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लड़ते भाई, शेयरधारकों का डूबता पैसा

लड़ते भाई, शेयरधारकों का डूबता पैसा
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जिस देश के पास राम-लक्ष्मण जैसे आदरणीय और अनुकरणीय अग्रज और अनुज संबंधों के उदाहरण हों, वहां पर भाइयों के बीच कटुता कायदे से तो होनी ही नहीं चाहिए। पर रैनबैक्सी, रेलिगियर और फोर्टिस जैसी फार्मा और हेल्थ सेक्टर की शिखर और प्रतिष्ठित कंपनियों के प्रमोटर रहे भाइयों क्रमश: मलविंदर मोहन सिंह और शिवइंदर मोहन सिंह ने लगता है कि राम-लक्ष्मण के संबंधों से कुछ सीखा ही नहीं। अगर उनमें किसी मुद्दे पर मतभेद या मन-मुटाव था भी, तो वो 'घर' के भीतर ही सुलझ जाता तो बेहतर रहता। पर कॉरपोरेट की दुनिया में भाइयों या भाई-बहनों में विवाद की खबरें तेजी से बढ़ रही है। जाहिर है, प्रमोटरों की तनातनी से कंपनी का कामकाज, साख और मुनाफा प्रभावित होता है। उसके दूरगामी परिणाम होते हैं कंपनी के लिए। उदाहरण के रूप में शेयरधारकों को तत्काल ही नुकसान होने लगता है, क्योंकि कंपनी का ब्रांड खराब होने लगता है। इस दौरान प्रतिस्पर्द्धी कंपनियां भी आगे बढ़ने लगती हैं।

ताजा मामले में छोटे भाई शिवइंदर मोहन सिंह ने अपने ही बड़े भाई मलविंदर मोहन सिंह पर फोर्टिस को डुबोने का आरोप लगाया है। शिवइंदर कह रहे हैं कि रेलिगेयर और फोर्टिस में कुप्रबंधन से कंपनी, शेयरहोल्डर और कर्मचारियों को नुकसान हुआ। हालांकि अभी तक बड़े भाई ने अपना पक्ष नहीं रखा है। दरअसल कभी देश में चोटी पर रहे इस कॉरपोरेट समूह में पारिवारिक क्लेश का इतिहास बहुत पुराना है। मलविंदर और शिवंदर के पिता भाई परविंदर सिंह पर भी तमाम आरोप लगे ही थे। रैनबैक्सी के संस्थापक भाई मोहन सिंह ने अपने ही पुत्र परविंदर सिंह पर रैनबैक्सी पर कब्जा करने के आरोप लगाए थे। इनकी मृत्यु के बाद, मलविंदर-शिवइंदर के नियंत्रण में आ गई रैनबैक्सी। उन्होंने 2008 में जापान की प्रख्यात फार्मा कंपनी दाइची को इसे मोटे मुनाफे में बेचा। दोनों ने रैनबैक्सी को बेचने से पहले ही देश-विदेश में हास्पिटल चेन शुरू कर दी थी। इनके फोर्टिस नाम से अस्पतालों की तादाद में लगातार वृद्धि हो रही थी। इन्होंने टूटे दिलों को जोड़ने में ख्याति अर्जित कर चुके राजधानी के एस्कॉर्ट्स अस्पताल को भी खरीद लिया था। हालांकि यह भी तथ्य है कि जब इन बंधुओं ने रैनबैक्सी से अपनी सारी हिस्सेदारी को बेचा था तब भी इनकी कड़ी निंदा भी हुई थी। कॉरपोरेट जगत के जानकारों का तर्क था कि जिस समूह को इनके दादा भाई मोहन सिह ने दिन-रात मेहनत करके खड़ा किया और बढ़ाया, उनके पोतों को रेनबैक्सी को बेचने से बचना चाहिए था।

भारत के सबसे विशाल औद्योगिक घराने रिलायंस समूह में संस्थापक धीरूभाई अंबानी के साल 2002 में संसार से विदा लेने के बाद भी परिवार में बंटवारा हुआ। उनके दोनों पुत्रों क्रमश: मुकेश और अनिल के बीच विशाल साम्राज्य पर वर्चस्व की लड़ाई के लिए वो सब कुछ हुआ, जो न होता तो बेहतर रहता। आरोप-प्रत्यारोपों के दौर भी चले। आखिर रिलायंस समूह साल 2006 में दो फाड़ हो गया। एक की कमान मुकेश के पास आ गई और दूसरे की अनिल के पास। मुकेश के हिस्से में रिलायंस इंडस्ट्रीज आई, जो पेट्रोकेमिकल्स, तेल और गैस खनन आदि क्षेत्रों में कारोबार करती है। उधर, अनिल ने संभाला टेलीकॉम, पावर तथा वित्तीय सेवाओं से जुड़ी कंपनियों का नेतृत्व। स्वाभाविक है, अपने पुत्रों के बीच टकराव से इनकी मां श्रीमती कोकिलाबेन सर्वाधिक आहत थीं। अच्छी बात यह हुई आखिर मां के प्रयासों के चलते दोनों भाई फिर से साथ-साथ आ गए। अब दोनों अपने-अपने समूह चला रहे हैं।

मुंबई के रीयल एस्टेट सेक्टर की दिग्गज कंपनी हीरानंदानी कंस्ट्रक्शंस प्राइवेट लिमिटेड (एचसीपीएल) के प्रमुख निरंजन हीरानंदानी का अपनी पुत्री प्रिया हीरानंदानी से कटु संपति विवाद चला। प्रिया ने पिता और भाई दर्शन पर उसके साथ पैसे की धोखाधड़ी करने के आरोप लगाए थे। इनके विवाद को सुलझाने में अंतत: ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर की पत्नी चार्ली ब्लेयर को मध्यस्थता करनी पड़ी थी।

खैर,अब भी इस तरह के अनेक उदाहरण आपको मिल ही जाएंगे, जिधर भाई-भाई मिलकर काम कर रहे हैं। दोनों ही तरह के उदाहरण आपको मिल जाएंगे। पिता के न रहने के बाद भी भाई-भाई साथ काम कर रहे हैं, इसी तरह से पिता के नेतृत्व में भी भाई-भाई सक्रिय हैं। भारती एयरटेल समूह सबसे हटकर है। इसे तीन भाई क्रमश: सुनील भारती मितल, राकेश भारत्ती मितल और राजन भारती मित्तल चलाते हैं। टेलीकॉम के बाद अब इनका समूह रिटेल और इंश्योरेंस के क्षेत्र में भी बड़े पैमाने पर सक्रिय है।

यही स्थिति एस्सार समूह की भी है। एस्सार समूह में सारी कमान शशि और रवि रूइया के कंधों पर है। इस समूह की स्टील, उर्जा, शिपिंग वगैरह क्षेत्रों में तगड़ी साख है। एस्सार समूह करीब तीन दर्जन देशों में सक्रिय है। हालांकि अब शशि और रवि के भी बच्चे समूह में अहम दायित्वों का निर्वाह कर रहे है, पर एस्सार में किसी तरह के बंटवारे को लेकर दूर-दूर तक कोई चर्चा नहीं है। आज जिंदल समूह भी एक आदर्श समूह माना जाता है। समूह के संस्थापक ओम प्रकाश जिंदल के विमान हादसे में मारे जाने के बाद उनके चारों पुत्र क्रमश: पृथ्वी, सज्जन, रतन और नवीन अपनी-अपनी कंपनियों को देख रहे हैं। जिंदल समूह स्टील, पावर, सीमेंट क्षेत्रों में है।ओम प्रकाश जिंदल ने अपने जीवनकाल में ही बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से अपने समूह की कंपनियों को अपने पुत्रों के बीच बांट दिया था।

राजधानी के डीसीएम समूह के संस्थापक लाला श्रीराम की साल 1961 में मौत के बाद समूह के अध्यक्ष लाला भरत राम और उनके अनुज लाला चरतराम उपाध्यक्ष बने। दोनों में कभी कोई विवाद नहीं रहा। दोनों के सदैव राम-लक्ष्मण की तरह संबंध बने रहे। दोनों भाइयों में कभी किसी मसले पर विवाद सामने नहीं हुआ। जब दोनों के बच्चे बड़े हो गए तो दोनों भाइयों ने समूह का प्रेम से बंटवारा कर लिया। इन दोनों ने न केवल डीसीएम समूह का विस्तार किया बल्कि शिक्षा,कला और संस्कृति के क्षेत्र में भरपूर योगदान दिया। राजधानी में विश्वविख्यात श्रीराम कालेज आफ कॉमर्स, लेडी श्रीराम कालेज, श्रीराम कला केन्द्र आदि इन्होंने स्थापित किए।

अब बात सवा सौ साल पुराने आरपीजी समूह की कर लेते हैं। इधर भी हर्ष और संजीव गोयनका के बीच आरपीजी समूह का उनके पिता रामप्रसाद गोयनका ने बंटवारा कर दिया था। कोलकाता के सबसे पुराने व्यावसायिक परिवारों के जाने माने उद्योगपति और आरपीजी समूह के संस्थापक रामप्रसाद गोयनका का कुछ वर्ष पूर्व निधन हो गया था। टायर से लेकर संगीत तक कई व्यापारों में अपना हाथ आजमाने वाले गोयनका को भारत का 'टेकओवर स्पेशलिस्ट' भी कहा जाता था। हालांकि दोनों भाई पहले से ही समूह की अलग-अलग कंपनियों को देख रहे थे, पर पिता रामप्रसाद गोयनका के जीवनकाल में दोनों भाइयों ने समूह में बंटवारे की औपचारिकता पूरी कर ली थी।

दरअसल ये बातें तो प्रमोटरों को अच्छी तरह से समझनी होगी कि उनके बीच झगड़े होने से उनके समूहों या कंपनियों को चौतरफा हानि होती है। वे जिसे अपना समूह या कंपनी मानते हैं, उसे खड़ा करने में बैंकों का लोन, मजदूरों का श्रम और शेयरधारकों की मेहनत का पैसा भी तो लगा होता है। इसलिए उन्हें अपने व्यक्तिगत विवादों को तुरंत सौहार्दपूर्ण वातावरण में हल कर लेने चाहिए। जब कोई भी काम शुरू किया जाता है तो वह छोटा ही होता है। एक ही व्यक्ति उसका स्वामी भी होता है। लेकिन, जब काम बढ़ता है तो लोग जुड़ते-चले जाते हैं, सभी के श्रम शक्ति, समय, पैसे और छोटे-छोटे प्रयासों से कंपनी बड़ी बनती है और जब वह बड़ी बन जाती है तो व्यक्तिगत संपत्ति नहीं रह जाती। समाज की संपत्ति हो जाती है। अतः बेहतर यही होगा कि प्रमोटर परिवार यह न सोचें कि कोई समूह या कंपनी का पूर्ण स्वामित्व उनका ही है और अभी भी वे उसके प्रोपराइटर (मालिक) ही हैं।

(लेखक: आर.के.सिन्हा, राज्यसभा सदस्य हैं)

Updated : 2018-09-08T07:23:59+05:30
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आर. के. सिन्हा

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