जगदलपुर: एक परिवार के 13 लोगों की सनातन धर्म में वापसी

Update: 2026-01-29 06:34 GMT

ईसाइयत से मोहभंग, पूर्वजों की आस्था और परंपरा ने बदला मन

छल, प्रपंच, लोभ-लालच और दिखावटीपन अधिक समय तक टिक नहीं पाते। देर-सबेर बस्तर की धरती पर ऐसे कृत्यों का पर्दाफाश हो ही जाता है। बस्तर जिले की नानगुर तहसील अंतर्गत ग्राम साड़गुड़ में पिछले 15 वर्षों से ईसाई धर्म का पालन कर रहे एक ही परिवार के 13 सदस्यों ने स्वेच्छा से, ग्राम समाज और क्षेत्र के वरिष्ठजनों की गरिमामयी उपस्थिति में पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ सनातन धर्म में घर वापसी की।

ग्राम साड़गुड़ निवासी बघेल परिवार के सदस्य लखेश्वर, शांति, रामचरण, प्रभुदास, सनमती, नीलकुमारी, कौशल्या, साहिल, शुभम, प्रतीक, हर्षिता, आनंद और अनन्या ने अपने पूर्वजों की परंपराओं को अपनाते हुए पुनः सनातन धर्म में आस्था प्रकट की। परिवार के सदस्यों ने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्होंने बिना किसी दबाव या प्रलोभन के, पूरी तरह अपनी स्वतंत्र इच्छा से यह निर्णय लिया है। अपनी मूल संस्कृति, परंपराओं और पूर्वजों की आस्था के प्रति गहरी श्रद्धा ही उन्हें दोबारा सनातन धर्म की ओर ले आई।

समाज में रहकर सकारात्मक सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी ही किसी व्यक्ति और समुदाय की सशक्त पहचान बनती है। समाज से कटकर या समाज के विरुद्ध जाकर की गई गतिविधियां न तो व्यक्ति का भला करती हैं और न ही समाज का। उपस्थित समाज प्रमुखों ने परिवार के इस निर्णय का स्वागत किया। सनातन धर्म में लौटे परिवार के सदस्यों के कानों में फूल खोंसकर और माथे पर तिलक लगाकर उनका अभिनंदन किया गया।

कार्यक्रम में महारा समाज कचरा पाठी परगना संरक्षक एवं विहिप जिला उपाध्यक्ष प्रेम चालकी, धनुर्जय कश्यप, पीलाराम नाग, धनसाय भारती, देवी सिंह बघेल, शोभाबती बघेल, धबलू कश्यप, मदन कश्यप, सुरेंद्र चालकी, समत बघेल, जीवन दास, सुखराम कश्यप, तुलाराम, भोला मरकाम, विहिप जिला धर्म प्रसार प्रमुख देवेंद्र कश्यप सहित ग्राम के समाज प्रमुख और बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे।

धार्मिक पुनर्जागरण की लहर

बस्तर के मूल निवासी आदिवासी समुदाय के लिए धर्मांतरण एक बड़ी समस्या का रूप ले चुका है। कन्वर्जन चाहे स्वेच्छा से हो, बहकावे में आकर हो या फिर प्रलोभन के वशीभूत होकर, यह एक तरह से सांस्कृतिक हमला ही माना जाता है। बस्तर में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हुआ है, लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। यहां धार्मिक पुनर्जागरण की लहर दिखाई देने लगी है।

कन्वर्ट हो चुके लोगों को अब अपनी जड़ें पुकारने लगी हैं। उन्हें अपनी विरासत, संस्कृति और परंपराओं की अहमियत समझ में आने लगी है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में लोग अपने मूल धर्म को फिर से अपना रहे हैं। यह बस्तर की बदलती सोच और सामाजिक चेतना का स्पष्ट संकेत है।

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