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Suvendu vs Mamata Story

ममता के सबसे भरोसेमंद नेता से सबसे बड़े विरोधी बने शुवेंदु, कैसे टूटा दोनों का रिश्ता?

एक समय ममता बनर्जी के सबसे करीबी रहे शुवेंदु अधिकारी अब बंगाल के नए मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। जानिए दोनों नेताओं के रिश्ते में दरार कैसे आई और राजनीति कैसे बदल गई।


ममता के सबसे भरोसेमंद नेता से सबसे बड़े विरोधी बने शुवेंदु कैसे टूटा दोनों का रिश्ता

West Bengal Tension Between Mamta And Suvendu |

पश्चिम बंगाल की राजनीति में शायद ही कोई रिश्ता इतना तेजी से बदला हो जितना ममता बनर्जी और शुवेंदु अधिकारी का। कभी ममता के सबसे भरोसेमंद सहयोगी रहे शुवेंदु अब वही नेता हैं जिन्होंने उन्हें दो बड़े चुनावों में हराकर सत्ता से बाहर कर दिया। भाजपा विधायक दल ने शुवेंदु अधिकारी को अपना नेता चुन लिया है और अब वे बंगाल के नए मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। 

हालांकि इस राजनीतिक मुकाम तक पहुंचने की कहानी सिर्फ चुनावी जीत की नहीं है। यह भरोसे, महत्वाकांक्षा और टकराव की भी है। नंदीग्राम आंदोलन से शुरू हुई यह साझेदारी आखिर इतनी कड़वी कैसे हो गई कि दोनों नेता खुलकर एक-दूसरे के खिलाफ सबसे बड़े राजनीतिक चेहरे बन गए।

नंदीग्राम आंदोलन ने बनाया था सबसे भरोसेमंद साथी

शुवेंदु अधिकारी पूर्वी मिदनापुर के मजबूत संगठनात्मक नेता माने जाते थे। 2007 के नंदीग्राम आंदोलन में उन्होंने ममता बनर्जी के साथ मिलकर वाम सरकार के खिलाफ बड़ा जनआंदोलन खड़ा किया था। भूमि अधिग्रहण के विरोध में चला यह आंदोलन ही बाद में बंगाल में सत्ता परिवर्तन की सबसे बड़ी वजह बना।

साल 2011 में TMC की ऐतिहासिक जीत के पीछे शुवेंदु की रणनीति और ग्रामीण पकड़ को अहम माना गया। सरकार बनने के बाद उन्हें परिवहन, सिंचाई और जल संसाधन जैसे अहम विभाग दिए गए। पार्टी के भीतर उनकी पहचान ऐसे नेता की थी जो जमीन पर संगठन खड़ा कर सकता था।

अभिषेक बनर्जी की एंट्री के बाद बढ़ी दूरी

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि ममता और शुवेंदु के रिश्तों में दरार तब गहरी हुई जब अभिषेक बनर्जी का पार्टी में प्रभाव तेजी से बढ़ने लगा। शुवेंदु को लगने लगा कि पार्टी में फैसले कुछ लोगों तक सीमित हो रहे हैं। उन्होंने कई बार अप्रत्यक्ष तौर पर 'वंशवाद' और 'तुष्टिकरण की राजनीति' पर सवाल उठाए। धीरे-धीरे उन्हें संगठन और सरकार दोनों में खुद को अलग-थलग महसूस होने लगा। यही असंतोष बाद में खुली नाराजगी में बदल गया।

2020 में शुवेंदु ने मंत्री पद से इस्तीफा दिया और कुछ ही समय बाद भाजपा में शामिल हो गए। TMC ने उन्हें 'गद्दार' कहा, जबकि शुवेंदु ने इसे 'बंगाल बचाओ' अभियान बताया।

नंदीग्राम में पहली बार ममता को दी बड़ी चोट

2021 का विधानसभा चुनाव दोनों नेताओं के रिश्ते का सबसे बड़ा राजनीतिक युद्ध बन गया। ममता बनर्जी ने खुद नंदीग्राम सीट से चुनाव लड़ने का फैसला किया, जिसे शुवेंदु का गढ़ माना जाता था। यह मुकाबला सिर्फ सीट का नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिष्ठा का बन गया था। आखिरकार शुवेंदु ने ममता को 1,956 वोटों से हरा दिया।

ममता बाद में भवानीपुर उपचुनाव जीतकर फिर मुख्यमंत्री बन गईं, लेकिन नंदीग्राम की हार ने बंगाल की राजनीति की दिशा बदल दी। शुवेंदु को भाजपा ने 'जायंट किलर' के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया।

भवानीपुर में दूसरी हार ने खत्म कर दिया TMC का राज

2026 विधानसभा चुनाव में शुवेंदु अधिकारी ने एक बार फिर ममता को सीधी चुनौती दी। इस बार मुकाबला भवानीपुर में हुआ, जिसे ममता का सबसे सुरक्षित राजनीतिक गढ़ माना जाता था। भाजपा ने इसे “ममता के घर में घुसकर लड़ाई” बताया। चुनाव परिणाम आने पर सबसे बड़ा झटका यहीं से लगा।

शुवेंदु ने भवानीपुर में ममता को 15 हजार से ज्यादा वोटों से हरा दिया। इसके साथ ही भाजपा ने बहुमत हासिल कर लिया और TMC का 15 साल पुराना शासन खत्म हो गया। यही जीत शुवेंदु को बंगाल की सत्ता तक ले आई।

आरोप, हमले और खुली राजनीतिक जंग

समय के साथ दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक टकराव बेहद व्यक्तिगत और आक्रामक होता गया। शुवेंदु लगातार ममता सरकार पर भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टिकरण के आरोप लगाते रहे। उन्होंने कई बार कहा कि नंदीग्राम आंदोलन के शहीदों के साथ विश्वासघात हुआ। 

दूसरी तरफ ममता और TMC नेताओं ने शुवेंदु को 'विश्वासघाती' और 'बाहरी ताकतों का चेहरा' बताया। चुनावी मंचों पर दोनों नेताओं के बीच तीखी बयानबाजी लगातार सुर्खियों में रही। बंगाल की राजनीति अब इसी टकराव के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है।

अब बंगाल की राजनीति का नया चेहरा बने शुवेंदु

भाजपा के सत्ता में आने के बाद शुवेंदु अधिकारी अब राज्य के सबसे ताकतवर नेता बन चुके हैं। पार्टी उन्हें बंगाल में अपने दीर्घकालिक चेहरे के तौर पर देख रही है। शनिवार को वे मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। यह वही नेता हैं जो कभी ममता बनर्जी की राजनीतिक टीम के सबसे अहम रणनीतिकार माने जाते थे। बंगाल की राजनीति में यह बदलाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि दो नेताओं के रिश्ते के पूरी तरह बदल जाने की कहानी भी बन चुका है।

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