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सवालों के गंभीर कठघरे में देश का विपक्ष

सत्ता परिवर्तन की आकांक्षा के नाम पर अराजक राजनीति

भारत में विपक्षी दलों की राजनीति पर बहस तेज़, प्रशांत भूषण और नेहा बोरा के हालिया बयानों से सत्ता परिवर्तन के तरीकों पर सवाल उठाए गए हैं।


सत्ता परिवर्तन की आकांक्षा के नाम पर अराजक राजनीति

विशेष टिप्पणी

सवालों के गंभीर कठघरे में देश का विपक्ष

प्रशांत भूषण के प्रति आभार! नेहा बोरा के प्रति भी आभार! और राहुल गांधी के प्रति तो कितनी बार आभार व्यक्त किया जाए? आखिर इन सबने एक बार फिर देश के सामने अपने विचारों, राजनीतिक प्राथमिकताओं और संघर्ष के तरीकों को लेकर बहस का अवसर तो दिया है।राजनीति में कभी-कभी विरोधी अपने राजनीतिक विरोधियों का सबसे बडा उपकार कर देते हैं और देश का भी अनजाने में भला ही कर देते हैं। वे कोई नया रहस्य उजागर नहीं करते, बल्कि अपने ही शब्दों से अपनी राजनीति का वह पक्ष सामने रख देते हैं, जिसे समझने के लिए जनता को अब तक अनेक संकेतों को जोड़ना पड़ता था।हाल के दिनों में प्रशांत भूषण के 'रिजीम चेंज' संबंधी बयान और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति से उभरी आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा की बांग्लादेश के युवा आंदोलन से प्रेरणा लेने संबंधी टिप्पणी ने यही बहस खड़ी की है। प्रशांत भूषण ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वे सत्ता परिवर्तन चाहते हैं और इसमें गलत क्या है। इससे पहले नेहा बोरा ने बांग्लादेश के 2024 के आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा था कि उसने रास्ता दिखाया है। इन बयानों के बाद देश में तीखी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं हुई।

लेकिन यहां एक बुनियादी प्रश्न है-सत्ता परिवर्तन का लक्ष्य और सत्ता परिवर्तन का तरीका, क्या दोनों को एक ही मान लिया जाए?
लोकतंत्र में सरकार बदलना न केवल वैध है, बल्कि लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण भी है। मतदाता सरकारों को बनाते हैं और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें सत्ता से बाहर भी करते हैं। प्रश्न यह है कि सत्ता परिवर्तन की कल्पना किस रास्ते से की जा रही है-मतपत्र से या हिंसक टकराव से, संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से या संस्थाओं को ध्वस्त करके, जनमत के सहारे या जनाक्रोश को अनियंत्रित अराजकता में बदलकर? यहीं से इस पूरे विवाद की गंभीरता आरंभ होती है।

बांग्लादेश का उदाहरण : प्रेरणा किस बात की? इस घटनाक्रम को एक आदर्श युवा क्रांति के रूप में प्रस्तुत करना उसके पूरे संदर्भ को अनदेखा करना होगा। प्रश्न यह है कि किसी दूसरे देश के
अनुभव से हम क्या सीखना चाहते हैं? क्या हम युवाओं की लोकतांत्रिक भागीदारी, भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज और शासन कीजवाबदेही से प्रेरणा लेते हैं? या फिर उस परिस्थिति से, जिसमें जनांदोलन, हिंसक टकराव और राजनीतिक अस्थिरता मिलकर सत्ता के अचानक पतन का का कारण बनते हैं।भारत बांग्लादेश नहीं है। यहां सत्ता परिवर्तन के लिए नियमित चुनाव, स्वतंत्र न्यायपालिका, संवैधानिक संस्थाएं और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार उपलब्ध हैं। इन संस्थाओं की कमियों पर प्रश्न उठाइए, उनमें सुधार की मांग कीजिए, लेकिन उनके स्थान पर अनिश्चितता और हिंसक टकराव को विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने से पहले उसके परिणामों पर गंभीरता से विचार कीजिए।

प्रशांत भूषण का 'रिजीम चेंज' शब्दों से आगे भी कुछ प्रश्न है
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण लंबे समय से शासन, न्यायपालिका, भ्रष्टाचार और संवैधानिक संस्थाओं से जुड़े प्रश्नों पर सक्रिय रहे हैं।इस बहस में कुछ प्रश्न अनुत्तरित नहीं छोड़े जा सकते। यदि चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी है, तो प्रमाण कहां हैं? यदि निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर संदेह है, तो उसके समाधान का संस्थागत रास्ता क्या है? यदि सरकार से असहमति है, तो जनता के सामने वैकल्पिक नीति और नेतृत्व क्या है? और यदि किसी आंदोलन का उद्देश्य केवल विरोध नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन भी है, तो उसके लोकतांत्रिक साधनों और मर्यादाओं को स्पष्ट करने में संकोच क्यों होना चाहिए? सरकार बदलने की मांग लोकतांत्रिक है, लोकतांत्रिक व्यवस्था को हिंसा से बदलने की कोशिश एक अलग और गंभीर प्रश्न है।

नेहा बोरा और आइसा
नेहा बोरा का नाम हालिया प्रदर्शनों और निर्वाचन आयोग के विरुद्ध उठे सवालों के कारण राष्ट्रीय चर्चा में आया है। वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से जुड़ी छात्र नेता और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष है। आइसा, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ी है। पार्टी की विचारधारा के मूल में नक्सल है। नेहा बोरा ने हाल ही में उमर खालिद और शरजीलइमाम की पैरवी कर वह स्वयं और उनका संगठन किसके साथ है इता दिया है। यही नहीं योगी आदित्यनाथ को गुंडा, दंगाई, लंपट कह कर अपने संस्कारों का भी परिचय दिया है।सत्ता परिवर्तन की आकांक्षा के नाम पर अराजक राजनीति अब यहां उत्तर राहुल गांधी को देना है कि क्या उनकी छात्र इकाई एन एस यू आई को उन्होंने भंग कर दिया है? उनके प्रिय कन्हैया कुमार अभी कहां हैं? यह प्रश्न केवल कांग्रेस का भी नहीं, भारत के प्रत्येक विपक्षी दल का है। संविधान केवल हाथ में रखने की पुस्तक नहीं है, वह राजनीतिक आचरण की कसौटी भी है। और इस कसौटी पर विपक्ष स्वयं कठघरे में है।
ये प्रश्न गंभीर है।

मौन नहीं, मुखर रहे देश
यह सुखद है देश की चेतना जागृत हो रही है। कॉकरोचों को देश के न केवल प्रबुद्ध समाज ने, बल्कि आम आदमियों ने अपने 'हीट' से बैचेन किया है। आवश्यकता इसको और तीव्र करने की है।

अतुल तारे
(लेखक स्वदेश के समूह संपादक हैं)

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