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जगन्नाथ जी की भक्ति की कहानी

इस विशाल पथ पर...

द्रौपदी मुर्मु ने अपने जीवन में जगन्नाथ जी की भक्ति के महत्व को बताया, उन्होंने उनकी भक्ति के चलते जीवन के कठिन समय में भी साहस पाया।


इस विशाल पथ पर

द्रौपदी मुर्मु

बचपन से मैं जगन्नाथ जी की भक्त हूँ। वे सर्वदा मेरे परम आराध्य हैं। मेरे जीवन के उत्थान और पतन के वे नियंता हैं। मेरे दुख-सुख के कर्ता-धर्ता हैं। जीवन में मैंने बहुत कष्ट भी सहे हैं। उन सब दारुण दुखों से मुझे महाबाहु ने उबारा है। मैं उनकी बेटी जो हूँ!

बचपन से मुझे श्रीजगन्नाथ जी की अनेक प्रार्थनाएँ और भजन याद हैं। स्कूल और कॉलेज में पढ़ते समय मैं गीत गाया करती थी। जगन्नाथ जी के भजन गाकर मैं खुश होती थी। महाप्रभु को अपने निकट पाती थी। अब गीत नहीं गाती, किंतु साँझ-सवेरे महाप्रभु का स्मरण करके उनके भजन गुनगुना लेती हूँ। मुझे लगता है कि महाप्रभु हर वक्त मेरे आस-पास ही रहते हैं। विपदा-आपदा में मेरी मदद करते हैं।

भक्तकवि मधुसूदन राव का गीत आज भी मैं मन ही मन गाती हूँ

'मेरे पास दिन-रात रहते हैं महाप्रभु परमेश्वर,
यह बात याद कर हृदय में पूजूँगी उन्हें निरंतर।'

मैं कुछ समझने-बूझने की उम्र में पहुँचने तक जगन्नाथ जी को जानने लगी थी। हमारे घर में अक्सर जगन्नाथ जी की चर्चा होती थी। गाँव के हर टोले में उनकी महिमा का बखान होता था। जब मैं गाँव के स्कूल में पढ़ती थी, तब भक्त सालबेग की 'आहे नीड़ो शोइड़ो' प्रार्थना गाई जाती थी। स्कूल के शिक्षक जगन्नाथ जी के बारे में तरह-तरह की बातें बताया करते थे।

वे कहते थे कि पुरी में बड़ा मंदिर है, इतना बड़ा मंदिर और कहीं नहीं है। मंदिर में श्रीजगन्नाथ जी अपनी बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलभद्र के साथ पूजे जाते हैं। जगन्नाथ जी का रंग काला है, उनकी आँखें गोल-गोल हैं। सुभद्रा जी का रंग पीला है और बलभद्र का रंग चाँदनी के फूल की तरह सफेद। वह छवि एक बार देख लेने के बाद फिर भुलाई नहीं जा सकती।सर यह भी कहते थे कि जगन्नाथ 'महाप्रभु' हैं, उनका प्रसाद 'महाप्रसाद' है, उनका मंदिर 'बड़ा मंदिर' है, उनका पथ 'विशाल पथ' (बोड़ो दांडो) है और उनका समुद्र 'महोदधि' है।मयूरभंज के ऊपरबेड़ा गाँव से पुरुषोत्तम क्षेत्र पुरी की दूरी बहुत थी। भला, देखने का अवसर मुझे कहाँ मिलता! किंतु जब मैं भुवनेश्वर गई और यूनिट-2 गर्ल्स हाईस्कूल में मेरा नामांकन हुआ, तब हॉस्टल में रहने लगी। उसके बाद मैंने पुरी, भुवनेश्वर और कोणार्क देखा। पहली बार जगन्नाथ दर्शन की स्मृति आज भी मेरे मन से मिटी नहीं है। इतना बड़ा मंदिर, बड़े-बड़े देवता! भला, यह सब कैसे भुलाया जा सकता है?

क्या भुलाई जा सकती है उनकी रथयात्रा? बारह महीनों में तेरह पर्व-त्योहार मनाए जाते हैं श्रीक्षेत्र में, लेकिन रथयात्रा की छटा तो निराली होती है। पूरे वर्ष भक्तगण मंदिर के भीतर जाकर महाप्रभु का दर्शन करते हैं, किंतु वर्ष में एक बार महाप्रभु अपने भव्य मंदिर से बाहर 'विशाल पथ' (बोड़ो दांडो) पर आते हैं और भक्तों को दर्शन देते हैं। तीनों ठाकुर चक्रराज सुदर्शन के साथ तीन रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर की ओर यात्रा करते हैं। वहाँ सात दिनों तक रहकर वापस लौट आते हैं। महाप्रभु का यह महापर्व अतुलनीय है।बचपन से मैं जगन्नाथ जी की भक्त हूँ। वे सर्वदा मेरे परम आराध्य हैं। मेरे जीवन के उत्थान और पतन के वे नियंता हैं। मेरे दुख-सुख के कर्ता-धर्ता हैं। जीवन में मैंने बहुत कष्ट भी सहे हैं। उन सब दारुण दुखों से मुझे महाबाहु ने उबारा है। मैं उनकी बेटी जो हूँ!राष्ट्रपति पद के लिए मुझे उम्मीदवार बनाए जाने की घोषणा होते ही मैंने महाप्रभु का स्मरण किया। मैंने प्रार्थना की  इतनी ऊँचाई पर मुझे ले जा रहे हो, प्रभु। पग-पग पर मुझे सहारा देना, सदा मेरे साथ रहना। उन्होंने मेरी प्रार्थना सुनी, और आज भी सुन रहे हैं।

राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार के रूप में दिल्ली में रहने के दौरान रथयात्रा का महापर्व आया, परंतु पुरी जाना संभव नहीं था। रथयात्रा के दिन तड़के मैं दिल्ली के हौजखास स्थित जगन्नाथ मंदिर गई और महाप्रभु के दर्शन किए। आनंद से मेरा मन भर गया। उनका आशीर्वाद मुझ पर बरस पड़ा। बड़े आत्मविश्वास के साथ मैंने अपना नामांकन पत्र दाखिल किया और पूरे उत्साह से चुनाव अभियान में भाग लिया।25 जुलाई, 2022 को संसद के सेंट्रल हॉल में शपथ लेने जाते समय मैं जगन्नाथ जी से प्रार्थना करती हुई जा रही थी। उनके आशीर्वाद से मेरा शपथ-पाठ बहुत अच्छी तरह संपन्न हुआ। राष्ट्रपति के रूप में मेरे प्रथम संबोधन के समय भी मानो वे मेरे साथ ही थे।पुरी जाकर महाप्रभु के दर्शन करने के लिए मेरा मन व्याकुल हो उठा। दिन बीतते चले गए, लेकिन मैं पुरी नहीं जा सकी। मुझे लगा कि बिना उनके बुलावे के कोई उनके पास कैसे जा सकता है! मैंने मन ही मन उनसे कहा  मेरा कोई दोष हो तो क्षमा करो, प्रभु। मुझे पुरी बुलाओ, दर्शन दो।

वे 'भाव' के ठाकुर हैं। मेरा 'भाव' कैसे नहीं समझते? कुछ ही दिनों में पुरी जाने का कार्यक्रम तय हो गया। वह दिन 10 नवंबर, 2022 का था। पुरी में उतरने के बाद कारकेड श्रीमंदिर की ओर चल पड़ा। जैसे ही कारकेड पुरी के प्रशस्त पावन पथ पर पहुँचा, मेरे भीतर एक अपूर्व भावना का संचार हुआ। यह विशाल पथ महाप्रभु जगन्नाथ का है। यहाँ प्रोटोकॉल की क्या आवश्यकता?पुरी तो क्षेत्रराज के रूप में प्रसिद्ध है। महाप्रभु देवाधिदेव हैं। इससे अधिक कुछ सोचने से पहले ही मैंने गाड़ी रुकवा दी। मेरी गाड़ी रुकते ही पीछे आ रही सारी गाड़ियाँ भी रुक गईं। किसी के कुछ समझने से पहले ही मैंने पावन पथ पर नंगे पैर चलना शुरू कर दिया। श्रीमंदिर लगभग दो किलोमीटर दूर था। मंदिर के नीलचक्र और पतितपावन ध्वज को देखते हुए मैं आगे बढ़ती चली गई।

पथ के दोनों किनारों पर खड़े बच्चों, महिलाओं, युवाओं, छात्रों और बुजुर्गों को नमस्कार करती हुई मेरा ध्यान केवल जगन्नाथ जी पर था। श्रीमंदिर के सिंहद्वार के पास पहुँचते ही मैं स्वयं को संभाल नहीं पाई। तब तक मैं खुद को भूल चुकी थी। पावन पथ की धूल में साष्टांग लेटकर मैंने महाप्रभु को प्रणाम किया। उसके बाद मंदिर में प्रवेश किया।

गर्भगृह में पहुँचकर चतुर्धा मूर्तियों के दर्शन करते ही मैं आनंद से अभिभूत हो गई। महाप्रभु जगत के नाथ हैं, अनाथों के नाथ हैं। जगत के लोगों का दुःख दूर करने के लिए वे सदा तत्पर रहते हैं। इसलिए उनकी गोल-गोल आँखों की पलकें कभी नहीं झपकतीं। उनके लिए छोटा-बड़ा कोई नहीं है। वे सबको समान दृष्टि से देखते हैं और समता के मंत्र से सबको अभिमंत्रित करते हैं।उनकी करुणा पाकर ही मैंने समाज के हर वर्ग की सेवा में स्वयं को समर्पित किया है। गोल-गोल आँखों वाले प्रभु की ओर देखते हुए मैंने करबद्ध होकर कहा— आपके आशीर्वाद से मेरा यह समर्पण भाव हमेशा बना रहे, हे महाबाहु। देश-दुनिया पर अपनी छत्रछाया बनाए रखें, हे कृपानिधि! यह कहते हुए मैं भक्तिभाव से विह्वल हो उठी।

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