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सलमान खान के बयान से पाकिस्तान में हलचल, बॉलोचिस्तान फिर चर्चा में

सलमान खान के बयान से पाकिस्तान में हलचल, बॉलोचिस्तान फिर चर्चा में

सलमान खान के बॉलोचिस्तान बयान के पीछे की सच्चाई, राजनीति, और अंतरराष्ट्रीय असर।

सलमान खान के बयान से पाकिस्तान में हलचल बॉलोचिस्तान फिर चर्चा में

सलमान खान का बॉलोचिस्तान बयान: एक गलती या संकेत?

रियाध फोरम 2025 में अभिनेता सलमान खान के बयान ने पाकिस्तान को झकझोर दिया है। सलमान खान ने मंच से कहा, यहां बॉलोचिस्तान से भी लोग हैं, पाकिस्तान से भी…”  और बस इतना ही काफी था कि यह टिप्पणी सोशल मीडिया पर वायरल हो जाए। पाकिस्तान के मीडिया ने इसे विवादित बताते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी, जबकि बॉलोच कार्यकर्ताओं ने इसे पहचान की अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति कहा।


बॉलोचिस्तान का लंबा संघर्ष

बॉलोचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा, लेकिन सबसे उपेक्षित प्रांत है। यह प्राकृतिक गैस, तांबा और अन्य खनिजों से समृद्ध इलाका है, फिर भी यहां की गरीबी दर 70% से अधिक मानी जाती है। स्थानीय समुदाय दशकों से संसाधनों के शोषण, आर्थिक असमानता और राजनीतिक उपेक्षा की शिकायत कर रहे हैं।

वर्षों से चल रहे अलगाववादी आंदोलनों को पाकिस्तान सरकार आंतरिक सुरक्षा का मामला बताती है, लेकिन अनेक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन यहां के कथित सैन्य दमन पर सवाल उठाते रहे हैं। ऐसे माहौल में जब सलमान खान ने बॉलोचिस्तान को पाकिस्तान से अलग उल्लेख किया, तो यह बयान राजनीतिक रूप से संवेदनशील बन गया।

क्या यह सोच-समझकर कहा गया था?

कई लोग मानते हैं कि सलमान खान का यह बयान बस एक slip of tongue था — यानी ज़ुबान फिसल गई। मंच पर वे भारतीय फिल्मों की अंतरराष्ट्रीय पहुँच पर बात कर रहे थे और संभवतः देशों व इलाकों का नाम क्रम से ले रहे थे। हालांकि एक तबका यह भी सोचता है कि यह टिप्पणी अनजाने में नहीं आई। उनके अनुसार, सलमान जैसे अनुभवी कलाकार अपने शब्दों के प्रति सतर्क रहते हैं, इसलिए यह कथन किसी हद तक एक सटीक संदेश देने की कोशिश हो सकता है। दिलचस्प यह रहा कि इस बयान के तुरंत बाद अनेक बॉलोच कार्यकर्ताओं ने सलमान खान को सार्वजनिक रूप से धन्यवाद दिया और इसे हमारी पहचान की स्वीकृति बताया।

पाकिस्तान की प्रतिक्रिया

पाकिस्तान के कई मीडिया चैनलों ने इस बयान को राष्ट्र-विरोधी करार दिया। सोशल मीडिया पर #BoycottSalmanKhan ट्रेंड करने लगा। कुछ स्थानीय रिपोर्ट्स में यह दावा भी किया गया कि सरकार ने सलमान खान का नाम Anti-Terrorism Act की चौथी अनुसूची में डाल दिया है जो संदिग्धों की निगरानी सूची होती है। हालांकि, बाद में कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ने इन खबरों को गलत बताया।

राष्ट्रवाद बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

भारत में इस बयान को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने कहा कि सलमान खान को ऐसे संवेदनशील मुद्दों से दूरी बनाए रखनी चाहिए, जबकि अन्य ने इसे बोलने की स्वतंत्रता का हिस्सा बताया। एक प्रशंसक ने लिखा, अब ये साबित हो गया कि भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव किसी मंच पर, किसी व्यक्ति के एक वाक्य से भी भड़क सकता है। यह विवाद यह भी दिखाता है कि आज की वैश्विक दुनिया में एक कलाकार की बात कितनी आसानी से कूटनीतिक बहस का रूप ले सकती है।

अंतरराष्ट्रीय असर: कला और कूटनीति  

यह विवाद केवल भारत या पाकिस्तान तक सीमित नहीं रहा। चूंकि बयान सऊदी अरब के रियाध मंच से आया था, इसलिए खाड़ी देशों में भी इसकी गूंज सुनाई दी। अब यह सवाल उठ रहा है क्या भारतीय सितारों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बोलते समय राजनयिक दूत की भूमिका निभानी पड़ती है?  

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की भूमिका

बॉलोचिस्तान के कई बुद्धिजीवी भारत को हमेशा उम्मीद की निगाह से देखते हैं। भारत अपनी सॉफ्ट कूटनीति को बिना किसी राजनीतिक टकराव के आगे बढ़ा सकता है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद, SCO और अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक मंचों पर, अगर भारत अवसरवादी नहीं बल्कि संवेदनशील दृष्टिकोण से अपनी बात रखे, तो उसकी छवि और सशक्त होगी। बॉलोचिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघन पर चर्चा, वहां के नागरिक अधिकारों की वकालत, और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए शांति संवाद ये तीन पहलू भारत की नैतिक और मानवीय शक्ति को परिभाषित करते हैं।

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