बांग्लादेश: कलाकारों का विरोध या फिर भारत की जड़ों को मानने वाले कलाकारों का विरोध?

सोनाली मिश्रा

Update: 2026-01-05 15:05 GMT

बांग्लादेश इन दिनों पहचान की लड़ाई लड़ रहा है। यह लड़ाई बहुत रोचक है। दरअसल यह पूरी की पूरी लड़ाई केवल इस संघर्ष की है कि ढाकेश्वरी देवी के नाम पर नगरी ढाका की पहचान उस भूमि की रहे या फिर इसी ढाका में 30 जनवरी 1906 में जन्मी मुस्लिम लीग की पहचान रहे। यह बहुत रोचक संघर्ष है। क्योंकि एक तरफ तो वह आधार है, जिस आधार पर पाकिस्तान से बांग्लादेश अलग हुआ था और दूसरा वह आधार है, जिस आधार पर भारत से पाकिस्तान बना था। यदि यह कहा जाए कि यह लड़ाई पूरी की पूरी फिर से भारत और पाकिस्तान की है या हिन्दू जड़ों वाले बांग्लादेश और पूर्वी पाकिस्तान के बीच है, तो गलत नहीं होगा और यह बार- बार कई उदाहरणों से दिखता है, जिनमें हाल ही में म्यूजिक कॉन्सर्ट के दो उदाहरण सम्मिलित हैं, और एक कलाकार का विरोध कट्टरपंथियों ने किया, परंतु दूसरे का नहीं।

बॉलीवुड में काम कर चुके महफूज अनम जेम्स का विरोध

बॉलीवुड में काम कर चुके गायक महफूज अनम जेम्स 26 दिसंबर 2025 को बांग्लादेश की राजधानी ढाका से 120 किलोमीटर दूर फरीदपुर में एक कॉन्सर्ट कर नहीं कर सके, क्योंकि उनके स्टेज पर जाने से पहले ही सारा इलाका छावनी में और लड़ाई के मैदान में बदल गया। कट्टरपंथियों ने उनके कार्यक्रम में जमकर हंगामा किया और कुर्सियाँ उठाकर फेंकी। 61 वर्षीय महफूज अनम जेम्स कोई मामूली हस्ती नहीं हैं, बल्कि वे बांग्लादेश में एक माना हुआ नाम हैं। वे अपने संगीत को सीमाओं में नहीं बांधते हैं, जैसा कि कथित प्रगतिशील लोगों का भी कहना है और यही कारण हैं कि उन्होनें अपनी आवाज बॉलीवुड को भी दी। उनका एक बहुत ही मशहूर गाना है गैंगस्टर का “भीगी – भीगी!” भारत में भी उनके प्रशंसक हैं। इसके साथ ही उन्होनें वो लम्हे और लाइफ इन अ मेट्रो, जैसी फिल्मों में भी काम किया है।

मगर चूंकि वे भारत में गाना गा चुके हैं, और उनका दृष्टिकोण भी भारत विरोधी सहज प्रतीत नहीं होता है, इसलिए उनका कार्यक्रम कट्टरपंथियों का शिकार हो गया। इसे लेकर यह कहा जा रहा है कि यह बांग्लादेश में निरंतर हो रही हिंसा की ही एक कड़ी है। यह कहा जा रहा है कि कलाकारो पर लगातार हिंसा बढ़ रही है और यह भी कहा जा रहा है कि कलाकारों को कट्टरपंथी चुप करा रहे हैं और उन्हें कला का प्रदर्शन नहीं करने दिया जा रहा है। परंतु यह आधी ही कहानी है। कहानी का दूसरा रुख एकदम अलग है। यह जो दूसरा चेहरा है, वह यह बताने के लिए पर्याप्त है कि दरअसल कला के विरोध का भी एक चेहरा होता है और यह चेहरा कट्टरपंथियों को प्यारा भी होता है। बांग्लादेश में कुछ ही दिनों पहले अर्थात 15 दिसंबर को पाकिस्तान के एक गायक आतिफ असलम का एक कार्यक्रम हुआ था और वह भी राजधानी ढाका में। आतिफ असलम पाकिस्तानी होने के नाते एक और पहचान रखते हैं और वह पहचान है भारत विरोधी की।

क्यों विवादास्पद हैं आतिफ असलम?

ऐसा नहीं है कि भारत के सिनेमा ने आतिफ असलम को गाने के लिए जगह नहीं दी। मगर यह भी बात सच है कि आतिफ असलम ने भारत को उसका बदला विरोध से दिया। आतिफ असलम ने भारत के अंदरूनी मामलों में दखल देने का प्रयास किया। जब कश्मीर से धारा 370 हटाई गई तो आतिफ असलम ने इसका विरोध किया और कला को राजनीतिक रंग दिया। भारत में आतिफ के प्रशंसकों ने इसका विरोध किया और आतिफ को राजनीतिक बात करने पर फटकार भी लगाई थी, जबकि आतिफ असलम को वर्ष 2005 में ही भारत के बॉलीवुड ने गायकी का अवसर दिया था और उन्होनें भारत की फिल्मों में तमाम गाने गाए।

भारत से उन्होनें नाम और पैसा दोनों ही कमाया, मगर भारत के आंतरिक मामले में राजनीतिक विचार रखे और भारत का विरोध किया, तो ऐसे आतिफ के शो में बांग्लादेश में किसी भी तरह की कोई समस्या नहीं हुई। क्या आतिफ कलाकार नहीं है? यदि हैं तो फिर कट्टरपंथियों ने आतिफ के शो में बाधा क्यों नहीं डाली? और यह शो भी तब हुआ था, जब उस्मान हादी को गोली मार दी गई थी और वह ज़िंदगी और मौत के बीच लड़ाई लड़ रहा था। क्या ऐसे नाजुक मौके पर बांग्लादेश में कोई म्यूज़िक कॉन्सर्ट होना चाहिए था? और वह भी इस सीमा तक सफल रहा था कि अमेरिकन इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी-बांग्लादेश में उनकी एक झलक पाने के लिए प्रशंसक छत पर चढ़ गए थे।

मगर इस शोक के समय पर आतिफ असलम का शो बाधित नहीं हुआ था, परंतु बाद में जेम्स का शो नहीं होने दिया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि कला का विरोध नहीं है, गाने का विरोध नहीं है, हाँ कलाकार का विरोध है। कलाकार किस पहचान को लेकर चल रहे हैं, इसका विरोध है। बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस पूरी तरह से बांग्लादेश की बांग्ला पहचान को समाप्त कर पूर्वी पाकिस्तान की पहचान को वापस पाने के लिए कार्य कर रहे हैं और जिस प्रकार से केवल उन्हीं कलाकारों का विरोध हो रहा है, जो कट्टरपंथियों की धमकी के आगे नहीं झुके, उससे और यह बात सिद्ध होती है कि कला का विरोध नहीं है, केवल कलाकारों का है।


लेखिका- सोनाली मिश्रा

Tags:    

Similar News