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Bengal Muslim Seats Shift 2026

मुस्लिम बहुल सीटों पर कैसे पलटा खेल? ममता के गढ़ में BJP की एंट्री ने बदली पूरी तस्वीर

पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बहुल जिलों में 2026 चुनाव में बड़ा बदलाव दिखा। TMC का मजबूत गढ़ कमजोर हुआ और BJP ने बढ़त बनाई। जानिए आंकड़ों और वजहों की पूरी कहानी।


मुस्लिम बहुल सीटों पर कैसे पलटा खेल ममता के गढ़ में bjp की एंट्री ने बदली पूरी तस्वीर

West Bengal Assembly Election Result 2026 |

पश्चिम बंगाल की राजनीति में जिन इलाकों को कभी तृणमूल कांग्रेस का अटूट गढ़ माना जाता था, वहां 2026 के नतीजों ने नई कहानी लिख दी। मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे मुस्लिम-बहुल जिलों में समीकरण अचानक बदल गए। इन इलाकों में भाजपा की बढ़त सिर्फ सीटों तक सीमित नहीं रही। असली बदलाव वोटिंग पैटर्न में दिखा, जहां एकजुट दिखने वाला वोट बैंक बिखर गया।

यही बिखराव इस चुनाव का टर्निंग पॉइंट बना। इससे न सिर्फ टीएमसी की सीटें घटीं, बल्कि कई पारंपरिक मजबूत सीटें भी हाथ से निकल गईं।

43 सीटों का गणित क्या कहता है

तीनों जिलों की कुल 43 सीटों पर तस्वीर पूरी तरह बदल गई। 2021 में जहां TMC के पास 35 सीटें थीं, वहीं 2026 में यह घटकर 22 रह गईं। दूसरी तरफ भाजपा ने बड़ा उछाल दिखाया। उसकी सीटें 8 से बढ़कर 19 हो गईं। बाकी 2 सीटें कांग्रेस, सीपीआई (M) और क्षेत्रीय दलों के खाते में गईं। यह बदलाव साफ संकेत देता है कि मुकाबला अब सीधा नहीं रहा। बहुकोणीय चुनाव ने परिणामों को पूरी तरह प्रभावित किया।

मुर्शिदाबाद में सबसे बड़ा झटका

मुर्शिदाबाद, जहां TMC की पकड़ सबसे मजबूत मानी जाती थी, वही सबसे बड़ा नुकसान झेलना पड़ा। 2021 में 22 में से 20 सीटें जीतने वाली पार्टी 2026 में सिर्फ 9 सीटों पर सिमट गई। BJP ने यहां 2 से सीधे 9 सीटों तक छलांग लगाई। कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय या उससे भी ज्यादा पक्षों में बंट गया। रानीनगर, डोमकल और रेजिनगर जैसी सीटों पर कांग्रेस और वाम दलों की मौजूदगी ने TMC का सीधा नुकसान किया।

वोट बिखराव बना निर्णायक फैक्टर

इस चुनाव की सबसे अहम कहानी वोटों के बिखराव की रही। अल्पसंख्यक वोट, जो पहले एकजुट होकर TMC के पक्ष में जाते थे, अब कई हिस्सों में बंट गए। कांग्रेस, वाम दलों और छोटे क्षेत्रीय संगठनों ने इस वोट बैंक में सेंध लगाई। नतीजा यह हुआ कि कई सीटों पर जीत का अंतर बेहद कम रह गया। यही वजह रही कि TMC मजबूत होते हुए भी सीटें नहीं बचा पाई।

SIR विवाद और मतदाता सूची का असर

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) ने भी इस चुनाव में बड़ा मुद्दा बनाया। टीएमसी ने आरोप लगाया कि मुर्शिदाबाद में करीब 7.8 लाख नाम हटाए गए। हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि असली असर वोटों के बिखराव का था। SIR मुद्दा चर्चा में जरूर रहा, लेकिन निर्णायक कारण नहीं बना।

BJP को कैसे मिला सीधा फायदा

जहां एक तरफ अल्पसंख्यक वोट बंटे, वहीं कई इलाकों में हिंदू मतदाताओं का अपेक्षाकृत ज्यादा एकजुट मतदान देखने को मिला। कांडी और नबग्राम जैसी सीटों पर BJP ने इसी समीकरण का फायदा उठाया। अगर मुकाबला सीधा होता, तो नतीजे अलग हो सकते थे। यानी चुनाव का पूरा गणित दो चीजों विपक्ष का बिखराव और BJP समर्थकों का एकजुट वोट पर टिका रहा।

मालदा और उत्तर दिनाजपुर में भी बदलाव

मालदा में BJP 4 से बढ़कर 6 सीटों पर पहुंच गई। यहां कांग्रेस की मौजूदगी ने टीएमसी का खेल बिगाड़ा। उत्तर दिनाजपुर में भी तस्वीर बदली। टीएमसी 7 से घटकर 5 सीटों पर आ गई, जबकि बीजेपी 2 से बढ़कर 4 सीटों तक पहुंची। कई सीटों पर विपक्षी वोटों का कुल आंकड़ा जीत के अंतर से ज्यादा था। इससे साफ होता है कि एकजुटता की कमी ने सीधे परिणाम बदले।

तीन जिलों से आगे दिखा असर

यह ट्रेंड सिर्फ इन जिलों तक सीमित नहीं रहा। दक्षिण 24 परगना और बीरभूम के कुछ हिस्सों में भी इसी तरह के संकेत मिले। यहां भी वोटिंग पैटर्न में बदलाव दिखा, जहां छोटे अंतर ने बड़े परिणाम तय किए।

2021 से 2026 तक क्या बदला

2021 में ममता बनर्जी ने खुद को BJP के खिलाफ सबसे मजबूत विकल्प के रूप में पेश किया था।  एनआरसी और सीएए जैसे मुद्दों पर अल्पसंख्यक वोट बड़े पैमाने पर टीएमसी (तृणमूल कांग्रेस) के साथ खड़े हुए। लेकिन 2026 में यह एकजुटता कमजोर पड़ गई। वोट अलग-अलग दलों में बंटे और भाजपा को अप्रत्यक्ष फायदा मिला। अब बंगाल की राजनीति में सिर्फ पहचान की राजनीति नहीं, बल्कि वोट मैनेजमेंट और गठबंधन की रणनीति ज्यादा अहम होती दिख रही है।

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