बिहार की पांच राज्यसभा सीटों पर चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज। चार सीटें एनडीए के पक्ष में मानी जा रहीं, लेकिन पांचवीं सीट पर जोड़-तोड़ और रणनीति का खेल मुकाबले को रोचक बना रहा है।
नई दिल्ली। बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों पर चुनाव का बिगुल बज चुका है। नामांकन का आखिरी दिन गुरुवार है, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि अब तक किसी भी दल ने आधिकारिक तौर पर अपने उम्मीदवारों के नाम घोषित नहीं किए हैं। सियासी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। गणित कहता है कि चार सीटें एनडीए के खाते में जाना लगभग तय है, लेकिन असली लड़ाई पांचवीं सीट को लेकर है, जहां से खेल रोचक हो जाता है।
एनडीए के घटक दल भारतीय जनता पार्टी, जनता दल (यूनाइटेड) और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने क्लीन स्वीप का दावा कर रहे हैं। दूसरी तरफ राष्ट्रीय जनता दल ने नंबर गेम में पिछड़ने के बावजूद मैदान छोड़ने से इनकार कर दिया है।
नंबर गेम: गणित किसके साथ?
बिहार विधानसभा में एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए विधायकों के कम से कम 41 प्रथम वरीयता वोट चाहिए। मौजूदा स्थिति देखें तो एनडीए के पास कुल 202 विधायक हैं। इस हिसाब से वह 41-41 वोट देकर चार सीटें आसानी से निकाल लेगा। चार सीटों के बाद उसके पास 38 वोट बचते हैं। यानी पांचवीं सीट जीतने के लिए उसे कम से कम तीन अतिरिक्त विधायकों का समर्थन चाहिए। यहीं से सियासी जोड़-तोड़ की शुरुआत होती है।
वहीं, महागठबंधन जिसमें आरजेडी, कांग्रेस और वाम दल शामिल हैं के पास कुल 35 विधायक हैं। ऐसे में विपक्ष को भी एक सीट जीतने के लिए छह अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ेगी।
क्या तेजस्वी आजमाएंगे किस्मत?
आरजेडी ने अभी उम्मीदवार का नाम घोषित नहीं किया है, लेकिन राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि तेजस्वी यादव खुद राज्यसभा के मैदान में उतर सकते हैं। हालांकि पार्टी की रणनीति विपक्षी एकता पर टिकी है। अगर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के पांच विधायक और बसपा का एक विधायक विपक्ष के साथ आते हैं, तो मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। लेकिन क्या ये समर्थन पक्का है? यही बड़ा सवाल है।
एनडीए की रणनीति: तीसरा बीजेपी उम्मीदवार?
सूत्रों की मानें तो बीजेपी क्लीन स्वीप के इरादे से तीसरा उम्मीदवार उतारने पर गंभीरता से विचार कर रही है। दो सीटें उसके लिए सुरक्षित मानी जा रही हैं, लेकिन पांचवीं सीट के लिए वह पूरी ताकत झोंकने की तैयारी में है। अगर विपक्ष दो उम्मीदवार उतार देता है, तो वोटों का बंटवारा हो सकता है। ऐसी स्थिति में एनडीए को फायदा मिल सकता है, क्योंकि उसके पास पहले से मजबूत आधार है।
किन विधायकों पर टिकी नजर?
एनडीए की नजर खास तौर पर बसपा के एकमात्र विधायक और महागठबंधन से जुड़े आईआईपी विधायक आईपी गुप्ता पर बताई जा रही है। इसके अलावा कांग्रेस के कुछ विधायकों के बदले तेवर भी चर्चा में हैं। राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं होता, और बिहार की राजनीति तो वैसे भी अप्रत्याशित मोड़ों के लिए जानी जाती है। अगर तीन विधायक इधर-उधर होते हैं, तो तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है।
विपक्ष की चाल क्या होगी?
अख्तारुल ईमान पहले ही संकेत दे चुके हैं कि उनकी पार्टी अपना प्रत्याशी उतार सकती है। अगर विपक्षी खेमे से दो उम्मीदवार मैदान में आते हैं, तो समीकरण बदल सकता है। फिलहाल, नामांकन की आखिरी घड़ी तक सस्पेंस बरकरार है। चार सीटों पर तस्वीर लगभग साफ है, लेकिन पांचवीं सीट बिहार की राजनीति का असली टेस्ट बन चुकी है। देखना दिलचस्प होगा कि यह चुनाव केवल गणित से तय होगा या राजनीति की केमिस्ट्री कुछ नया रंग दिखाएगी।