क्रिसिल रेटिंग्स ने चेताया है कि नीतिगत बदलावों से बचने के लिए ब्रोकिंग कंपनियों को विविधीकरण अपनाना होगा, वरना कमाई पर दबाव बढ़ेगा
क्रिसिल रेटिंग्स एजेंसी ने सरकारी नीतियों में बदलाव से बचने की दी सलाह
सरकारी नीतियों और नियामकीय बदलावों के बीच ब्रोकिंग कंपनियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। बाजार अध्ययन एवं साख निर्धारक एजेंसी क्रिसिल रेटिंग्स ने ब्रोकिंग कंपनियों को सलाह दी है कि वे सरकारी नीतियों में अचानक होने वाले बदलावों से बचने के लिए अपने कारोबार और राजस्व स्रोतों में विविधीकरण अपनाएं।
क्रिसिल की मंगलवार को जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट में डेरिवेटिव्स कारोबार पर सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) बढ़ाए जाने से ब्रोकिंग कंपनियों की आय पर दबाव बढ़ सकता है। इसके अलावा हाल की तिमाहियों में भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) द्वारा किए गए नियामकीय बदलावों ने भी बाजार की गतिविधियों को प्रभावित किया है।
सेबी के नियमों से बदली बाजार की चाल
रिपोर्ट के मुताबिक सेबी के नए नियमों का मकसद अनुमान आधारित ट्रेडिंग पर लगाम लगाना, खुदरा निवेशकों के हितों की रक्षा करना और बाजार में पारदर्शिता बढ़ाना है। हालांकि इन बदलावों का असर ब्रोकिंग कंपनियों के कारोबार पर साफ दिखाई देने लगा है.क्रिसिल रेटिंग्स की निदेशक मालविका भोटिका ने 25 ब्रोकिंग कंपनियों के प्रदर्शन के विश्लेषण के आधार पर बताया कि जिन कंपनियों ने अपने राजस्व स्रोतों को विविध बनाया है, वे इन उतार-चढ़ावों से बेहतर तरीके से निपट पा रही हैं।
पारंपरिक ब्रोकिंग मॉडल पर ज्यादा असर
रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन कंपनियों की आय का बड़ा हिस्सा सिर्फ ब्रोकिंग शुल्क या प्रॉप्राइटरी ट्रेडिंग से आता है, उनके राजस्व में गिरावट दर्ज की गई है। वित्त वर्ष 2024-25 की दूसरी छमाही में पारंपरिक ब्रोकिंग कंपनियों की आय में करीब 15 फीसदी की कमी देखी गई.इसके उलट, जिन ब्रोकिंग कंपनियों का दो-तिहाई राजस्व गैर-बैंकिंग और गैर-ट्रेडिंग गतिविधियों से आता है, वे बाजार की अनिश्चितता का बेहतर तरीके से सामना कर पा रही हैं। कई कंपनियों ने राजस्व में गिरावट की भरपाई के लिए ब्रोकरेज शुल्क बढ़ाए हैं और कुछ सेवाओं पर पहली बार शुल्क लगाना शुरू किया है।
जनवरी में बिजली की मांग ने बनाया रिकॉर्ड
इस बीच क्रिसिल रेटिंग्स ने एक अन्य रिपोर्ट में बताया कि जनवरी महीने में देश की बिजली मांग 4.5 फीसदी बढ़कर करीब 143 अरब यूनिट तक पहुंच गई, जो कम से कम 2010 के बाद का रिकॉर्ड स्तर है.रिपोर्ट के अनुसार उत्तरी और पूर्वी भारत में पड़ी तेज शीतलहर के चलते घरों को गर्म रखने के लिए बिजली की खपत बढ़ी। जनवरी के पहले पखवाड़े में पश्चिमी और पश्चिमोत्तर भारत में औसत न्यूनतम तापमान सामान्य से दो से चार डिग्री सेल्सियस कम रहा।
उत्तर भारत में बिजली की मांग 5.5 फीसदी ज्यादा दर्ज की गई, जिसमें औद्योगिक खपत का भी अहम योगदान रहा। जनवरी में देश का विनिर्माण गतिविधि सूचकांक दिसंबर के 55 से बढ़कर 55.4 पर पहुंच गया। कुल बिजली मांग में औद्योगिक और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं की हिस्सेदारी लगभग 50 फीसदी रही।