सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा कि नीट पीजी परीक्षा डॉक्टरों की क्लिनिकल योग्यता तय नहीं करती, बल्कि पीजी सीटों के आवंटन का माध्यम है।
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने नीट-पीजी 2025 के क्वालिफाइंग पर्सेंटाइल कम करने के फैसले का बचाव करते हुए उच्चतम न्यायालय में शपथपत्र दाखिल किया है। सरकार ने कहा कि नीट पीजी परीक्षा डॉक्टरों की न्यूनतम क्लिनिकल क्षमता तय करने का माध्यम नहीं, बल्कि सीमित स्नातकोत्तर सीटों के आवंटन के लिए मेरिट सूची तैयार करने की प्रक्रिया है।
एमबीबीएस डिग्री से तय होती है योग्यता
केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में स्पष्ट किया कि किसी भी डॉक्टर की बुनियादी योग्यता एमबीबीएस डिग्री से स्थापित हो जाती है। नीट-पीजी स्कोर उम्मीदवारों के सापेक्ष प्रदर्शन और परीक्षा संरचना पर आधारित होता है, इसलिए इसे क्लिनिकल दक्षता का अंतिम पैमाना नहीं माना जा सकता। सरकार के अनुसार सभी उम्मीदवार पहले से ही लाइसेंस प्राप्त एमबीबीएस डॉक्टर होते हैं और स्वतंत्र रूप से चिकित्सा अभ्यास करने के पात्र होते हैं।
पर्सेंटाइल कम करना नीतिगत फैसला
सरकार ने अदालत को बताया कि क्वालिफाइंग पर्सेंटाइल घटाने का निर्णय एक नीतिगत मामला है। जब तक कोई निर्णय स्पष्ट रूप से मनमाना या असंवैधानिक न हो, तब तक न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित रहता है। हलफनामे में कहा गया कि पीजी मेडिकल सीटों पर भारी सार्वजनिक निवेश होता है और सीटें खाली रहना संसाधनों तथा प्रशिक्षण क्षमता की बर्बादी होगी।
रोगी सुरक्षा को लेकर उठी चिंताओं पर जवाब
रोगी सुरक्षा संबंधी चिंताओं को सरकार ने भ्रामक बताया। सरकार के मुताबिक पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल प्रशिक्षण तीन वर्ष का संरचित कार्यक्रम होता है, जिसमें उम्मीदवार वरिष्ठ संकाय और विशेषज्ञों की निगरानी में कार्य करते हैं। अंतिम क्षमता का मूल्यांकन एमडी और एमएस की अंतिम परीक्षाओं के माध्यम से किया जाता है। केंद्र सरकार ने कहा कि पर्सेंटाइल में कमी एक “अनुपातिक प्रशासनिक कदम” है, जिसका उद्देश्य पीजी सीटों को खाली रहने से रोकना और विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता बढ़ाना है।