आज विश्व पर्यावरण दिवस है । भारतीय जीवन शैली तो पर्यावरण व प्रकृति रक्षा की पर्याय है । प्रातःकाल उठकर सर्वप्रथम धरती माता को प्रणाम करना, स्नान के समय सूर्य को अर्ध्य देना, तुलसी को जल देना, पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था करना, भोजन बनाने में पहली रोटी गाय की व आखिरी रोटी श्वान के लिए निकालना हमारी दैनिक दिनचर्या का सहज कार्य है।
इसी के साथ प्रत्येक कार्य करने के पूर्व जल हाथ में रखकर संकल्प लेना, धरती की पूजा करना आदि धार्मिक कर्मकांड लगते हैं, किन्तु यह प्रकृति के प्रति श्रद्धा और सुरक्षा का भाव ही है । सनातन में कितने ही पर्व प्रकृति और पर्यावरण को समर्पित है । वट सावित्री पर वट वृक्ष की पूजा, दशा माता पर्व पर पीपल की पूजा, आँवला नवमी पर आँवला वृक्ष की पूजा, विजया दशमी पर शमी की पूजा, किसी भी व्रत कथा में केला व आम की पूजा, विवाह मण्डप में जामुन की पूजा की जाती है तथा बेल पत्ती, दूब भी अनेक पर्वों की पूजा के अनिवार्य घटक है ।
मुझे जलस्रोतों के प्रति आस्था परिवार व पूर्वजों से परम्पराओं में प्राप्त हुई है । मैंने अपने दादाजी व पिताजी को कुएं, बावड़ी व तालाब के जल का उपयोग करने के पूर्व उसमें से मुट्ठीभर कचरा या मिट्टी निकालते हुए हमेशा देखा है । दादाजी के साथ बचपन ने जब कभी गायें चराने जाता था तो वे कोई छोटा पौधा देखकर उसके आसपास बबूल के काँटे लगा देते थे ताकि कोई पशु उसे हानि नहीं पहुँचाएँ । मेरी ही तरह ग्रामीण परिवेश के हर व्यक्ति को पर्यावरण संरक्षण अथवा प्रकृति के प्रति श्रद्धा भाव अपने परिवार से ही सीखने को मिलता था । मेरे पिताजी बावड़ी व कुआं निर्माण के कुशल कारीगर थे । बचपन में मैं भी अच्छा मिस्त्री बनना चाहता था, किन्तु भविष्यव के गर्भ में कुछ ओर लिखा था । कारीगर तो नहीं बन पाया किन्तु उसी संस्कारों के कारण कुओं, बावड़ीयों, तालाबों, नदियों के माध्यम से प्रकृति से नाता जुड़ा रहा ।
परिवार में बचपन से मिली सीख जीवन का ध्येय बन गई । बैतूल के मित्रों व यहाँ के जनजाति समाज की सीख व सहयोग से निरन्तर तीन दशक तक सतपुड़ा की सेवा करने का गिलहरी भर प्रयास करने का सौभाग्य मिला । एक वर्ष पूर्व कार्यक्षेत्र बदला किन्तु काम वही मिला । देश के प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की प्रेरणा व मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जी के नेतृत्व में मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद के नेटवर्क के माध्यम से जल गंगा संवर्धन अभियान द्वारा मध्यप्रदेश के हजारों ग्रामों में वर्षाजल संरक्षण हेतु संरचनाओं के निर्माण व प्राचीन जल संरचनाएँ (बावड़ी, कुएं, तालाब, नदी तट आदि) की स्वच्छता का पुण्य कार्य करने का सौभाग्य मिला है ।
प्रकृति संरक्षण के संस्कार हमें पहले परिवार व ग्राम्य भारत में सहज मिल जाते थे । किन्तु बदलते परिवेश में अब नई पीढ़ी को अलग से बताने के आवश्यकता है । उसके लिए राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय दिवस एक प्रेरणा का कार्य करते हैं । विश्व पर्यावरण दिवस सम्पूर्ण विश्व को प्रकृति संरक्षण का सन्देश देने वाला वैश्विक पर्व है । पर्यावरण की सुरक्षा और संरक्षण हेतु पूरे विश्व में 5 जून को मनाया जाता है । वर्ष 1972 में पर्यावरण के प्रति वैश्विक स्तर पर राजनीतिक और सामाजिक जागृति लाने हेतु इस दिवस को मनाने की घोषणा संयुक्त राष्ट्रसंघ ने की थी । यानी लगभग 54 वर्ष पूर्व दुनियाँ के शीर्षस्थ लोगों को यह समझ आ गया था कि पर्यावरण बिगड़ रहा है और इसे सुधारने के लिए सामूहिक प्रयास करना होंगे ।
किन्तु 1972 के स्टॉकहोम सम्मेलन जहां विश्व पर्यावरण दिवस का प्रारम्भ हुआ था, उसके बाद से वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भारी वृद्धि हुई है और यह लगभग 75 प्रतिशत बढ़ गया ।
कार्बन उत्सर्जन के साथ पर्यावरण के लिए आज सबसे बड़ा संकट प्लास्टिक प्रदूषण होता जा रहा है । प्लास्टिक प्रदूषण विश्व के हर कोने में फैल चुका है, हमारे पीने के पानी और भोजन के साथ हमारे शरीर में घुल रहा है । एक प्लास्टिक की थैली को पूरी तरह नष्ट होने में पाँच सौ से हजार वर्ष तक लग सकते हैं। यह सालों-साल कचरे के ढेर के रूप में पड़ा रहता है और जगह घेरता है । हर साल लाखों टन प्लास्टिक नदियों के द्वारा समुद्रों में पहुँचता है । जलीय जीव इसे भोजन समझकर खा लेते हैं, जिससे उनकी मृत्यु हो जाती है ।
दूसरी ओर प्लास्टिक मिट्टी के अन्दर वर्षाजल को जाने से रोकता है। इसमें विषैले रसायन मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को नष्ट कर रहें हैं । कुछ लोग इसे नष्ट करने के लिए आग लगा देते हैं, किन्तु जब प्लास्टिक कचरे को जलाया जाता है, तो इसमें से जहरीली गैसें निकलती हैं । इससे श्वांस सम्बन्धी गम्भीर रोग और कैंसर का खतरा बढ़ता जा रहा है । इसके साथ ही वनों की अन्धाधुन्ध कटाई और कृषि में रासायनिक उर्वरकों का बढ़ता प्रयोग प्राकृतिक असंतुलन या पर्यावरण प्रदूषण के लिए बड़ा संकट बनता जा रहा है ।
अगर इन सब संकटों से बचना है तो केवल व्यवस्था को कोसने से समस्या का हल नहीं निकलेगा अपितु अपनी जीवनशैली में हमे छोटे-छोटे परिवर्तन करना होंगे ।
सर्वप्रथम हम सिंगल यूज प्लास्टिक बन्द कर उसके स्थान पर कपड़े या जूट के थैलों का प्रयोग प्रारम्भ करें । अपने जन्मदिन या किसी अन्य अवसर पर माँ के नाम एक पेड़ अवश्य लगाएँ । पेड़ धरती को हरा-भरा और ठण्डा रखने के साथ हवा को भी शुद्ध रखते हैं । साथ ही वर्षा के जल को अधिक से अधिक धरती के पेट में ले जाकर भूजल स्तर में वृद्धि कर सकते हैं । धरती के अन्दर जितना पानी होगा, तापमान उतना ही कम रहेगा । बिजली और ईंधन की बचत भी पर्यावरण संरक्षण में अत्यन्त उपयोगी है । क्योंकि ईंधन और बिजली बनाने में बड़ी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है ।
जैसा मैंने प्रारम्भ में लिखा है कि भारत ने सदैव पर्यावरण की रक्षा की है । हमारे सनातन ग्रंथों में पर्यावरण संरक्षण को धर्म का अनिवार्य अंग माना गया है। यहाँ प्रकृति को भोग की वस्तु न मानकर पूजनीय और ईश्वर का स्वरूप माना गया है । पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) में सन्तुलन हेतु सभी को देवता माना गया । नदियों को माँ की उपमा दी । पशु-पक्षियों के प्रति करुणा का भाव जगाया गया । यज्ञ हवन आदि से वायुमण्डल को शुद्ध रखने के वैज्ञानिक उपाय किये गये ।
आइए ! अपने पूर्वजों की जीवनशैली की ओर लौटें । कुछ परम्पराएँ जो रूढ़ियाँ बन गई, उन्हें तोड़ें । प्रकृति के अत्यधिक उपभोग की चाह में जो अभी तक नष्ट हो चुका है, उसे सम करने में कई दशक लगेंगे तब जाकर हम आने वाली पीढ़ियों को प्लास्टिक मुक्त और पेड़ तथा पानी से युक्त धरती अर्थात शुद्ध पर्यावरण दे सकेंगे ।

मोहन नागर, मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद के उपाध्यक्ष हैं