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हिंदू पर्वों पर विज्ञापनी विकृति

कृति सेनन : हिंदू पर्वों पर आजादी के निहितार्थ?

हिंदू पर्वों के अवसर पर विज्ञापनों में स्त्री देह के प्रयोग और पारंपरिक भावों की विकृति को लेकर विवाद। कृति सेनन के विज्ञापन ने फिर से इस मुद्दे को उजागर किया है।


कृति सेनन  हिंदू पर्वों पर आजादी के निहितार्थ

हिंदू धर्म के पर्वों का विज्ञापन या कहें मीडिया जगत द्वारा अपमान नया नहीं है। हम अक्सर देखते रहते हैं कि हिंदू पर्वों को लेकर एक अजीब-सी मानसिकता कथित कला जगत की रहती है। हिंदू पर्वों के अवसर पर ड्रेस को लेकर या कॉन्सेप्ट को लेकर कुछ नया करने की जिद होती है। रक्षाबंधन और करवाचौथ को लेकर पहले तो अभियान ही चलता था और स्त्री-विरोधी पर्व बताया जाता था। हालांकि, अब इसमें कमी आई है, परंतु यह बंद हो गया है, ऐसा कहा नहीं जा सकता है।

फिल्मों और विज्ञापनों ने हिंदू पर्वों के रूपों को विकृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। तभी जो पर्व रक्षा का हुआ करता था और जो रक्षासूत्र जिसकी कलाई में बांधा जाता था, वह रक्षा की कामना करते हुए बांधा जाता था। जो पर्व संपूर्ण समाज की रक्षा का होता था, उसे मात्र भाई-बहन तक सीमित करने का षड्यंत्र किया गया। यह पर्व इसलिए नहीं था कि जिसकी कलाई पर राखी बांधी जा रही है, वह राखी बांधने वाले की रक्षा करेगा। जबकि इसका मूल भाव पवित्र सूत्र धारण करने वाले व्यक्ति के सुख, स्वास्थ्य, दीर्घायु, कल्याण और सुरक्षा के लिए प्रभु से प्रार्थना में निहित है।

भारतीय परंपरा में शिशु से लेकर वृद्ध को रक्षासूत्र बांधने की परंपरा है। क्या कोई कल्पना कर सकता है कि नन्हा शिशु किसी की रक्षा कर सकता है या फिर यह कि नन्हे शिशु को कुछ हो नहीं, इसलिए उसकी नन्ही कलाई में रक्षासूत्र बांधा जाता है और केवल उसकी बहन ही नहीं, बल्कि उसकी बुआ भी उसकी नन्ही कलाई में रक्षासूत्र बांधती है। वह अपने भतीजे की लंबी आयु, स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए प्रार्थना के रूप में यह रक्षासूत्र बांधती है।

परंतु इस भाव को कभी भी मीडिया में नहीं समझा गया, केवल इसे भाई-बहन तक सीमित करके रख दिया गया और इतना ही नहीं, इसमें यह भी जबरन जोड़ा गया कि भाई को बहन राखी बांध रही है तो वह किसी लालच में बांध रही है कि वह उसकी रक्षा करेगा या फिर शगुन!जबकि ऐसा भारतीय परंपरा में है ही नहीं। भारतीय परंपरा में तो मात्र अपने भाई या फिर भतीजे या फिर अपने प्रिय की रक्षा की कामना के साथ रक्षासूत्र बांधा जाता है और यह किसी भी एक रिश्ते से बंधा हुआ नहीं है। और उसके भाव को विकृत करने के बाद यह अभियान चलाया जाता है कि केवल बहनें ही राखी क्यों बांधें? अब प्रश्न यह कि बहनें राखी क्यों नहीं बांधें? क्या अपने भाई की रक्षा की प्रार्थना करना अपराध है, क्या?

अब बात विज्ञापन की! उस विज्ञापन में कृति सेनन ने एक बहुत ही छोटी पोशाक पहन रखी थी, जो जाहिर है कि अन्य लोगों द्वारा ही निर्धारित की गई होगी, मगर चूंकि पहन कृति सेनन ने रखी थी, तो उनकी ट्रोलिंग हुई और इसके बाद कंपनी ने विज्ञापन वापस ले लिया। मगर फिर भी यह प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है कि सारे प्रयोग, सारी आजादी, फिर चाहे भाव विकृत करने की हो या फिर अपने उत्पाद बेचने के लिए स्त्री देह का प्रयोग करने की, एड एजेंसियों को हिंदू पर्व के अवसर पर ही याद आते हैं। कभी ईद, क्रिसमस या अन्य पर्वों पर यह प्रयोग याद क्यों नहीं आते?

भारतीय परंपरा में वस्त्रों को लेकर जो उदारता रही है, वह नन बनाकर या फिर बुर्के में लपेटकर अपनी औरतों को रखने वाले पंथों में नहीं रही है, मगर यह उदारता स्वाभाविक है, वह बाजार को आकर्षित करने के लिए नहीं है। वह अपने उत्पाद बेचने के लिए स्त्री देह को वस्तु के रूप में प्रस्तुत करने को लेकर नहीं है। इस अंतर को समझना चाहिए और अब लगातार प्रश्न उठने ही चाहिए कि सारे प्रयोग केवल हिंदू पर्वों पर ही क्यों?

जब हर स्थान, फिर चाहे मस्जिद हो या फिर गुरुद्वारा या फिर स्कूल, सभी में एक निर्धारित मर्यादा के अनुकूल वस्त्रों को पहनने का नियम होता है और लोग उसे सहर्ष मानते हैं, फिर मंदिरों में ही वस्त्रों को लेकर आजादी की मांग क्यों होती है? और हर पर्व, जैसे कि ईद, क्रिसमस, बैसाखी आदि पर मर्यादापूर्ण वस्त्रों को पहनने की परंपरा और अघोषित नियम है, जिन्हें लेकर कोई भी प्रयोग कभी भी नहीं किया जा सकता है, तो फिर रक्षासूत्र के पर्व पर स्त्री देह को वस्तु बनाकर अपने उत्पाद बेचने की जिद क्यों? इस खेल को अब बंद होना चाहिए।

सोनाली मिश्रा

(लेखिका स्तंभकार हैं।)

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