स्वामी विवेकानंद का रोम-रोम राष्ट्रभक्ति और भारतीयता से परिपूर्ण था

जितेन्द्र ब्रह्मभट्ट यूथ मोटिवेटर एवं लाइफ कोच

Update: 2024-01-11 14:20 GMT

वेबडेस्क।  भारत भूमि पर समय-समय पर ऐसी दिव्या विभूतियां जन्म लेती रही हैं। जिन्होंने संपूर्ण मानव जाति को अपनी प्रतिभा से आश्चर्य चकित किया है। जब संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1984 में अंतरराष्ट्रीय युवा वर्ष घोषित किया। तब इस समय भारत सरकार ने उसकी महत्ता को समझते हुए।सन 1984 में यह घोषणा कि स्वामी विवेकानन्द जी के जन्मदिन 12 जनवरी को ही राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाएगा। स्वामी विवेकानंद अमेरिका के शिकांगो में आयोजित सर्व धर्म सम्मेलन से लौटते समय रामेश्वरम के पंबन तट पर कहा था कि " मेरी चिर पुरातन भारत माता एक बार फिर जाग रही है, मैं ना तो ज्योतिषी हूं , ना भविष्य वक्ता लेकिन मैं प्रत्यक्ष रूप से आने वाले देख रहा हूं कि आने वाली सादिया भारत की ही होगी।जिनकी आंखें नहीं है वह इसे देख नहीं सकते,विक्षिप्त बुद्धि के लोग इसे समझ नहीं सकते।

फ्रांसीसी चिंतक रोमा रोला ने रविंद्र नाथ टैगोर से पूछा कि मैं बिना भारत जाए भारत को जानना और समझना चाहता हूं,तो रविंद्र नाथ टैगोर ने कहा कि आप स्वामी रामकृष्ण परमहंस के साहित्य का अध्ययन करें फिर रोमा रोला ने कहा अगर मैं स्वामी रामकृष्ण परमहंस को समझना चाहता हूं तो क्या करूं? तब रविंद्र नाथ टैगोर ने कहा कि आप स्वामी विवेकानंद के साहित्य का अध्ययन करें उनमें सब सकारात्मक एवं भावनात्मक है, नकारात्मक कुछ भी नहीं है। रोमा रोला के अनुसार स्वामी विवेकानंद रोम रोम राष्ट्रभक्ति एवं भारतीयता से सराबोर था।

1893 में शिकागो की यात्रा करते समय स्वामी विवेकानंद की जी की मुलाकात जमशेद सिंह टाटा जी से हुई।उस समय टाटा जी अपने उद्योग और व्यावसायिक को बढ़ाने की दृष्टि से विदेशों का भ्रमण कर रहे थे।और स्वामी विवेकानन्द अपने गुरू का सन्देश और शिक्षा भारतीय ज्ञान के प्रचार प्रसार के उद्देश्य से अपनी यात्रा पर थे।स्वामी विवेकानंद जब डक पर खड़े हुए थे तो जमशेद सिंह टाटा जी ने उन्हें उनसे कहा कि आप शक्ल और वेशभूषा से तो भारतीय लगते हैं। परिचय के बाद दोनों ने अपनी यात्रा के उद्देश्य पर चर्चा की कुछ दिनों तक वह लोग साथ में रहे। विभिन्न विषयों को लेकर उनकी चर्चा होती रही उसे समय स्वामी विवेकानंद की उम्र मात्र 30 वर्ष की थी और जमशेद सिंह टाटा 50 वर्ष से अधिक के थे। स्वामी विवेकानंद के विज्ञान, तकनीक,अर्थशास्त्र, उद्योग और खनिज के संबंध में स्वामी जी की जानकारी देखकर वह दंग रह गए। आज ही टाटा स्टील कंपनी के संग्रहालय में उनकी बातचीत का सम्पूर्ण जानकारी उपलब्ध है। उसे समय स्वामी जी ने उन्हें भारत में उद्योग लगाने के लिए प्रेरित किया जिससे कि भारत के युवाओं को रोजगार मिल सके भारत के संसाधनों का सही उपयोग हो सके और भारत की आर्थिक स्थिति सुधर सके।स्वामी जी की प्रेरणा से टाटा जी ने बेंगलुरु में टाटा शोध संस्थान की नींव रखी।

स्वामी विवेकानंद जी के प्रत्यक्ष रूप से संन्यास धर्म में आने के कारण स्वतंत्रता आंदोलन में भाग तो नहीं लिया लेकिन कर्म और चिंतन की प्रेरणा से हजारों ऐसे युवकों को तैयार कर दिया जिन्होंने अपना सर्विस राष्ट्र को समर्पित कर दिया सुभाष चंद्र बोस जब 15 वर्ष के थे तब स्वामी विवेकानंद ने उनके जीवन में साहित्य के रूप में प्रवेश किया उनके अंदर मानसिक क्रांति का उदय हुआ और जीवन का भटकाव खत्म हुआ और अपने जीवन का लक्ष्य मिल गया उन्होंने कहा यदि स्वामी विवेकानंद जीवित होते तो मैं उनके चरणों में बैठा होता और उन्हें अपने उन्हें अपने गुरु के रूप में स्वीकार करता।वो कहते हैं यदि आप स्वामी विवेकानंद का साहित्य लेट कर पढ़ रहे हैं ,तो पता नहीं कब उठकर बैठ जाएंगे, और यदि आप स्वामी विवेकानंद का साहित्य बैठकर पढ़ रहे हैं तो पता नहीं आप कब उठकर खड़े हो जाऐगे। अगर आप स्वामी विवेकानंद का साहित्य खड़े-खड़े पढ़ रहे हैं तो यह भी पता नहीं कि आपका उनके कामों में लग जाए। सुभाष चंद्र बोस ने कहा "मैं जब तक जीवित रहूंगा रामकृष्ण परमहंस एवं स्वामी विवेकानंद के प्रति वफादार और समर्पित रहूंगा।" रविंद्र नाथ टैगोर स्वामी विवेकानंद जी के बारे में रहते हैं कि "यदि भारत यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद के साहित्य को पढ़ें उनमें सब सकारात्मक है नकारात्मक कुछ भी नहीं है।" महात्मा गांधी जब भारत आए तो उन्होंने स्वामी विवेकानंद से मिलने का कई बार प्रयास किया महात्मा गांधी विवेकानंद जी से नहीं मिल पाए लेकिन 30 जनवरी 1921 को जयंती पर बेलूर मठ में गए थे एक कार्यक्रम में भाग लेते हुए उन्होंने कहा कि कहा कि "स्वामी विवेकानंद के कार्यों को पढ़ने के बाद देश के लिए देशभक्ति हजार गुना बढ़ गई है।"

आज वर्तमान परिवेश में युवाओं को स्वामी विवेकानंद को अवश्य पढ़ाना चाहिए। क्योंकि स्वामी विवेकानंद के संपर्क में जो भी आता है।उसका जीवन परिवर्तित हो जाता है।स्वामी विवेकानंद को अपना आदर्श मानने वाले अनुयाई समाज और राष्ट्र के लिए संवेदनशील होते हैं संवेदनशीलता के साथ-साथ उनका दुख और पीड़ा को देखकर उसे दूर करने की योजना भी बनाते हैं। केवल योजना दूसरों को बताते ही नहीं है बल्कि योजना को पूर्ण करने में जुट जाते हैं युवा जब तक कि जब तक भटकता रहेगा। जब तक वह स्वामी विवेकानंद के साहित्य का अध्ययन नहीं करेगा। पढ़ने और समझने के बाद वह राष्ट्र और समाज को समर्पित हो जाएगा।

लेखक

जितेन्द्र ब्रह्मभट्ट यूथ मोटिवेटर एवं लाइफ कोच

गुना मध्यप्रदेश

(15 वर्षों से स्वामी विवेकानन्द के कार्य को स्वामी विवेकानन्द ग्रुप के माध्यम से कर रहे हैं।)

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