सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री पर सुनवाई जारी। केंद्र ने 2018 के फैसले को गलत बताया, जस्टिस नागरत्ना ने अहम टिप्पणी की।
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर अहम सुनवाई शुरू हो गई है। 9 जजों की संवैधानिक पीठ इस मुद्दे पर विचार कर रही है कि 2018 में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश देने वाला फैसला जारी रहना चाहिए या नहीं।
केंद्र सरकार ने फैसले का किया विरोध
सुनवाई के पहले दिन केंद्र सरकार ने अदालत में साफ कहा कि 2018 का फैसला सही नहीं था। सरकार का तर्क है कि यह मामला पूरी तरह धार्मिक आस्था और संप्रदाय के अधिकार से जुड़ा है, जिसमें अदालत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। सरकार ने यह भी कहा कि अगर किसी परंपरा पर सवाल उठता है, तो उसका समाधान संसद या विधानसभा के माध्यम से होना चाहिए, न कि न्यायपालिका के जरिए।
जस्टिस नागरत्ना की अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान बी. वी. नागरत्ना ने मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं के प्रवेश पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा 'एक महिला होने के नाते मैं यह कहना चाहूंगी कि ऐसा नहीं हो सकता कि हर महीने के 3 दिन तक तो महिला को 'अछूत' माना जाए और चौथे दिन अचानक कोई 'अछूतपन' न रह जाए।' उन्होंने यह भी कहा कि अनुच्छेद 17 (छुआछूत के खिलाफ अधिकार) के संदर्भ में इस तरह की दलीलों को समझना जटिल है।
धार्मिक प्रथाओं और अधिकारों के बीच संतुलन पर बहस
केंद्र सरकार ने अदालत में यह भी कहा कि हर धार्मिक समूह की परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए। सभी प्रथाओं को व्यक्तिगत स्वतंत्रता या गरिमा के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई प्रथा सामाजिक बुराई है और उसे धार्मिक रूप दे दिया गया है, तो न्यायालय यह तय कर सकता है कि वह आवश्यक धार्मिक प्रथा है या नहीं।
50 से अधिक याचिकाओं पर सुनवाई
इस मामले से जुड़े 50 से अधिक पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है। यह सुनवाई 22 अप्रैल तक जारी रहने की संभावना है। याचिकाकर्ता और उनके समर्थक 7 से 9 अप्रैल तक अपनी दलीलें रखेंगे, जबकि विरोधी पक्ष 14 से 16 अप्रैल के बीच तर्क प्रस्तुत करेगा।
अन्य धार्मिक मामलों पर भी फैसला संभव
इस सुनवाई में सिर्फ सबरीमाला ही नहीं, बल्कि अन्य धार्मिक और सामाजिक मुद्दों पर भी विचार किया जा रहा है। इनमें मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश, दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना और पारसी महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश जैसे मुद्दे शामिल हैं।
9 जजों की पीठ के सामने प्रमुख सवाल
क्या सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश मिलना चाहिए?
क्या धार्मिक प्रथाओं में जेंडर आधारित भेदभाव मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है?
क्या अदालत यह तय कर सकती है कि कोई प्रथा धार्मिक है या सामाजिक बुराई?
यह मामला देश में धार्मिक स्वतंत्रता और महिलाओं के अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक बहस बन चुका है।