दिल्ली में 24 मई को होने वाले जनजाति सांस्कृतिक समागम में 500 से ज्यादा जनजातियां शामिल होंगी। बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर आयोजित यह कार्यक्रम राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक गौरव का बड़ा संदेश देगा।
नई दिल्ली में 24 मई 2026 को होने वाला “जनजाति सांस्कृतिक समागम” अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनता जा रहा है। राजधानी के लाल किला मैदान में आयोजित इस विशाल कार्यक्रम में देशभर की 500 से अधिक जनजातियों के शामिल होने की संभावना है। आयोजकों का दावा है कि यह सिर्फ सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि जनजातीय अस्मिता, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता का एक बड़ा मंच बनने जा रहा है।
भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष के अवसर पर आयोजित हो रहे इस समागम में करीब डेढ़ लाख लोगों के पहुंचने का अनुमान है। खास बात यह है कि बड़ी संख्या में लोग अपने खर्च पर दिल्ली आ रहे हैं। ऐसे में यह आयोजन जनजातीय समाज की भावनात्मक भागीदारी और सांस्कृतिक जुड़ाव का भी संकेत माना जा रहा है।
बिरसा मुंडा की विरासत से जुड़ा बड़ा संदेश
दरअसल, इस आयोजन को भगवान बिरसा मुंडा की स्मृति से जोड़कर एक व्यापक सामाजिक संदेश देने की कोशिश की जा रही है। बिरसा मुंडा को जनजातीय समाज स्वतंत्रता, स्वाभिमान और सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक के रूप में देखता है। अंग्रेजों के खिलाफ उनके संघर्ष को आज भी आदिवासी क्षेत्रों में प्रेरणा के रूप में याद किया जाता है। आयोजकों का कहना है कि नई पीढ़ी को जनजातीय इतिहास और संघर्षों से जोड़ना भी इस कार्यक्रम का एक अहम उद्देश्य है। यही वजह है कि कार्यक्रम को केवल सांस्कृतिक मंच तक सीमित नहीं रखा गया है।
पांच जगहों से निकलेगी भव्य शोभायात्रा
इस समागम का सबसे बड़ा आकर्षण पारंपरिक सांस्कृतिक शोभायात्रा होगी। देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले जनजातीय समुदाय अपने पारंपरिक परिधान, लोकनृत्य, वाद्ययंत्र और सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ इसमें भाग लेंगे। अब समझिए कि आयोजन को लेकर उत्साह कितना बड़ा है यह शोभायात्रा दिल्ली के पांच अलग-अलग स्थानों से शुरू होकर लाल किला मैदान तक पहुंचेगी। वहां एक विशाल जनसभा आयोजित होगी। माना जा रहा है कि दिल्लीवासियों को पहली बार इतनी विविध जनजातीय संस्कृतियों को एक साथ देखने का अवसर मिलेगा।
अमित शाह के शामिल होने से बढ़ी राजनीतिक और सामाजिक अहमियत
आयोजकों ने जानकारी दी है कि केंद्रीय गृहमंत्री Amit Shah ने कार्यक्रम में शामिल होने का निमंत्रण स्वीकार कर लिया है। उनके संभावित शामिल होने से आयोजन की राजनीतिक और सामाजिक अहमियत दोनों बढ़ गई हैं। हालांकि, इस कार्यक्रम का फोकस राजनीतिक से ज्यादा सांस्कृतिक और सामाजिक संवाद पर रखा गया है। आयोजकों का कहना है कि जनजातीय समाज को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सांस्कृतिक सम्मान और संवाद बेहद जरूरी है।
“तू-मैं एक रक्त” का संदेश क्यों खास माना जा रहा है?
समागम का मुख्य विचार सूत्र रखा गया है “तू मैं एक रक्त, वनवासी – ग्रामवासी – नगरवासी, हम सब भारतवासी”। यही संदेश अब चर्चा का केंद्र बनता दिख रहा है।

इतनी बड़ी संख्या में लोगों के जुटने को देखते हुए तैयारियां भी बड़े स्तर पर की जा रही हैं। भोजन, पानी, आवास, यातायात, चिकित्सा और सुरक्षा व्यवस्था के लिए अलग-अलग समितियां बनाई गई हैं। बताया जा रहा है कि करीब 20 विभाग आयोजन की तैयारियों में लगे हुए हैं।