मोदी–मैक्रों मुलाकात के बाद भारत-फ्रांस रिश्ते ‘विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी’ के नए दौर में पहुंचे, रक्षा से तकनीक तक सहयोग बढ़ा
भारत और फ्रांस के संबंध एक साधारण कूटनीतिक रिश्ते से कहीं अधिक गहरे और बहुआयामी रहे हैं। नरेंद्र मोदी और इमैनुएल मैक्रों की हालिया मुंबई मुलाकात और संयुक्त पत्रकार वार्ता ने इन रिश्तों को एक नए स्तर ‘विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी’ पर ले जाने की घोषणा के साथ भविष्य की दिशा स्पष्ट कर दी है। यह सिर्फ शब्दों का विस्तार नहीं, बल्कि सहयोग के दायरे और गहराई का विस्तार है।
भारत और फ्रांस के बीच रणनीतिक साझेदारी की शुरुआत 1998 में हुई थी। उस समय यह संबंध मुख्यतः रक्षा और परमाणु सहयोग तक सीमित माने जाते थे। लेकिन आज यह साझेदारी रक्षा, अंतरिक्ष, समुद्री सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नवउद्यम और उभरती प्रौद्योगिकियों तक फैल चुकी है। नए दर्जे का अर्थ है कि दोनों देश वैश्विक मुद्दों जैसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता, आतंकवाद-रोधी प्रयास, जलवायु परिवर्तन और आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा पर साझा दृष्टिकोण के साथ काम करेंगे।
रक्षा सहयोग इस संबंध का केंद्रीय स्तंभ रहा है। फ्रांस उन चुनिंदा देशों में है, जिसने भारत की संवेदनशील रक्षा तकनीक उपलब्ध कराने में भरोसा दिखाया है। लड़ाकू विमान, पनडुब्बी तकनीक और अब हेलिकॉप्टर निर्माण जैसे क्षेत्रों में संयुक्त उत्पादन ‘मेक इन इंडिया’ को नई मजबूती देता है। कर्नाटक के वेमगल में टाटा-एयरबस की एच-125 हेलिकॉप्टर संयोजन पंक्ति का उद्घाटन इस दिशा में एक प्रतीकात्मक और व्यावहारिक कदम है। यह सिर्फ आयात-आधारित मॉडल से आगे बढ़कर तकनीक हस्तांतरण और घरेलू विनिर्माण क्षमता निर्माण का संकेत है।भारत की रक्षा रणनीति आज ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ पर आधारित है, अर्थात किसी एक शक्ति-गुट पर निर्भर हुए बिना बहुध्रुवीय विश्व में अपने हितों की रक्षा करना। फ्रांस भी यूरोप के भीतर एक ऐसी शक्ति है, जो स्वतंत्र विदेश नीति और रणनीतिक स्वायत्तता की वकालत करता है। यही वैचारिक समानता दोनों देशों को स्वाभाविक साझेदार बनाती है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में फ्रांस की सैन्य उपस्थिति और भारत की समुद्री क्षमताएं मिलकर क्षेत्रीय संतुलन को मजबूती दे सकती हैं।
इस साझेदारी का एक महत्वपूर्ण आयाम तकनीक और नवाचार है। मैक्रों ने जिन वैश्विक कंपनियों अल्फाबेट इंक, माइक्रोसॉफ्ट, आईबीएम (इंटरनेशनल बिजनेस मशीन), एडोबी इंक और पालो आल्टो नेटवर्क्स के भारतीय मूल के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों का उल्लेख किया, वह भारत की उभरती वैश्विक नेतृत्व क्षमता का संकेत है। भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा नवउद्यम पारिस्थितिकी तंत्र है और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के क्षेत्र में उसकी उपलब्धियां वैश्विक स्तर पर सराही जा रही हैं। ऐसे में फ्रांस के साथ संयुक्त नवाचार केंद्र और अनुसंधान सहयोग भविष्य की अर्थव्यवस्था की नींव मजबूत कर सकते हैं।हालांकि, इस उत्साह के बीच कुछ यथार्थवादी प्रश्न भी हैं। क्या तकनीक हस्तांतरण वास्तव में गहराई तक पहुंचेगा? क्या संयुक्त उत्पादन में भारतीय कंपनियों की हिस्सेदारी दीर्घकालिक रूप से बढ़ेगी? और क्या यह साझेदारी केवल रक्षा उद्योग तक सीमित रह जाएगी या नागरिक क्षेत्रों, जैसे हरित ऊर्जा और जैव प्रौद्योगिकी में भी समान गति से आगे बढ़ेगी?
इन सवालों के जवाब आने वाले वर्षों में सामने आएंगे। फिर भी, यह स्पष्ट है कि भारत-फ्रांस संबंध आज भरोसे और समान दृष्टि पर आधारित है। जब वैश्विक राजनीति अनिश्चितताओं से घिरी हो, तब ऐसी साझेदारी का महत्व बढ़ जाता है, जो मूल्य-आधारित और दीर्घकालिक सहयोग में विश्वास रखती हो। ‘विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी’ का नया अध्याय इसी विश्वास का विस्तार है।