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चीन का परमाणु विस्तार और अमेरिका-रूस नियंत्रण का अ

नई हथियार दौड़ के मुहाने पर दुनिया: 2030 तक चीन के पास 1000 परमाणु आयुध

चीन के तेज़ परमाणु विस्तार और अमेरिका-रूस संधियों के खत्म होने से दुनिया नई हथियार प्रतिस्पर्धा के मुहाने पर खड़ी है

नई हथियार दौड़ के मुहाने पर दुनिया 2030 तक चीन के पास 1000 परमाणु आयुध

दुनिया एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां शीतयुद्ध के बाद बनी सामरिक स्थिरता तेजी से दरकती दिख रही है। चीन के आक्रामक परमाणु विस्तार और अमेरिका-रूस के बीच दशकों पुरानी नियंत्रण व्यवस्था के अंत ने वैश्विक सुरक्षा संतुलन को अस्थिर कर दिया है। सामरिक विश्लेषकों की मानें तो आने वाले वर्षों में यह स्थिति एक नई हथियार प्रतिस्पर्धा को जन्म दे सकती है, जिसकी गूंज एशिया से लेकर यूरोप और अमेरिका तक सुनाई देगी।

विश्व स्तर पर उपलब्ध आकलनों के अनुसार अमेरिका और रूस आज भी पृथ्वी पर मौजूद कुल परमाणु आयुधों का लगभग 90 प्रतिशत अपने पास रखते हैं। यह संरचना शीतयुद्ध के बाद की उस व्यवस्था की देन थी, जिसमें दोनों महाशक्तियों ने क्रमशः अपने भंडार को सीमित और नियंत्रित रखने के लिए अनेक समझौते किए थे। किंतु हालिया घटनाक्रम ने इस दीर्घकालिक संतुलन को कमजोर कर दिया है और पहली बार आधी सदी से अधिक समय बाद दोनों देशों के सामरिक परमाणु शस्त्रागार पर कोई बाध्यकारी सीमा शेष नहीं रही है।

चीन का उभरता परमाणु आयाम

स्टॉकहोम स्थित अंतरराष्ट्रीय शांति अनुसंधान संस्थान के आकलन के अनुसार चीन के पास वर्तमान में लगभग 600 परमाणु आयुध हैं और 2023 के बाद से उसके भंडार में प्रति वर्ष लगभग 100 नए आयुध जुड़ने की प्रवृत्ति देखी गई है। अमेरिकी सामरिक आकलनों में यह भी संकेत दिया गया है कि वर्ष 2030 तक यह संख्या 1000 से अधिक हो सकती है।

चीन द्वारा नए प्रक्षेपास्त्र साइलो, दीर्घ-पल्लवित प्रक्षेपास्त्र प्रणालियों और समुद्री प्रतिरोधक क्षमता के विस्तार को उसके व्यापक सैन्य आधुनिकीकरण का संकेत माना जा रहा है। रणनीतिक विश्लेषकों का मत है कि चीन की यह तीव्र वृद्धि पारंपरिक द्विपक्षीय नियंत्रण ढांचे को अप्रासंगिक बना रही है, क्योंकि अब वैश्विक परमाणु संतुलन केवल अमेरिका और रूस के बीच सीमित नहीं रहा, बल्कि त्रिपक्षीय शक्ति संरचना में निर्धारित हो रहा है। पारदर्शिता की सीमितता और वास्तविक संख्या को लेकर अनिश्चितता भी वैश्विक चिंताओं को बढ़ा रही है।

एशियाई सामरिक परिदृश्य में भारत की भूमिका

एशियाई सामरिक परिदृश्य में भारत भी एक महत्वपूर्ण आयाम के रूप में उभरा है। उपलब्ध आकलनों के अनुसार जनवरी 2025 तक भारत के पास लगभग 180 परमाणु आयुध हैं, जो पिछले वर्ष के लगभग 172 से अधिक हैं। भारत ने भूमि, वायु और समुद्र आधारित त्रिस्तरीय प्रक्षेपण क्षमता को सुदृढ़ करने की दिशा में निरंतर प्रगति की है, जिसका उद्देश्य विश्वसनीय प्रतिरोधक संतुलन बनाए रखना है।

इसी क्षेत्र में पाकिस्तान के पास लगभग 170 और चीन के पास लगभग 600 परमाणु आयुध बताए जाते हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि एशिया में सामरिक शक्ति संतुलन तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। चीन की तेज वृद्धि और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा ने सुरक्षा गणनाओं को और अधिक जटिल बना दिया है।

अमेरिका-रूस नियंत्रण व्यवस्था का अंत

5 फरवरी 2026 को अंतिम बाध्यकारी परमाणु नियंत्रण संधि की अवधि समाप्त होने के साथ ही 1960 के दशक से चली आ रही अमेरिका–सोवियत संघ तथा बाद में रूस के साथ द्विपक्षीय नियंत्रण प्रक्रिया का ऐतिहासिक अवसान हो गया। इस व्यवस्था के अंतर्गत तैनात सामरिक परमाणु आयुधों की अधिकतम सीमा निर्धारित थी तथा पारस्परिक निरीक्षण, आंकड़ा विनिमय और सत्यापन जैसी व्यवस्थाएँ विश्वास बनाए रखने का आधार थीं।

रूस द्वारा वर्ष 2023 में अपनी भागीदारी निलंबित किए जाने के बाद से ही यह ढांचा व्यावहारिक रूप से कमजोर पड़ चुका था। संधि के समाप्त होने से अब दोनों देशों के पास अपने मौजूदा भंडार को बढ़ाने, पुनर्संयोजित करने या नई तैनाती संरचनाएं विकसित करने की पूर्ण स्वतंत्रता उत्पन्न हो गई है। अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व ने इसे वैश्विक शांति के लिए ‘गंभीर क्षण’ बताते हुए चेताया है कि बिना सत्यापन योग्य सीमाओं के गलत आकलन और आकस्मिक टकराव का जोखिम बढ़ सकता है।

नई वैश्विक दिशा: प्रतिस्पर्धी शस्त्रीकरण का जोखिम

विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु नियंत्रण व्यवस्था के क्षरण, रूस–पश्चिम टकराव, यूक्रेन युद्ध से उपजी अविश्वास की खाई और चीन के तीव्र विस्तार ने विश्व को ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है, जहाँ नई हथियार प्रतिस्पर्धा की आशंका प्रबल हो गई है।

बिना पारदर्शी निरीक्षण तंत्र के रणनीतिक निर्णय अधिक अनुमान-आधारित हो सकते हैं, जिससे तनाव और आकस्मिक संकट की संभावना बढ़ जाती है। यदि निकट भविष्य में कोई व्यापक और बहुपक्षीय, सत्यापन-समर्थित समझौता अस्तित्व में नहीं आता, तो विश्व एक बहुध्रुवीय और अधिक जोखिमपूर्ण सुरक्षा परिवेश की ओर बढ़ सकता है, जहाँ परमाणु प्रतिरोध की पारंपरिक अवधारणा कमजोर होकर शक्ति-प्रदर्शन की राजनीति प्रमुख कारक बन जाएगी।

 

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