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सत्याग्रह आश्रम स्मारक कोचरब

सच्चिदानंद जोशी

सत्याग्रह आश्रम स्मारक कोचरब

अहमदाबाद की यात्रा के दौरान इस बार साबरमती आश्रम जाने का मन हुआ। रात को भोजन के समय योजना बनी कि सुबह नाश्ते के बाद साबरमती आश्रम जाएंगे और वहीं से गुजरात विद्यापीठ भी जाएंगे। भोजन के समय हमारे साथ इतिहासकार रिजवान कादरी भी थे। उनका आग्रह था कि इस यात्रा में हम थोड़ी देर उनके यहाँ भी जायें और उनके दुर्लभ दस्तावेजों के संग्रह को देखें। रिजवान कादरी जी के बारे में अभी इतना ही बताना पर्याप्त होगा कि वे अहमदाबाद के स्वामीनारायण महाविद्यालय में इतिहास के एसोसिएट प्रोफेसर हैं और उन्होंने गांधी जी और सरदार पटेल जी के बारे में बहुत गहन अध्ययन किया है। वे कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट में सलाहकार रहे हैं और हैं भी। उनके बारे में तफसील से फिर कभी।

'ज्यों ही रिजवान जी ने सुना कि हम साबरमती आश्रम जा रहे हैं तो उन्होंने तुरंत टोका और कहा 'साबरमतीÓ तो आप जाएंगे ही। जाना भी चाहिए। लेकिन आपको अगर गांधी जी से मिलना है तो कोचरब आइए सत्याग्रह आश्रम में। मेरा घर वहीं नज़दीक है।

रिजवान जी की बात में दम था, इतना कि हमने कार्यक्रम बना डाला उसी हिसाब से। शाम को पहले सत्याग्रह आश्रम फिर रिजवान जी का घर और फिर सीधे एयरपोर्ट। लेकिन जरा जल्दी आइयेगा ताकि आप दिन के उजाले में आश्रम देख सकें। सच बड़े सुकून की जगह है।

कोचरब आश्रम अहमदाबाद के पालड़ी इलाके में है। ये मैन रोड पर एक बंगला है जहाँ गांधी जी अफ्रीका से भारत आने के बाद लगभग डेढ़ साल रहे थे। साबरमती आश्रम से कोई ढाई तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित ये बंगला कई ऐतिहासिक क्षणों का साक्षी है। साथ ही ये साक्षी है बैरिस्टर गांधी के बापू में बदलने का, बैरिस्टर के कर्मवीर में बदलने का।


साबरमती आश्रम में हम लोग सुबह गए। मेरे साथ मेरे सहयोगी प्रो रमेश चंद्र गौर , प्रो मोली कौशल, प्रो प्रतापनानंद झा और कर्नल रांगनेकर भी थे। अच्छी खासी भीड़ थी। स्कूल के बच्चे, सैलानी, सप्ताहांत मनाने आये शहर के लोग। मेला सा था। सब कुछ था वहाँ। लेकिन जो देखने या महसूस करने की चाहत लिए हम गए थे वो नहीं था।

शाम तय समय से करीब आधा घंटा देरी से हम कोचरब आश्रम पहुंचे। रिजवान जी वहाँ पर हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। उनके साथ थे रमेश भाई जो उस परिसर की देखभाल करते थे। उनका परिचय रिजवान जी ने कुछ यूं दिया। ये रमेश भाई हैं। पिछले बारह-चौदह साल से आश्रम की देखभाल कर रहे हैं। गांधी को यहां वापस लाने का काम इन्होंने किया है। मुझे तो यहां उनकी अनुभूति होती ही है।

रमेश भाई ने बड़ी विनम्रता से अपनी प्रशंसा को दरकिनार करते हुए कहा- मैं कुछ नहीं करता। बस आपको 1915 में ले जाने की कोशिश करता हूं जब बापू यहां आए थे।

सत्याग्रह आश्रम में ऐसा कुछ नहीं है जिसे कहा जाए कि वो गांधी जी का है। लेकिन फिर भी ऐसा लगता है कि वहाँ हर जगह गाँधी जी का स्पर्श है। रमेश भाई ने इसी संदर्भ में एक किस्सा सुनाया। उन्होंने कहा कि एक आदमी अक्सर यहाँ आता है और पूरे परिसर में नंगे पैर घूमता है। मैंने एक बार उससे कहा- भाई तू नंगे पैर क्यों घूमता है। कांटे , पत्थर चुभ जाएंगे। कोई कीड़ा काट लेगा तो उस आदमी ने जवाब दिया- इस जगह पर गांधी जी घूमे थे न। मैं सोचता कि कभी तो ऐसा होगा कि मेरे पैर ठीक उसी जगह पर पड़ेंगे जहाँ गाँधी जी के पैर पड़े थे। मैं तो यही सोचकर रोमांचित होता हूँ और खुद को धन्य मानता हूं। रमेश भाई की बात का गूढ़ अर्थ आपको तब समझ में आता है जब आप उस परिसर के एक एक कोने को न सिर्फ देखते हैं बल्कि महसूस करते हैं।


गाँधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में अपने सत्याग्रह के तप से पूरे भारतीय समाज को एकजुट करके अन्याय के विरुद्ध खड़ा कर दिया था। जनरल स्मात्ज़ जैसे क्रूर शासक को भी अपने निर्णय बदलने पर मजबूर कर दिया था। दक्षिण अफ्रीका में किये गए सत्याग्रह के प्रयोग को अब भारत भूमि पर चरितार्थ करना था और इसका मनन , नियोजन और क्रियान्वयन गाँधी जी ने इस स्थान पर रह कर किया था। यहां उनकी स्मृति भौतिक रूप में भले ही न हो लेकिन उनकी स्मृति, चेतना यहाँ कण कण में अनुभूत होती है। इस अनिभूति को रमेश भाई ने एक और किस्से के माध्यम से बताया। उन्होंने कहा कि एक आदमी आता है कभी कभी और घंटा आधा घंटा बैठ कर चला जाता है। मैंने एक बार उससे पूछा कि तुम क्यों इस तरह आकर चुपचाप बैठ जाते हो तो वो बोला कि जब भी मन में कोई दुविधा होती है या जीवन में समस्या होती है तो मैं यहां आकर बैठ जाता हूँ। मुझे मेरे सवाल का जवाब मिल ही जाता है। कहते- कहते रमेश भाई के आंख की कोर भी गीली हो गयी थी।

हम लोग पांच-छह लोग थे और हम सबने उस जगह को अपने-अपने ढंग से अनुभूत किया। मेरे मन में भी कहीं किसी कोने में गांधी को महसूस कर पाने का अहसास था। सांझ का सूरज ढल रहा था और उसकी किरणें आश्रम के प्रवेश द्वार पर पड़ रही थी। सब कुछ इतना निर्मल और शांत था कि वहां से निकलने का मन ही नहीं हो रहा था। गाँधी जी से जुड़े कई सारे क्षण इस आश्रम में सजीव हो उठे थे और हम उन्हें बटोरने में लगे थे। रिजवान जी हमें याद न दिलाते कि हमे जाना भी है तो न जाने और कितनी देर हम वहीं रह जाते।

अगली बार जब आप अहमदाबाद जाएं तो कुछ देर के लिए सही कोचरब के सत्याग्रह आश्रम जरूर जाकर आइयेगा।

(लेखक इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र नई दिल्ली के सदस्य सचिव हैं।)

Updated : 16 Feb 2020 5:31 AM GMT
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