राष्ट्रपति बोलीं- छत्तीसगढ़ मुझे हमेशा घर जैसा लगता है, बस्तर की संस्कृति सबसे मीठी

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बस्तर पंडुम में कहा– छत्तीसगढ़ हमेशा घर जैसा लगता है, बस्तर की संस्कृति प्राचीन और सबसे मीठी है।

Update: 2026-02-07 08:04 GMT

जगदलपुर। लालबाग मैदान में मंच से राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने छत्तीसगढ़ आना मुझे हमेशा घर जैसा लगता है। यहां की संस्कृति बहुत प्राचीन है और उतनी ही मीठी भी। उन्होंने कहा कि बस्तर पंडुम यहां के लोग सिर्फ़ देखते नहीं, बल्कि उसे उत्सव की तरह जीते हैं। बस्तर की सुंदरता और संस्कृति देश-दुनिया के पर्यटकों को अपनी ओर खींचती है।

बस्तर पंडुम: परंपरा, पहचान और गर्व का मंच

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू शनिवार को जगदलपुर के लालबाग मैदान में आयोजित बस्तर पंडुम कार्यक्रम में शामिल हुईं। इस मौके पर विभिन्न जनजातियों ने अपने पारंपरिक नृत्य, लोकगीत, वाद्ययंत्र, वेशभूषा और रीति-रिवाजों की मनमोहक प्रस्तुतियां दीं। पारंपरिक वेशभूषा में सजे आदिवासी कलाकार जब नृत्य कर रहे थे, तो पूरा मैदान तालियों से गूंज उठा।


 नक्सलवाद पर भी बोलीं राष्ट्रपति

अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने बस्तर के दर्दनाक अतीत का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पिछले चार दशकों तक नक्सलवाद के कारण बस्तर के आदिवासी समाज को भारी नुकसान झेलना पड़ा। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। राष्ट्रपति ने कहा बस्तर धीरे-धीरे नक्सल मुक्त हो रहा है। बड़ी संख्या में नक्सली हथियार डाल रहे हैं उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वालों का स्वागत किया और साफ शब्दों में कहा कि जो लोग भटका रहे हैं, उनकी बातों में न आएं।

राष्ट्रपति का पारंपरिक तरीके से स्वागत

कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने राष्ट्रपति को ढोकरा आर्ट से बना कर्मा वृक्ष, कोसा शिल्प से तैयार गमछा भेंट किया। मंच पर राज्यपाल रमेन डेका, डिप्टी सीएम विजय शर्मा और अन्य मंत्री भी मौजूद रहे। कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रगान से हुई, जिसमें मंच पर मौजूद सभी नेता सम्मान में खड़े रहे। 

 पंडुम केवल आयोजन नहीं, संस्कृति का मंच – सीएम साय

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि बस्तर पंडुम सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति और परंपराओं को समर्पित मंच है। उन्होंने बताया कि इस बार 12 विधाओं में प्रस्तुतियां हो रही हैं 54 हजार से ज्यादा लोगों ने पंजीयन कराया है सीएम ने कहा कि पहले बस्तर को नक्सल भय से पहचाना जाता था, लेकिन अब हिंसा की जगह विकास ने ले ली है। सरकार ने 31 मार्च 2026 तक बस्तर को पूरी तरह नक्सल मुक्त करने का लक्ष्य रखा है।

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