असम के जोरहाट में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। गौरव गोगोई की हार ने राज्य की राजनीति में नई दिशा तय कर दी है, जहां बीजेपी ने मजबूत बढ़त के साथ दबदबा कायम रखा है।
असम के जोरहाट से जो खबर आई, उसने कांग्रेस की रणनीति पर सीधे सवाल खड़े कर दिए। पार्टी के बड़े चेहरे गौरव गोगोई को यहां करारी हार का सामना करना पड़ा। मतगणना के शुरुआती रुझानों से ही तस्वीर साफ होने लगी थी। बीजेपी के हितेंद्र नाथ गोस्वामी लगातार बढ़त बनाए रहे और आखिरकार 23 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से जीत दर्ज कर ली।
यह हार सिर्फ एक सीट की नहीं मानी जा रही। इसे असम में कांग्रेस की पकड़ कमजोर होने के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है, खासकर तब जब पूरे राज्य में NDA बढ़त बनाए हुए है।
शुरुआत से ही पिछड़ते गए गोगोई
ईवीएम खुलते ही पहले राउंड में ही गौरव गोगोई पीछे नजर आए। उन्हें 3937 वोट मिले, जबकि बीजेपी उम्मीदवार को 4993 वोट हासिल हुए। दूसरे और तीसरे राउंड में भी अंतर कम होने के बजाय बढ़ता गया। गोगोई के वोट धीरे-धीरे जुड़ते रहे, लेकिन बीजेपी की बढ़त लगातार मजबूत होती गई। इस शुरुआती ट्रेंड ने साफ कर दिया था कि मुकाबला एकतरफा होने की ओर बढ़ रहा है।
हर राउंड में बढ़ती गई बीजेपी की बढ़त
पांचवें राउंड तक आते-आते अंतर हजारों में पहुंच गया। बीजेपी को 23,339 वोट मिल चुके थे, जबकि कांग्रेस 15,326 वोटों पर अटकी रही। मतगणना के हर चरण में यही पैटर्न दिखा। गोगोई कोशिश करते रहे, लेकिन वोटों का अंतर कम नहीं हो सका। राजनीतिक जानकार इसे संगठन और ग्राउंड कनेक्ट की कमी से जोड़कर देख रहे हैं।
आखिरी दौर तक नहीं पलटी बाजी
13वें और 14वें राउंड तक भी हालात नहीं बदले। गौरव गोगोई 45 हजार के आसपास सिमट गए, जबकि हितेंद्र नाथ गोस्वामी 68 हजार से ज्यादा वोट लेकर आगे निकल गए। अंत में 23,076 वोटों के अंतर से बीजेपी ने सीट अपने नाम कर ली। यह जीत सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी लेकर आई है।
राज्यभर में NDA की मजबूत स्थिति
सिर्फ जोरहाट ही नहीं, पूरे असम में रुझान NDA के पक्ष में जाते दिखे। शुरुआती आंकड़ों में NDA 98 सीटों पर आगे रहा, जबकि विपक्षी गठबंधन 25 सीटों पर सीमित दिखा। इससे साफ संकेत मिल रहा है कि राज्य में सत्तारूढ़ गठबंधन की पकड़ अभी भी मजबूत बनी हुई है।
वोटिंग और सियासी गणित का असर
9 अप्रैल को हुए मतदान में 85.96% की रिकॉर्ड भागीदारी दर्ज हुई थी। 2.5 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं ने हिस्सा लिया, जो जनता की राजनीतिक जागरूकता को दिखाता है। चुनाव मैदान में 722 उम्मीदवार थे, जिनमें कई क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दल शामिल थे। कांग्रेस ने सबसे ज्यादा 99 उम्मीदवार उतारे थे, जबकि बीजेपी ने 90 सीटों पर दांव खेला। लेकिन नतीजों ने दिखाया कि सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि रणनीति और जमीनी पकड़ ही चुनाव जीतने का असली फैक्टर बनती है।