बांग्लादेश में बीएनपी की जीत के बाद नई सरकार के रुख पर दिल्ली और इस्लामाबाद की नजरें टिकी हैं। जानिए भारत-पाकिस्तान के लिए इसका क्या मतलब है
पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के निष्कासन के बाद बांग्लादेश में हाल ही में संपन्न हुए संसदीय चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को प्रचंड जीत मिली है और उसके नेता तारिक रहमान प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने को तैयार हैं। इस चुनाव में बेगम खालिदा जिया की पार्टी बीएनपी की सफलता ने ढाका से ज्यादा इस्लामाबाद और दिल्ली में हलचल पैदा कर दी है। पाकिस्तान में इस जीत को लेकर जश्न और चिंता का मिला-जुला शोर सुनाई दे रहा है।
हालांकि पाकिस्तान में एक वर्ग यह मानकर बैठा था कि अगर जमात-ए-इस्लामी जैसी कट्टरपंथी ताकतें बांग्लादेश की सत्ता में हावी होती हैं, तो पाकिस्तान के लिए इस्लामिक ब्लॉक बनाना आसान हो जाएगा। लेकिन ढाका की जमीन से आ रही खबरें बताती हैं कि नई सरकार आर्थिक प्रगति के लिए भारत की ओर देखने को मजबूर होगी।
बांग्लादेश अर्थव्यवस्था और निर्यात के मामले में पाकिस्तान से काफी आगे निकल चुका है। भारत के साथ बांग्लादेश का व्यापारिक रिश्ता इतना गहरा है कि उसे तोड़ना बांग्लादेश के लिए आर्थिक आत्महत्या जैसा होगा। पाकिस्तान में इस बात का डर भी है कि कहीं बांग्लादेश भी अफगानिस्तान के रास्ते पर न निकल जाए, क्योंकि 2021 में जब तालिबान सत्ता में आया था, तब पाकिस्तान ने इसे अपनी बड़ी जीत माना था। लेकिन आज वही तालिबान भारत के साथ घनिष्ठ संबंध बना चुका है और पाकिस्तान को आंखें दिखा रहा है।
इधर भारत में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर हो रही है कि क्या बांग्लादेश की नई सरकार भारत से नाता तोड़ पाएगी। जिस तरह भारत बांग्लादेश के साथ संबंध बढ़ा रहा है, उससे ऐसा नहीं लगता कि भारत बांग्लादेश को यूं ही छोड़ देगा। हालांकि भारत इस चुनाव परिणाम को न तो अपने लिए संकट मान रहा है और न ही जश्न का अवसर। भारत के लिए यह एक टेस्ट जैसा है, जिसमें भविष्य का व्यवहार, सुरक्षा सहयोग, कूटनीतिक संवाद और आर्थिक रिश्ते तय करेंगे कि भारत और बांग्लादेश के संबंध किस दिशा में जाएंगे।
यदि बीएनपी यह भरोसा दिलाती है कि वह भारत की सुरक्षा, सीमा प्रबंधन और आंतरिक स्थिरता को प्रभावित नहीं होने देगी, तो रिश्ते सहज रूप से आगे बढ़ते रहेंगे। भारत इस संबंध में अत्यंत व्यवहारिक तरीके से संतुलन साधते हुए आगे बढ़ेगा। भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत हमेशा से यही रहा है कि वह किसी भी देश में वहां की जनता के जनादेश का सम्मान करता है।
बीएनपी की जीत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारिक रहमान को बधाई देते हुए संदेश दिया कि भारत एक समावेशी और प्रगतिशील बांग्लादेश का समर्थन जारी रखेगा। यह संकेत स्पष्ट है कि भारत नई सरकार के साथ सकारात्मक संवाद बनाने को तैयार है, बशर्ते संबंधों की बुनियाद पारदर्शी और भरोसेमंद हो।
पाकिस्तान के मशहूर अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक इकराम सहगल और डॉ. हसन असकारी रिजवी स्पष्ट कहते हैं कि कोई भी सरकार भारत को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकती। बीएनपी की सरकार भी अंततः भारत के साथ संबंधों को सामान्य रखेगी, क्योंकि बंगाल की खाड़ी और व्यापारिक रास्तों पर भारत का प्रभाव एक ऐसी वास्तविकता है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
पाकिस्तान में इस बात की भी चर्चा है कि भारत ने अपनी विदेश नीति को किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं रखा है। इसलिए पाकिस्तानी विशेषज्ञों को डर है कि अगर भारत बीएनपी के साथ भी वैसे ही कामकाजी रिश्ते बना लेता है, जैसे उसने तालिबान के साथ बनाए हैं, तो पाकिस्तान के हाथ से दक्षिण एशिया में भारत को घेरने का आखिरी मौका भी निकल जाएगा।