कोच्चि (केरल): राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा है कि व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन तभी सुखद हो सकता है, जब राष्ट्र सुरक्षित और सशक्त हो। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपने विकास के साथ-साथ राष्ट्र निर्माण के लिए भी समर्पित रहें। डॉ. भागवत सोमवार को केरलम के कोच्चि स्थित एलमक्कारा में आयोजित बालगोपालम के ‘सुवर्णामृतम’ स्वर्ण जयंती कार्यक्रम के अंतर्गत बाल नेतृत्व शिविर के उद्घाटन समारोह को संबोधित कर रहे थे।
“राष्ट्र प्रथम की भावना से ही बनेगा ‘विश्व गुरु’ भारत”
उन्होंने कहा कि भारत को ‘विश्व गुरु’ बनाने के लिए सभी नागरिकों का सामूहिक प्रयास जरूरी है। भगवान श्रीकृष्ण का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जैसे गोवर्धन पर्वत उठाने से पहले सभी गोप-गोपियों ने प्रयास किया, उसी तरह समाज के हर वर्ग को आगे आना होगा। भागवत ने स्पष्ट किया कि केवल व्यक्तिगत प्रगति पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस प्रगति का उपयोग राष्ट्रहित में होना चाहिए।

भगवान श्रीकृष्ण को बताया आदर्श
अपने संबोधन में उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के जीवन को आदर्श बताते हुए कहा कि उन्होंने अपने जीवन में कई कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन हमेशा समाज और विश्व के कल्याण के लिए कार्य किया। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण ने कभी व्यक्तिगत सुख की तलाश नहीं की, बल्कि धर्म और न्याय की स्थापना के लिए पांडवों का मार्गदर्शन किया।
“केवल अच्छा व्यक्ति होना पर्याप्त नहीं”
डॉ. भागवत ने कहा कि समाज में केवल अच्छा व्यक्ति होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अपने गुणों और क्षमताओं का उपयोग देश के लिए करना जरूरी है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि स्वामी विवेकानंद और नारायण गुरु जैसे महापुरुषों ने अपने व्यक्तित्व और ज्ञान को समाज के कल्याण में लगाया, जिससे वे आज भी प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा पर दिया विशेष जोर
डॉ. भागवत ने कहा कि यदि देश सुरक्षित नहीं होगा, तो किसी भी व्यक्ति या परिवार का जीवन सुरक्षित नहीं रह सकता। इसलिए राष्ट्र की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आज भारत वैश्विक स्तर पर मजबूत स्थिति में है और भारतीयों को दुनिया भर में सम्मान मिल रहा है।
युवाओं को दी नेतृत्व की जिम्मेदारी
कार्यक्रम में मौजूद छात्रों और युवाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि आने वाले 10–15 वर्षों में देश की बागडोर उन्हीं के हाथों में होगी। उन्होंने युवाओं से अनुशासन, दृढ़ता और समर्पण के साथ आगे बढ़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जीवन में मूल्यों को अपनाना और बिना अहंकार तथा द्वेष के कार्य करना ही सच्ची तपस्या है।

सांस्कृतिक मूल्यों को बनाए रखने की प्रेरणा
डॉ. भागवत ने भारतीय संस्कृति को बनाए रखने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी परिस्थिति में अपनी सांस्कृतिक पहचान और मूल्यों को नहीं छोड़ना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का भाव हर व्यक्ति के जीवन का हिस्सा होना चाहिए। कार्यक्रम में बालगोपालम के कई पदाधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता भी उपस्थित रहे। आयोजन में नेतृत्व, संस्कार और राष्ट्र सेवा के विषयों पर विशेष चर्चा की गई।