नहीं बना रहा है। जापानी प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा कि उन्हें अभी तक अमेरिका से कोई औपचारिक अनुरोध नहीं मिला है, और मौजूदा हालात में नौसेना भेजना मुश्किल है।

जापान की स्थिति थोड़ी जटिल भी है, क्योंकि उसकी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा ईरान और खाड़ी देशों से आता है। ऐसे में सीधे टकराव से बचना उसकी प्राथमिकता है।

ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया ने भी किया किनारा

प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका का मजबूत सहयोगी माना जाने वाला ऑस्ट्रेलिया भी इस मुद्दे पर पीछे हटता नजर आया। ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि वह होर्मुज में अपना युद्धपोत भेजने की योजना नहीं बना रही है। वहीं, साउथ कोरिया ने थोड़ी नरम भाषा का इस्तेमाल किया। सियोल ने कहा कि वह इस अनुरोध की समीक्षा करेगा, लेकिन फिलहाल किसी नौसैनिक तैनाती का फैसला नहीं हुआ है।

यूरोपीय देशों ने भी दूरी बनाई

यूरोप के दो अहम सहयोगी यूके और फ्रांस ने भी इस अमेरिकी पहल में शामिल होने से परहेज किया है। विश्लेषकों का मानना है कि ये देश नहीं चाहते कि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव में वे सीधे किसी बड़े क्षेत्रीय संघर्ष का हिस्सा बन जाएं।

क्या यह अमेरिका के घटते प्रभाव का संकेत?

कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाक्रम वैश्विक राजनीति में बदलते समीकरणों की ओर इशारा करता है। अमेरिका अब भी सैन्य और आर्थिक रूप से बेहद ताकतवर है, लेकिन हर रणनीतिक कदम पर पुराने सहयोगियों का साथ मिलना पहले जितना आसान नहीं रहा। जिस स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से दुनिया का इतना बड़ा ऊर्जा व्यापार गुजरता है, वहां सुरक्षा के नाम पर अमेरिका के साथ खुलकर खड़ा होने को फिलहाल कोई तैयार नहीं दिख रहा।

यही वजह है कि होर्मुज संकट में वॉशिंगटन खुद को थोड़ा अलग-थलग महसूस कर रहा है, और आगे की रणनीति पर दुनिया की नजरें टिकी हैं।

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