‘भूत बंगला’ फिल्म समीक्षा में अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की जोड़ी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई। कॉमेडी और हॉरर का मिश्रण प्रभाव नहीं छोड़ता। फिल्म को मिली 2/5 रेटिंग।
‘भूत बंगला’ को लेकर दर्शकों में उम्मीदें काफी अधिक थीं, खासकर इसलिए क्योंकि अक्षय कुमार और निर्देशक प्रियदर्शन की जोड़ी पहले ‘हेरा फेरी’, ‘गरम मसाला’ और ‘भागम भाग’ जैसी सफल कॉमेडी फिल्में दे चुकी है। लेकिन यह फिल्म उस स्तर को दोहराने में सफल नहीं हो पाती।
कहानी: डर और कॉमेडी के बीच उलझी पटकथा
फिल्म की कहानी अर्जुन के इर्द-गिर्द घूमती है, जो लंदन से अपने पैतृक महल मंगलपुर लौटता है। उसकी बहन मीरा की शादी की तैयारियां चल रही होती हैं, लेकिन महल में रहस्यमयी घटनाएं शुरू हो जाती हैं। धीरे-धीरे कहानी में हॉरर और कॉमेडी दोनों को जोड़ने की कोशिश की जाती है, लेकिन फिल्म किसी एक दिशा में मजबूत पकड़ नहीं बना पाती। घटनाएं तो होती हैं, लेकिन उनका प्रभाव कमजोर रह जाता है।
अक्षय की कोशिश, राजपाल यादव का असर
अक्षय कुमार पूरी फिल्म को संभालने की कोशिश करते हैं। उनकी कॉमिक टाइमिंग कुछ जगहों पर असरदार है, लेकिन नया कुछ खास देखने को नहीं मिलता। राजपाल यादव कुछ दृश्यों में फिल्म को हल्का और मनोरंजक बनाते हैं। वहीं वामिका गब्बी और तब्बू के किरदारों को पर्याप्त गहराई नहीं मिल पाती, जिससे उनका प्रभाव सीमित रह जाता है।
सपोर्टिंग कास्ट का सीमित असर
परेश रावल, मनोज जोशी और असरानी जैसे अनुभवी कलाकार मौजूद होने के बावजूद उनके हिस्से में प्रभावशाली दृश्य कम ही आते हैं। असरानी के कुछ सीन जरूर हल्की मुस्कान छोड़ते हैं।
निर्देशन और लेखन: कमजोर स्क्रीनप्ले
प्रियदर्शन का निर्देशन कुछ दृश्यों में उनकी पुरानी शैली की झलक देता है, लेकिन पूरी फिल्म एक संतुलित लय नहीं पकड़ पाती। सबसे बड़ी कमी कमजोर स्क्रीनप्ले है, जिसमें हास्य और हॉरर के बीच संतुलन नहीं बन पाता।
‘भूत बंगला’ एक औसत फिल्म साबित होती है। यह न तो पूरी तरह निराश करती है और न ही यादगार बन पाती है। यदि बिना ज्यादा उम्मीद के देखी जाए तो कुछ हल्के मनोरंजन के पल मिल सकते हैं, लेकिन अक्षय-प्रियदर्शन की पुरानी चमक इसमें नजर नहीं आती।