मनुष्य की अंतरात्मा में बसा सौंदर्यबोध है 'कैलीग्राफी'

मधुकर चतुर्वेदी

Update: 2022-07-05 01:15 GMT

आगरा। कला के अनेक रूप हैं। चित्रकारी से लेकर मूर्तिकारी, नृत्य से लेकर संगीत और वास्तुकला...। इन सभी ने मानव के गुणों के साथ संस्कृति को विकसित किया है। जहाँ समय के साथ-साथ कुछ कलाएं विकसित होती गयीं तो वहीं, कुछ कलाएं समय की धारा में या तो विलुप्त हो गयीं या विलुप्त होने की कगार पर पहुँच गयीं। ऐसी ही विलुप्त होने की कगार पर पहुँच चुकी कलाओं में से एक है अक्षरांकन यानि 'कैलीग्राफी'। मनुष्य की अंतरात्मा में बसे सौंदर्यबोध को शब्दों और बाद में अक्षरों के माध्यम से आकृति का रूप लेती कैलीग्राफी कला को जीवंत बनाने के लिए 'डाॅ. रूपाली खन्ना' नए आयाम दे रहीं हैं। स्वदेश को दिए साक्षात्कार में आगरा निवासी देश की जानी-मानी आर्टिस्ट डाॅ. रूपाली खन्ना ने 'मधुकर चतुर्वेदी' से बातचीत में कहा कि कैलीग्राफी अक्षरों के जरिये ईश्वर की आराधना है।


प्र. कैलीग्राफी क्या है?

उ. कैलीग्राफी भारतीय प्राचीन कला का एक रूप है। इसमें अक्षर कलाओं के विविध रूपों का दर्शन होता है। आज संगीत, मूर्तिकला, शिल्प का नाम तो हर कोई लेता है लेकिन, कैलीग्राफी का कोई नाम नहीं लेता। यह लुप्त होती हुई कला है, इसे संरक्षण की आवश्कता है। भाषा के लिखित रूप यानि लीपि की सुंदरता ही कैलीग्राफी है। साधारण अर्थों में कैलीग्राफी अक्षरकला है। इसे अक्षरांकन और सुलेख भी कहा जाता है। अक्षरों को अर्थपूर्ण, सुव्यवस्थित व कला का रूप देना ही कैलीग्राफी है।

प्र. कैलीग्राफी का इतिहास कितना पुराना है?

उ. जब से भाषा का विकास हुआ है, तभी से कैलीग्राफी ने भी समाज में अपनी जगह बनायी। विश्व का सबसे बड़ा अविष्कार भाषा के लिखित रूप में था। जब भी हम कोई पत्र को पढ़ते हैं, तो पहले उसे देखते हैं। देखकर ही उसकी ओर आकर्षित होते हैं। कैलीग्राफी से ही भाषा लिखित रूप में शुरू हुई। कैलीग्राफी में अक्षरों का प्रयोग जितना पढ़ने में है, उससे कहीं अधिक उसकी कला को निखारने में है। कैलीग्राफी का प्रारंभ भारत में प्राचीनकाल में राजकीय संदेश लिखने, ग्रंथों को लिखने, शिलालेखों के रूप में मिलता है। धातु और पत्थरों से होती हुई यह कला आज कागजों तक सिमिट गयी है।


प्र. भारत में कैलीग्राफी कैसे शुरू हुई?

उ. भारत शुरू से ही कलाओं की जन्मभूमि रही है। भारतीय ग्रंथों का लेखन कैलीग्राफी में ही है। ब्राह्मी लिपि, देवनागरी लिपि से ही कैलीग्राफी कला को लोग जानने और अपनाने लगे। कैलीग्राफी को हम लिपि में बोलते हैं। वेद और पुराण भी कैलीग्राफी में लिखे गए। भरतमुनि का नाट्यशास्त्र भी कैलीग्राफी का एक रूप है। कैलीग्राफी स्टाइल में लिखने की कला सदियों पुरानी है। उर्दू, चाइनिज, कोरियन, हिंदी भाषा में भी कैलीग्राफी की जाती है। मुगल अपनी आत्मकथा लिखने के लिए इस कला का इस्तेमाल करते थे। देश का संविधान लिखने के लिए भी कैलीग्राफी का भी इस्तेमाल किया गया था।

प्र. कई लोगों को मानना है कि कैलीग्राफी सिर्फ अंग्रेजी भाषा में ही लिखी जाती है?

उ. यह बिल्कुल गलत धारणा है। अंग्रेजी भाषा में कैलीग्राफी बहुत बाद में आयी। जबकि सत्य तो यह है कि कैलीग्राफी का आधार संस्कृत भाषा है। आज पूरी दुनियां में कैलीग्राफी हो रही है, तो उसका श्रेय देवभाषा संस्कृत को जाता है। यह बात तो सभी जानते हैं कि संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। भाषाओं का लिखित रूप भी संस्कृत से जन्मा है। ओम जिसे यूनिवर्सल साउंड मानते हैं, वह वेदध्वनि है। बुद्ध, जैन ग्रंथ, पुराण, वेद यह सभी कैलीग्राफी में लिखे गए हैं। ज्ञान भाषा से आता है और बिना भाषा के ज्ञान संभव नहीं।


प्र. कैलीग्राफी की तकनीक क्या है?

उ. कैलीग्राफी को लोग एक खूबसूरत हैंडराइटिंग मानते हैं, जबकि कैलीग्राफी में प्रत्येक अक्षर को लिखने में एक घंटे का समय लगता है। हाथों को साध कर रखना, उसका अनुशासन बनाना पूर्व की तैयारी का हिस्सा है। कैलीग्राफी में इरेजर के लिए कोई स्थान नहीं है। पूर्व में लिपियों का अध्ययन करना बहुत जरूरी है। कुछ गड़बड़ हुई तो पूरा पृष्ठ ही बेकार हो जाता है और दुबारा शुरू करना पड़ता है। उदाहरण के लिए ग्रंथों को देख लें, उसमें कोई भी अक्षर आपको कटा हुआ नहीं मिलेगा।

प्र. क्या इसके लिए कुछ विशेष उपकरण होते हैं?

उ. हां, कैलीग्राफी के उपकरण (टूल्स) अगल प्रकार के होते हैं। पहले बांस और पक्षियों के परों को निब की तरह उपयोग किया जाता था लेकिन, आज ब्रश, कैलीग्राफी निब और पेन का उपयोग किया जा रहा है। जिनकी निब चपटी, गोल अथवा नुकीली होती है। कुछ विशेष प्रकार के सजावटी उद्देश्यों के लिए कई निब वाले पेन अथवा स्टील के ब्रश का भी प्रयोग किया जाता है। लिखने के लिए प्रयुक्त स्याही पानी और चित्रकारी में काम आने वाली तेल आधारित स्याही का उपयोग होता है।

प्र. आपने कैलीग्राफी कब और कैसे शुरू की?

उ. मुझे बचपन से ही भारतीय कलाओं से प्रेम था। भारतीय कलाएं विश्व को मार्गदर्शन देती हैं। शुरू में मैनें पेटिंग्स की। मैं शुरू से ही देवनागरी लिपि से प्रभावित रही। देवनागरी में देव क्यों है और यह नागरी कैसे बनी। यानि देवताओं की लिपि और देवताओं की कला। मैनें चुनौतियों को स्वीकार करते हुए ग्रंथों का अध्ययन शुरू किया। मैं भारतीय अक्षर कला से प्रभावित हुई और शुरू कैलीग्राफी का सफर

प्र. कैलीग्राफी को लेकर आपकी भविष्य की योजना क्या है?

उ. भारतीय प्राचीन ग्रंथों के अक्षरांकन के अलावा ब्रज की प्राचीन पदावलियों के ग्रंथ, बौद्ध ग्रंथ और गुरूमुखी कैलीग्राफी पर कार्य करना है। इसके अलावा यूरोपियन, इटालियन स्क्रीप्ट पर कार्य चल रहा है। विंटेज टूल्स की तकनीक को जानने का भी प्रयास चल रहा है। भारत की हर भाषा में कैलीग्राफी करने की योजना है।

प्र. कैलीग्राफी आगे बढ़े, इसके लिए अभी तक क्या किया?

उ. देवनागरी और ब्राह्मी लिपि के अक्षरों की कला पर कार्यशाला की। 2016 से अभी तक 1 हजार कार्यशाला कर चुकी हूं और लगभग इतने ही छात्रों को कैलीग्राफी का प्रशिक्षण भी दे चुकी हूं। कई प्रदशर्नी भी आयोजित की हैं। उप्र, मप्र के कई छात्र प्रशिक्षण के बाद काम कर रहे हैं। कम्यूटर से इतर कुछ फांट तैयार करने के अलावा अपनी स्वयं की स्क्रीप्ट तैयार करने की योजना है। समारोहों के निमंत्रण पत्रो, फॉन्ट डिजाइन और प्रतीक चिह्न (लोगो) निर्माण, धार्मिक कला सामग्री तैयार की है। आगे फिल्म और टेलीविजन जगत में रंगमच की सहायक सामग्री में भी कैलीग्राफी का उपयोग कैसे बढ़े, इस पर कार्य करना है। आगरा में कलासाधना आर्ट और कैलीग्राफी स्टूडियो की स्थापना की है।

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