ईरान ने अमेरिका को हाईली एनरिच्ड यूरेनियम सौंपने से इनकार कर दिया है। ट्रम्प के बयान के बाद बढ़े तनाव ने मिडिल ईस्ट में नई कूटनीतिक हलचल पैदा कर दी है।
ईरान और अमेरिका के बीच चल रही बातचीत एक बार फिर संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गई है। तेहरान ने साफ कर दिया है कि वह अपना हाईली एनरिच्ड यूरेनियम अमेरिका को नहीं सौंपेगा। इस बयान ने उस दावे को भी कमजोर कर दिया है, जिसमें कहा जा रहा था कि ईरान यूरेनियम स्टॉक हटाने पर राजी हो गया है।
ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि मौजूदा शुरुआती समझौते में परमाणु कार्यक्रम शामिल ही नहीं है। उनका कहना है कि यूरेनियम भंडार और परमाणु गतिविधियों पर असली बातचीत अंतिम समझौते के दौरान होगी। यानी फिलहाल तेहरान किसी तरह का परमाणु समझौता लागू करने के मूड में नहीं दिख रहा।
यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक दिन पहले कहा था कि अमेरिका ईरान को हाईली एनरिच्ड यूरेनियम रखने नहीं देगा। ट्रम्प के इस सख्त रुख के बाद दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ता नजर आ रहा है।
परमाणु डील पर अलग-अलग दावे से बढ़ा भ्रम
पिछले कुछ दिनों में अमेरिकी मीडिया में ऐसी रिपोर्ट्स सामने आई थीं कि ईरान यूरेनियम स्टॉक छोड़ने को तैयार हो गया है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से दावा किया था कि तेहरान इस दिशा में सहमत हो चुका है। हालांकि अब ईरानी पक्ष ने इन खबरों को खारिज कर दिया है। रॉयटर्स से बातचीत में ईरानी अधिकारी ने कहा कि मौजूदा बातचीत सिर्फ शुरुआती फ्रेमवर्क तक सीमित है। परमाणु मुद्दे पर फैसला बाद में होगा। इससे साफ है कि दोनों देशों के बीच अभी भरोसे की कमी बनी हुई है।
वहीं, एक्सियोस की रिपोर्ट में दावा किया गया कि मसौदा समझौते में ईरान ने परमाणु हथियार नहीं बनाने का वादा किया है। साथ ही एनरिच्ड यूरेनियम हटाने और प्रोग्राम सीमित करने पर आगे बातचीत की बात भी शामिल है।
मसौदे में इजराइल और अमेरिका से जुड़ी बड़ी शर्तें
ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक तैयार हो रहे मसौदे में सिर्फ परमाणु मुद्दा ही नहीं, बल्कि सैन्य तनाव कम करने की कोशिश भी शामिल है। प्रस्तावित समझौते में अमेरिका और इजराइल की ओर से ईरान या उसके समर्थक संगठनों पर हमला नहीं करने की बात कही गई है। इसके बदले ईरान भी अमेरिका और इजराइल के खिलाफ पहले हमला न करने का वादा करेगा।
रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि इजराइल और हिजबुल्लाह के बीच जारी संघर्ष को खत्म कराने की कोशिश इस समझौते का हिस्सा हो सकती है। हालांकि समझौते की इन शर्तों ने इजराइल की चिंता बढ़ा दी है। इजराइली अधिकारियों का मानना है कि इससे ईरान को क्षेत्रीय दबाव बनाने की ज्यादा ताकत मिल सकती है।
होर्मुज स्ट्रेट पर बढ़ा तनाव, अमेरिका ने दी चेतावनी
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने ईरान को लेकर सख्त बयान दिया है। नई दिल्ली में एस जयशंकर के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने कहा कि ईरान दुनिया में आतंकवाद को सबसे ज्यादा समर्थन देने वाला देश है। रुबियो ने होर्मुज स्ट्रेट में कारोबारी जहाजों को निशाना बनाने की धमकियों पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि यह अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के खिलाफ है और अगर इसे सामान्य मान लिया गया तो यह दुनिया के लिए खतरनाक संकेत होगा। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया की सबसे अहम तेल सप्लाई लाइनों में से एक माना जाता है। ऐसे में यहां बढ़ता तनाव सीधे ग्लोबल ऑयल मार्केट और एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर असर डाल सकता है।
भारत ने ऊर्जा बाजार को लेकर जताई चिंता
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने भी अपनी चिंता जाहिर की है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि भारत चाहता है कि तेल और गैस की सप्लाई सामान्य बनी रहे और बाजार में स्थिरता कायम रहे। उन्होंने साफ किया कि भारत आगे भी अलग-अलग देशों से ऊर्जा खरीदता रहेगा ताकि किसी एक स्रोत पर निर्भरता न बढ़े। यह बयान ऐसे समय आया है जब होर्मुज स्ट्रेट को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ती जा रही है। भारत दुनिया के बड़े तेल आयातक देशों में शामिल है। ऐसे में ईरान-अमेरिका तनाव बढ़ने का असर भारत के ऊर्जा खर्च और बाजार पर भी पड़ सकता है।
सुप्रीम लीडर की मंजूरी के बिना आगे नहीं बढ़ेगा ईरान
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने भी संकेत दिया है कि परमाणु मुद्दे पर अंतिम फैसला जल्द नहीं होगा। उन्होंने कहा कि देश की सुरक्षा और सैन्य मामलों से जुड़े फैसले सिर्फ सुप्रीम लीडर की मंजूरी के बाद ही लिए जाते हैं। इस बयान से साफ है कि तेहरान फिलहाल हर कदम बेहद सावधानी से उठाना चाहता है। दूसरी तरफ अमेरिका लगातार दबाव की रणनीति बनाए हुए है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह बातचीत मध्य पूर्व की राजनीति और वैश्विक बाजार दोनों के लिए बेहद अहम साबित हो सकती है।