बीके प्रहलाद के अनुसार क्रोध आने के पीछे स्वार्थ और ईर्ष्या मुख्य कारण हैं। क्रोध के 5 मिनट व्यक्ति की 2 घंटे की कार्यक्षमता को प्रभावित करते हैं।
क्रोध मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा शत्रु है। यह मनुष्य के जीवन को भीतर से पूरी तरह अशांत कर देता है। जब व्यक्ति क्रोध में होता है, तो उसके सोचने, समझने और निर्णय करने की शक्ति भी क्षीण हो जाती है। कई बार उसके मुख से ऐसे शब्द भी निकल जाते हैं, जिन पर बाद में उसे दुःख और पश्चाताप होता है।
अब प्रश्न यह उठता है कि व्यक्ति को क्रोध आता है, उसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, लेकिन उनमें से दो बड़े कारण हैं एक है स्वार्थ और दूसरा है ईर्ष्या। स्वार्थ का अर्थ है कि हर परिस्थिति में अपने लाभ, अपनी सुविधा, अपनी इच्छा और अपने सम्मान को ही प्राथमिकता देना। जब हमारी इच्छा के अनुसार कार्य नहीं होता या हमारी कोई बात नहीं मानता, तो मन में निराशा पैदा हो जाती है। यही निराशा चिड़चिड़ेपन और फिर धीरे-धीरे क्रोध का रूप ले लेती है।
व्यक्ति यदि 5 मिनट गुस्से में रह ले, तो उसकी दो घंटे की कार्य क्षमता समाप्त हो जाती है और उसका असर फिर पूरे दिन रहता है। इसलिए क्रोध से हमेशा बचना चाहिए।दूसरा कारण है ईर्ष्या। यह भी क्रोध की एक गहरी जड़ है। जब हम किसी दूसरे व्यक्ति को आगे बढ़ते हुए, सफल होते हुए या सम्मान प्राप्त करते हुए देखते हैं, तो मन में तुलना का भाव आने लगता है। तब ईर्ष्या उत्पन्न होती है, जिससे हर छोटी बात भी चुभती है और स्वभाव चिड़चिड़ा होने लगता है। यह भी धीरे-धीरे क्रोध का रूप ले लेता है।
वास्तव में कोई क्रोध करना नहीं चाहता, लेकिन जब मन अंदर से अशांत या निराश होता है या आपके हिसाब से कुछ कार्य नहीं हो रहा होता है, तब व्यक्ति हर छोटी बात पर परेशान होने लगता है। कई बार तो बिना किसी कारण के भी मन उदास हो जाता है।
अब समाधान पर बात करते हैं। यदि हमें क्रोध-मुक्त होना है, तो सिर्फ उसको नियंत्रित नहीं करना है, बल्कि उसकी जड़ में जाकर उसका समाधान करना है। स्वार्थ को समाप्त करने का अर्थ यह नहीं है कि हम अपने जीवन की आवश्यकताओं और अधिकार को छोड़ दें। इसका मतलब है कि अपनी खुशी को अपने लाभ से न जोड़ें। जब हम दूसरों के हित के बारे में सोचते हैं और दूसरों को खुशी बांटते हैं, तब मन में विशालता आती है। सेवा और सहयोग की भावना जाग्रत होती है। जब देने की भावना आती है, तो स्वार्थ स्वतः ही कम होने लगता है।
इसी तरह यदि हम ईर्ष्या को खत्म करने की बात करें, तो हमें ध्यान देना होगा कि हर व्यक्ति की यात्रा अपनी-अपनी है। हम तुलना न करें, उससे सीख लें, तो ईर्ष्या भी स्वतः समाप्त हो जाएगी। हमें यह समझना होगा कि दूसरे की उपलब्धि से अपने को न आंके। किसी के पास यदि धन, सुविधाएं या प्रसिद्धि अधिक है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि हमारा जीवन कम मूल्यवान है। आपका जीवन भी श्रेष्ठ है और आपके अंदर भी अनेक विशेषताएं हैं। अपनी उन विशेषताओं को पहचानना और अपनी उन्नति पर ध्यान देना ईर्ष्या से मुक्त होने का सबसे अच्छा साधन है।
राजयोग ध्यान भी इस दिशा में बहुत मदद करता है। हमें कुछ समय सकारात्मक चिंतन और ध्यान करना चाहिए। इसके साथ ही हमें रोज खुद से कुछ प्रश्न भी पूछने चाहिए—क्या मेरी नाराजगी के पीछे कोई अपेक्षा है? क्या मुझे किसी की सफलता से ईर्ष्या हो रही है? क्या मैं केवल अपने बारे में सोच रहा हूं? या मुझे अपने में कुछ परिवर्तन करने की आवश्यकता है?
यदि आप ऐसा करते हैं, तो निश्चित ही आप समाधान की ओर बढ़ सकेंगे। स्वार्थ और ईर्ष्या से परे खुश रहना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। इसलिए कोई भी बात हो, कोई भी परिस्थिति हो, हमेशा खुश रहें और खुशी बांटें। अपनी ऊर्जा को सकारात्मक कार्यों में लगाएं। जीवन बहुत अनमोल है, इसलिए छोटी-छोटी बातों में जीवन को न उलझाते हुए हर पल का आनंद लें। जिसे आप बदल नहीं सकते, उसे स्वीकार कर लें। यही सुंदर जीवन जीने का मंत्र है।

बीके प्रहलाद
बीके प्रहलाद
(लेखक मोटिवेशनल स्पीकर, आध्यात्मिक मार्गदर्शक एवं राजयोग ध्यान विशेषज्ञ हैं।)