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300 रुपए में बन रहा 800 लोगों का खाना: धुले के स्वयंसेवक राहुल कुलकर्णी ने बनाई खास सिगड़ी

धुले के स्वयंसेवक राहुल कुलकर्णी ने ऐसी देसी सिगड़ी बनाई, जिसमें गोबर और कृषि अवशेष से बने ईंधन से सिर्फ 300 रुपए में 800 लोगों का खाना तैयार हो रहा है।


300 रुपए में बन रहा 800 लोगों का खाना धुले के स्वयंसेवक राहुल कुलकर्णी ने बनाई खास सिगड़ी 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पश्चिमी क्षेत्र कार्यकर्ता विकास वर्ग (प्रथम वर्ष) में इस बार ईंधन बचत और पर्यावरण संरक्षण का अनूठा प्रयोग देखने को मिला। खानदेश एजुकेशन सोसायटी के एम. जे. कॉलेज परिसर में चल रहे 21 दिवसीय प्रशिक्षण वर्ग में लगभग 255 स्वयंसेवक प्रशिक्षण ले रहे हैं, जबकि 40 से 50 कार्यकर्ता विभिन्न व्यवस्थाएं संभाल रहे हैं। यहां प्रतिदिन 700 से 800 लोगों के भोजन की व्यवस्था की जाती है।

संघ कार्यकर्ताओं ने एलपीजी गैस के स्थान पर देसी एवं किफायती ईंधन का सफल प्रयोग किया है। जानकारी के अनुसार, इतने बड़े स्तर पर भोजन बनाने के लिए प्रतिदिन कम से कम दो बड़े एलपीजी सिलेंडरों की आवश्यकता पड़ती, जिस पर लगभग 6 हजार रुपये प्रतिदिन खर्च होने की संभावना थी। पूरे वर्ग की अवधि में यह खर्च करीब सवा लाख रुपये तक पहुंच सकता था।

इसी चुनौती के समाधान के लिए धुले के स्वयंसेवक राहुल कुलकर्णी ने विशेष प्रकार की ग्रेट (सिगड़ी) तैयार की, जिसमें गैस के स्थान पर कृषि अवशेष और गोबर से बने लकड़ी जैसे ब्लॉकों का ईंधन के रूप में उपयोग किया जा रहा है।

कृषि अवशेष से पर्यावरण अनुकूल ईंधन

सूखे कपास, तुअर के पौधों तथा गोबर से निर्मित इन जैविक ब्लॉकों की विशेषता यह है कि इनके उपयोग से धुआं बहुत कम निकलता है। बाजार में लगभग 150 से 200 रुपये प्रति बोरी उपलब्ध यह ईंधन अत्यंत सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल है। इस प्रयोग के कारण जहां प्रतिदिन 6 हजार रुपये खर्च होने का अनुमान था, वहीं अब मात्र लगभग 300 रुपये में भोजन तैयार किया जा रहा है।

सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने की सराहना

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने वर्ग प्रवास के दौरान इस प्रयोग का अवलोकन किया और इसकी सराहना की। उन्होंने कहा कि संघ शिक्षा वर्गों तथा देशभर में आयोजित अन्य कार्यक्रमों में भी इस प्रकार के प्रयोगों को प्रोत्साहित किया जाएगा। संघ के प्रशिक्षण वर्गों में अनुशासन, आत्मनिर्भरता और कम संसाधनों में प्रभावी प्रबंधन की परंपरा रही है। जामनेर में चल रहे संघ शिक्षा वर्ग में भी इसी प्रकार की व्यवस्था अपनाई जा रही है।

जलगांव और जामनेर के इन प्रयोगों को अब ग्रामीण क्षेत्रों, सामाजिक आयोजनों और बड़े समूह कार्यक्रमों के लिए उपयोगी मॉडल के रूप में देखा जा रहा है। ईंधन बचत, पर्यावरण संरक्षण और स्वदेशी तकनीक के समन्वय से किया गया यह प्रयोग अनेक लोगों के लिए प्रेरणा का विषय बन गया है।

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