भारत का स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम नाविक चुनौतियों से जूझ रहा है। कई सैटेलाइट तकनीकी खराबी के कारण काम नहीं कर रहे, जिससे सेना की नेविगेशन और मिसाइल मार्गदर्शन क्षमता पर असर पड़ने की चिंता बढ़ गई है।
नई दिल्ली। भारत का स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम नाविक चुनौतियों से जूझ रहा है। कई सैटेलाइट तकनीकी खराबी के कारण काम नहीं कर रहे, जिससे सेना की नेविगेशन और मिसाइल मार्गदर्शन क्षमता पर असर पड़ने की चिंता बढ़ गई है।
दुनिया आज नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम पर टिकी हुई है। मोबाइल से लेकर मिसाइल तक, सब कुछ इन पर निर्भर करता है। भारत ने भी इसी जरूरत को देखते हुए अपना स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम नाविक (NAVIC) बनाया था, ताकि किसी दूसरे देश के सिस्टम पर निर्भर न रहना पड़े। लेकिन अब इसी नाविक सिस्टम को लेकर चिंता बढ़ गई है।
मौजूदा हालात ऐसे हैं कि सिस्टम को चलाने के लिए जितने सैटेलाइट चाहिए, उतने सक्रिय नहीं हैं। कुछ सैटेलाइट तकनीकी कारणों से काम नहीं कर पा रहे, तो कुछ अपनी उम्र पार कर चुके हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर जल्दी सुधार नहीं हुआ, तो सेना की कई महत्वपूर्ण क्षमताओं पर असर पड़ सकता है।
कारगिल युद्ध से मिली थी सीख
भारत के अपने नेविगेशन सिस्टम की कहानी 1999 के कारगिल युद्ध से जुड़ी है। उस समय भारत ने अमेरिका से GPS की सटीक जानकारी मांगी थी। लेकिन अमेरिका ने यह डेटा देने से मना कर दिया था। उस घटना ने भारतीय रणनीतिक योजनाकारों को एक बात साफ कर दी कि अगर नेविगेशन के लिए पूरी तरह विदेशी सिस्टम पर निर्भर रहेंगे, तो युद्ध जैसी स्थिति में मुश्किल खड़ी हो सकती है। इसी अनुभव के बाद भारत सरकार ने स्वदेशी नेविगेशन नेटवर्क बनाने का फैसला लिया।
कैसे बना NAVIC सिस्टम
भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ISRO ने 2013 से 2018 के बीच IRNSS (Indian Regional Navigation Satellite System) सैटेलाइट लॉन्च किए। बाद में इसी सिस्टम को नाविक नाम दिया गया। नाविक भारत और उसके आसपास करीब 1500 किलोमीटर के दायरे में पोजीशन, नेविगेशन और टाइमिंग सेवाएं देता है।
दुनिया में इसके अलावा कई बड़े नेविगेशन सिस्टम हैं
अमेरिका का GPS
चीन का BeiDou
यूरोप का Galileo
रूस का GLONASS
लेकिन इनकी तरह वैश्विक कवरेज देने के बजाय नाविक मुख्य रूप से भारत और आसपास के क्षेत्र के लिए बनाया गया था।
सैटेलाइट क्यों हुए बेकार
एटॉमिक क्लॉक की विफलता बनी बड़ी वजह। नाविक सिस्टम में शुरू में 9 सैटेलाइट लॉन्च करने की योजना थी। इनमें से 8 सैटेलाइट अंतरिक्ष में पहुंचे, लेकिन कई में तकनीकी समस्या आ गई। सबसे बड़ी समस्या थी एटॉमिक क्लॉक का फेल होना। एटॉमिक क्लॉक सैटेलाइट का दिल माना जाता है। यही बेहद सटीक समय मापकर लोकेशन की गणना करता है। अगर यह काम करना बंद कर दे, तो सैटेलाइट नेविगेशन सेवा देने लायक नहीं रहता।
कई सैटेलाइट जैसे IRNSS-1A, 1C, 1D, 1E और 1G — में सभी एटॉमिक क्लॉक खराब हो गए, जिससे वे लगभग बेकार हो गए।
अब कितने सैटेलाइट काम कर रहे
फिलहाल स्थिति कुछ चिंताजनक बताई जा रही है। नाविक को सही तरीके से चलाने के लिए कम से कम चार सैटेलाइट सक्रिय होने चाहिए। लेकिन उपलब्ध जानकारी के मुताबिक अभी बहुत सीमित सैटेलाइट ही मुख्य नेविगेशन सेवा दे पा रहे हैं। एक सैटेलाइट की उम्र भी 10 साल से ज्यादा हो चुकी है, इसलिए उसके लंबे समय तक चलने को लेकर भी सवाल हैं। दूसरी ओर एक सैटेलाइट की एटॉमिक क्लॉक हाल ही में फेल होने की खबर भी सामने आई, जिसके बाद वह सिर्फ मैसेजिंग सर्विस दे रहा है।
दूसरी पीढ़ी के सैटेलाइट भी पूरी तरह सफल नहीं
इसरो ने पहली पीढ़ी की समस्याओं से सीखते हुए NVS सीरीज के सैटेलाइट तैयार किए। NVS-01 को 2023 में लॉन्च किया गया और यह सही तरीके से काम कर रहा है। लेकिन NVS-02 को 2025 में लॉन्च करने के बाद ऑर्बिट से जुड़ी समस्या आ गई। तकनीकी दिक्कत के कारण यह सैटेलाइट पूरी तरह नेविगेशन सेवा नहीं दे पा रहा। ISRO को कुल मिलाकर पांच NVS सैटेलाइट चाहिए, ताकि सिस्टम मजबूत बन सके, मगर अभी यह प्रक्रिया अधूरी है।
सेना और सुरक्षा के लिए क्या खतरे
अगर नेविगेशन सैटेलाइट की संख्या कम हो जाती है, तो इसका असर कई महत्वपूर्ण सैन्य ऑपरेशन पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार संभावित जोखिम ये हो सकते हैं-
-मिसाइल मार्गदर्शन की सटीकता प्रभावित होना
-नौसेना और वायुसेना के ऑपरेशन में लोकेशन संबंधी दिक्कत
-सैनिकों की पोजीशन ट्रैकिंग में त्रुटि
-युद्ध के समय विदेशी GPS पर निर्भरता बढ़ना जैसी सबसे बड़ी चिंता है। क्योंकि अगर युद्ध की स्थिति में विदेशी सिस्टम बंद हो जाए या डेटा सीमित कर दिया जाए, तो भारत को मुश्किल हो सकती है।
क्या है आगे की योजना
ISRO अब NVS-03 और अन्य सैटेलाइट जल्द लॉन्च करने की तैयारी कर रहा है। सरकार पहले भी कह चुकी है कि नई पीढ़ी के सैटेलाइट से सिस्टम मजबूत किया जाएगा। हालांकि अंतरिक्ष परियोजनाओं में देरी आम बात होती है, लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि नेविगेशन सिस्टम जैसे संवेदनशील क्षेत्र में समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। यह सिर्फ टेक्नोलॉजी का सवाल नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का भी मुद्दा है।