भोपाल में फर्जी ले-आउट का बड़ा खेल उजागर, पार्क की जमीन पर बना दिए प्लॉट, FIR दर्ज
राजधानी भोपाल में सहकारी संस्था की भूमि के नगर एवं ग्राम निवेश से स्वीकृत ले-आउट नक्शे में कूटरचना कर सार्वजनिक पार्क, मंदिर, ओपन स्पेस और विद्युत ट्रांसफार्मर के लिए आरक्षित भूमि को प्लॉट दर्शाकर फर्जी तरीके से बेचने के मामले में आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू) ने एक बिल्डर-कॉलोनाइज़र और उसके साथियों के खिलाफ कूटरचना, धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र सहित अन्य धाराओं में मामला दर्ज किया है।
स्वीकृत नक्शे से छेड़छाड़
इस प्रकरण की शिकायत भोपाल निवासी दीपक शुक्ला ने 10 दिसंबर 2025 को आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ में की थी। शिकायत में रॉयल हेरिटेज बिल्डर कॉलोनाइज़र से जुड़े जीशान अली पर विभिन्न सहकारी संस्थाओं की भूमि में गड़बड़ी करने और संस्थाओं की जमीन को चालाकी व षड्यंत्र के तहत स्वयं तथा अपने परिवार के नाम कराने के आरोप लगाए गए थे। शिकायत में विशेष रूप से नरेला शंकरी क्षेत्र स्थित एक सहकारी संस्था की भूमि पर स्वीकृत ले-आउट के विपरीत कार्य किए जाने का उल्लेख किया गया था।
इन पर FIR दर्ज
जांच के आधार पर ईओडब्ल्यू ने जीशान अली, एम.एस. बख्श, स्वर्गीय मवासी राम सिंह एवं अन्य अज्ञात व्यक्तियों के विरुद्ध भारतीय दंड विधान की धारा 120-बी, 420, 467, 468 और 471 के अंतर्गत एफआईआर दर्ज कर विवेचना प्रारंभ कर दी है।
आरक्षित भूमि पर बेचे गए प्लॉट
ग्राम निवेश द्वारा स्वीकृत मूल ले-आउट के अनुसार जांच में यह तथ्य सामने आया कि भूमि का एक हिस्सा आवासीय प्लॉटों के लिए था, जबकि शेष भूमि ओपन स्पेस, पार्क, मंदिर और विद्युत ट्रांसफार्मर के लिए आरक्षित थी। आरोपियों ने मिलकर सार्वजनिक उपयोग की इस भूमि को अवैध रूप से बेचने की योजना बनाई।
नरेला शंकर गृह निर्माण सहकारी समिति, भोपाल की कुल 17.28 एकड़ भूमि में से पार्क और ओपन स्पेस के लिए आरक्षित जमीन को फर्जी नक्शा तैयार कर प्लॉट दर्शाया गया और आम नागरिकों को बेच दिया गया।
जो प्लॉट था ही नहीं, वह 24 साल पहले बेच दिया
कॉलोनी में दर्शाए गए प्लॉट क्रमांक 262 को 17 सितंबर 2002 को अविनाश मिश्रा को बेचा गया। जांच में सामने आया कि मौके पर ऐसा कोई प्लॉट मौजूद ही नहीं था। वहां पार्क, मंदिर और विद्युत ट्रांसफार्मर स्थापित थे।
फर्जी नक्शे से बनाए गए 14 प्लॉट
फर्जी नक्शे में ओपन स्पेस की भूमि पर हाथ से प्लॉट क्रमांक 254 से 267 तक कुल 14 प्लॉट बनाए गए। प्लॉट की बिक्री से प्राप्त राशि एम.एस. बख्श के माध्यम से जीशान अली तक पहुंची। इन तथ्यों के आधार पर ईओडब्ल्यू ने षड्यंत्र, धोखाधड़ी और फर्जी दस्तावेजों से जुड़े अपराध में प्रकरण दर्ज किया है।
30 साल बाद ऑडिट में बदला अध्यक्ष का नाम
जांच में यह भी सामने आया कि नरेला शंकर गृह निर्माण सहकारी समिति का पंजीयन वर्ष 1976 में हुआ था। प्रारंभ में इसके संस्थापक अध्यक्ष दिनेश शर्मा थे, लेकिन वर्ष 2005-06 के ऑडिट रिकॉर्ड में एम.एस. बख्श को अध्यक्ष दर्शाया गया है। इससे स्पष्ट हुआ कि उस अवधि में संस्था का वास्तविक संचालन एम.एस. बख्श के हाथों में था, जिनका जीशान अली से पारिवारिक संबंध बताया गया है।
शिकायतकर्ता अविनाश मिश्रा ने बताया कि उन्होंने एक लाख पांच हजार रुपये देकर प्लॉट क्रमांक 262 खरीदा था, लेकिन मौके पर पहुंचने पर पाया कि रजिस्ट्री में दर्शाया गया प्लॉट वास्तविकता में मौजूद ही नहीं है। वहां पार्क, मंदिर और विद्युत ट्रांसफार्मर स्थित थे।
मां के नाम खरीदी गई थी जमीन
जांच में यह भी सामने आया कि नरेला शंकर गृह निर्माण सहकारी समिति द्वारा खसरा क्रमांक 243, रकबा 17.28 एकड़ भूमि 28 फरवरी 1998 को निकहत शमीम (जीशान अली की मां) के नाम से सहकारी समिति की सदस्य के रूप में खरीदी गई थी। 2 नवंबर 1976 को टीएनसीपी से स्वीकृत मूल ले-आउट नक्शे में कुछ भूमि को ओपन स्पेस के रूप में दर्शाया गया था।
आरोप है कि 17 सितंबर 2002 को जीशान अली, एम.एस. बख्श और मवासी राम सिंह ने स्वीकृत नक्शे के विपरीत एक कूटरचित और अस्वीकृत नक्शा तैयार कराया और फर्जी नक्शा संलग्न कर प्लॉट क्रमांक 262 दर्शाते हुए अविनाश मिश्रा को बेच दिया।