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राहुल गांधी की पितृसत्ता पर टिप्पणी

इधर ‘स्मैश द पेट्रियार्की’ बोलो, उधर शाहबानो को जिंदा दफनाओ

राहुल गांधी ने पुणे में 'स्मैश द पेट्रियार्की' नारा दिया जबकि उनके अपने परिवार और पार्टी का इस पर विवादित इतिहास रहा है।


इधर ‘स्मैश द पेट्रियार्की’ बोलो उधर शाहबानो को जिंदा दफनाओ

निष्कलंक, पवित्र, ऐतिहासिक और भारतप्रिय ‘राष्ट्रगीत वंदेमातरम्’ के पूर्ण गान से इंकार करके ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ करने वाले राहुल गांधी से अब यही आशा थी। पिछले सप्ताह ‘राष्ट्रगीत वंदे मातरम्’ के विरोध में कांग्रेस वर्किंग कमेटी में प्रस्ताव पारित कराया और इस सप्ताह उन्होंने छात्रों से संवाद के बहाने फिर मुस्लिम तुष्टिकरण किया और सनातन पर चोट कर दी। राहुल गांधी को पता ही है कि सनातन का अर्थ ही नित नई नूतनता के साथ आगे बढ़ने का नाम है। यदि ऐसा नहीं होता तो क्या हम आज अनेकों सामाजिक बुराइयों से घिरे नहीं होते?

उदाहरणार्थ, हम सनातनियों ने एक से अधिक विवाह करने की बुराई को बिना किसी प्रतिरोध के छोड़ दिया है। ऐसी अनेक सामाजिक बुराइयाँ हैं, जिनसे हम सनातनियों ने बड़ी सहजता से मुक्ति पाई है। इसके लिए हमें कोई सुधार आंदोलन नहीं करने पड़े, न कोई प्रपंच करना पड़ा। हिंदुत्व का स्वमेव मंथन हुआ और बुराइयाँ छूटती चली गईं। आगे भी ऐसा ही होगा। ये नेता नगरी आएँ या न आएँ, सनातन सदैव नूतनता को अपनाता ही रहेगा।

मुस्लिम आक्रांताओं के भय से हिंदू समाज ने पर्दा प्रथा अपनाई और रात्रि में विवाह करने को विवश हुआ। हिंदू स्त्री शिक्षा में भी ये मुस्लिम आक्रांता ही बाधा बने थे। समय आने पर हम सनातनियों ने इन बुराइयों को उखाड़ भी फेंका है। आज हिंदू महिलाएँ अपने अतिरिक्त अधिकारों से भी अपने परिवार का नेतृत्व करती हैं। वस्तुतः पितृसत्ता और मातृसत्ता शब्द ही विदेशी हैं। हिंदू ‘परिवार संस्था’ ने कोई भेद ही नहीं रखा है। स्त्री-पुरुष का समग्र चिंतन अर्थात् मनुष्य का चिंतन ही हमारी परंपरा रही है।

‘स्मैश द पेट्रियार्की’ बोलते समय राहुल गांधी ने स्वयं के परिवार का भी अध्ययन नहीं किया! यदि भारत में पितृसत्ता होती तो क्या इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री होतीं? राहुल गांधी सहित सभी राजनेताओं को राजनीतिक मंचों से हिंदू ग्रंथों, सभ्यता और सांस्कृतिक परंपराओं पर टिप्पणी करते समय सावधान रहना चाहिए। क्या ये नेता ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ के लिए कुछ भी कहते और करते चले जाएँगे?!

पितृसत्ता अर्थात् पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर राहुल पुणे में बहुत बोले। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि पितृसत्ता को खत्म करना है। ‘स्मैश द पेट्रियार्की’ (Smash the patriarchy) का नारा दिया। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’ वाले हमारे देश में राहुल गांधी को और विशेषतः कांग्रेस को तो यह बात करने का कतई अधिकार नहीं है। पितृसत्ता का सर्वाधिक ज्वलंत उदाहरण शाहबानो प्रकरण ही है। पितृसत्ता पर यदि चोट करना है तो प्रारंभ मुस्लिम समाज से करना होगा। राहुल गांधी हिजाब, पर्दा प्रथा और बुर्के पर क्यों नहीं बोले? क्या राहुल गांधी शाहबानो प्रकरण में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा नए सिरे से स्थापित पितृसत्ता को चुनौती देंगे?

बड़े ही प्रगतिशील विचारों के धनी कहलाने वाले, विदेशों में पले-बढ़े राजीव गांधी ने शाहबानो प्रकरण में संसद में प्रस्ताव पारित करके ‘मुस्लिम स्त्रियों’ पर कई सदियों की पितृसत्ता एक झटके में लाद दी थी। राहुल जी, पितृसत्ता पर बोलते समय मुस्लिम समाज में एक से अधिक निकाह के अधिकार पर एक शब्द न बोले। मुस्लिम महिला के सीमित पैतृक विरासत के अधिकार पर भी नहीं बोले। मुस्लिम विधवाओं और तलाकशुदा महिलाओं के संपत्ति अधिकार और गुजारा भत्ते पर न बोलने का साहस न कर पाए।

विश्व में अनेक ऐसे मुस्लिम बहुल शरिया-आधारित देश हैं, जो ‘एक बीवी’ के नियम को अपना चुके हैं। फिर भारत में मुस्लिमों को चार निकाह का अधिकार क्यों है? क्या राहुल की ‘स्मैश द पेट्रियार्की’ एक आँख से अंधी है? विश्व में अनेक ऐसे मुस्लिम बहुल देश हैं, जिन्होंने बुर्के, हिजाब और पर्दे को ‘कुरान सम्मत’ नहीं बताते हुए उसे खारिज कर दिया है। राहुल गांधी के ‘स्मैश द पेट्रियार्की’ में हिजाब और बुर्का क्यों नहीं आता है?

दो-तीन वर्ष पूर्व भारत में कर्नाटक से ‘हिजाब विरोध’ की सार्थक बयार बहना प्रारंभ हुई थी। तब तो राहुल जी के मुँह में दही जमा हुआ था। कर्नाटक में कांग्रेस शासन के आते ही विद्यालयों में मुस्लिम बालिकाएँ विवशतावश हिजाब, नकाब और बुर्का पहनकर ही आती हैं। यहाँ पर राहुल जाएँ और हिजाब को हवा में उछालकर ‘स्मैश द पेट्रियार्की’ बोलें, तब बात समझ में आती है। दोहरे मापदंडों से राजनीति मत करो, साहब! लड़के गाली देते हैं, यह गलत बात है, उन्हें रोकिए। राहुल जी, आप तो हमारी लड़कियों को गालियाँ देने के लिए उकसा रहे हैं? आखिर आपका सीन क्या है?

भारत की सभ्यता वेदों, उपनिषदों, पुराणों, रामायण-महाभारत, बौद्ध-जैन-सिख दर्शन, लोक-संस्कृतियों और असंख्य सामाजिक अनुभवों से बनी एक विशाल सभ्यतागत धारा है। यदि भारतीय संस्कृति में केवल स्त्री-दमन ही होता, तो गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियों की परंपरा कैसे विकसित होती? वेदों में स्त्रियों के विद्वतापूर्ण संवादों का उल्लेख कैसे मिलता? हिंदू विवाह के तो नियम और संहिताएँ ही मातृशक्ति ने लिखी हैं।

भारतीय समाज में सामाजिक बुराइयाँ थीं, असमानताएँ थीं और अनेक रूढ़ियाँ भी थीं। किंतु किसी सभ्यता का मूल्यांकन उसकी कमियों के साथ-साथ उसके आत्मसुधार की क्षमता से भी किया जाना चाहिए। भारत ने समय-समय पर अपने भीतर से सुधारकों को जन्म दिया और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध सफल संघर्ष किया है। किसी ग्रंथ की कालबाह्य (चलन से बाहर) चुनिंदा पंक्तियों को लेकर उसे संपूर्ण हिंदू समाज की मानसिकता घोषित कर देना पक्षपात है। यह हिंदू विरोध है। भारतीय संस्कृति को स्त्री-विरोधी बताकर राजनीतिक लाभ प्राप्त करने का प्रयास ‘दिमागी नक्सल’ है।

राहुल गांधी ने पुणे के कार्यक्रम में महिलाओं को भारत की बड़ी शक्ति बताया और उनकी स्वतंत्र पहचान की वकालत की। यह बात स्वागत योग्य है। लेकिन जब इसी विमर्श के साथ भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं को संदेह की दृष्टि से प्रस्तुत किया जाता है, तब प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने के बजाय उनसे दूर करने का प्रयास किया जा रहा है? आज भारत का युवा अपनी पहचान को लेकर सजग है। वह आधुनिक भी होना चाहता है और भारतीय भी। वह विज्ञान और तकनीक में आगे बढ़ना चाहता है, लेकिन अपनी सभ्यता पर गर्व भी करना चाहता है। उसे महिला-पुरुष समानता चाहिए, लेकिन इसके लिए उसे अपनी संस्कृति से घृणा करना स्वीकार्य नहीं है।

राहुल गांधी का महिला-समानता का संदेश तनिक सुनने योग्य हो सकता था, यदि वह हिंदू-मुस्लिम दोनों के समान संदर्भों में कहा जाता। किंतु भारतीय संस्कृति को संदेह के घेरे में रखकर दिया गया संदेश स्वीकार्य नहीं हो सकता। भारतीय हिंदू संस्कृति इतनी कमजोर नहीं कि उसे आधुनिकता के लिए त्यागना पड़े और आधुनिकता इतनी संकीर्ण नहीं कि वह भारतीयता के साथ चल न सके। राजनीति को समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान करना चाहिए, सांस्कृतिक आत्महीनता पैदा नहीं करनी चाहिए। भारत की संस्कृति पर प्रहार करके आधुनिकता नहीं आएगी; अपनी जड़ों को समझकर, विवेक से सुधार करके और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़कर ही नया भारत बनेगा।

​​​​​​​डॉ. प्रवीण दाताराम

(लेखक साहित्यकार एवं स्तंभकार हैं)

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