भारत में परोपकार की सबसे बड़ी ताकत आम आदमी है। सर्वे में खुलासा, 68% लोग हर साल दान करते हैं, उद्योगपतियों से भी ज्यादा
भारत के नामी उद्योगपतियों से कहीं ज्यादा आम लोग देश में बड़े धार्मिक दानवीर हैं। देश का आम आदमी हर साल करोड़ों रुपये दान करता है। लगभग 68 प्रतिशत आम लोग सालाना किसी न किसी रूप में दान करते हैं, जबकि उद्योगपतियों की भागीदारी अपेक्षाकृत कम है।वैसे तो भारत की परोपकार की कहानी बड़े लोगों के बड़े दान से शुरू होती है। इसमें कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) बजट, अरबपतियों के वादे और बड़े-बड़े फाउंडेशन शामिल हैं, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि देश में सबसे बड़े परोपकारी आम आदमी ही हैं।
इस तथ्य का खुलासा Ashoka University के Centre for Social Impact and Philanthropy (CSIP) द्वारा जारी ‘How India Gives 2025’ सर्वे रिपोर्ट में हुआ है।दाल-दान, कलश, दान-पात्र, ॐ जैसे पारंपरिक माध्यमों से भी लोग लगातार दान करते आ रहे हैं।
एक नजर में आंकड़े
68 प्रतिशत लोग किसी न किसी रूप में दान करते हैं
45 प्रतिशत दान धार्मिक संस्थाओं को
48 प्रतिशत दान वस्तुओं के रूप में
44 प्रतिशत नकद दान
30 प्रतिशत लोग स्वेच्छा सेवा भी करते हैं
आय के हर स्तर पर किया जाता है दान
रिपोर्ट का मुख्य निष्कर्ष यह है कि भारतीय परोपकार अभिजात्य-नेतृत्व वाला नहीं, बल्कि जन-संचालित, स्थानीय और संबंधात्मक है। यह आस्था, आमने-सामने की अपील और दैनिक जीवन की जिम्मेदारियों के आधार पर चलता है। दान आय के हर स्तर पर मौजूद है।इस सर्वे में देश के 20 राज्यों के शहरी और ग्रामीण इलाकों में 7,000 से अधिक लोगों के इंटरव्यू शामिल किए गए हैं।
40-45 प्रतिशत दान भिखारियों और बेसहारा लोगों को
दान का लगभग 40–45 प्रतिशत हिस्सा भिखारियों और बेसहारा लोगों को मिलता है।सर्वे में पाया गया कि दान पर निकटता और आस्था का गहरा प्रभाव है। लगभग 40–45 प्रतिशत दान धार्मिक संस्थाओं को जाता है।लगभग उतना ही हिस्सा भिखारियों और बेसहारा लोगों को, खासकर शहरी इलाकों में मिलता है।ग्रामीण भारत में धार्मिक संस्थाएं दान प्राप्त करने में सबसे आगे हैं।दान सिर्फ अमीरों तक सीमित नहीं है। आम आदमी की भागीदारी 70–80 प्रतिशत तक पहुंच जाती है।