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आखिर क्यों सिमट रही है पत्र-पत्रिकाओं की दुनिया

आखिर क्यों सिमट रही है पत्र-पत्रिकाओं की दुनिया
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वेब डेस्क। हिंदुस्तान के एक बड़े प्रकाशन समूह ने पिछले दिनों जब अपनी एक 60 वर्ष पुरानी सुरुचिपूर्ण, साहित्यक, सांस्कृतिक हिंदी पत्रिका कादम्बनी को बंद करने का फैसला किया तो आजकल के चलन के अनुसार सोशल मीडिया पर बयानों का तूफान उमड़ पड़ा। इनमें अधिकांश लोग, इस और इस जैसी तमाम दूसरी पत्रिकाओं के पाठक और लेखक थे लेकिन एक बड़ा तबका पत्रिकाओं और समाचार पत्रों के फीचर पृष्ठों से जुड़े हुए उन संपादकों का भी था जिन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान अपनी-अपनी रचनात्मक सोच और नजरिए के साथ हिंदी पाठक को साहित्य की कतिपय क्लिष्टता से हटकर रोचक तरीके से उपयोगी सामग्री देने के लिए कड़ी मेहनत की थी।

ऐसे लोगों की तादाद भी कम नहीं थी जो हिंदी के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए समाचार पत्र-पत्रिकाओं के बड़े समूहों में कार्यरत, मैनेजमेंट की पढ़ाई किए हुए, उन ब्रांड एम्बेसडरों को दोषी ठहरा रहे थे जिनकी समझ से हिंदी की ऐसी पत्रिकाओं का अब ना तो कोई औचित्य रहा है और ना ही कोई पाठक। निष्कर्ष का पैमाना, उनकी दृष्टि में इन पत्रिकाओं से उपार्जित होने वाला राजस्व या रेवेन्यू था, क्योंकि यह एक सर्वविदित तथ्य है कि हिंदी की इन सांस्कृतिक पत्रिकाओं को बमुश्किल विज्ञापन मिलते हैं और वह भी दोयम दर्जे के, जिनमें मसाले,नमकीन या ताकत बढ़ाने वाली आयुर्वेदिक औषधियों वाले विज्ञापनों की ही बहुलता दिखाई देती है।

आज के समय की आधुनिक तकनीक के साथ,बढिय़ा न्यूज प्रिंट पर एक रंग-बिरंगी पत्रिका निकालने का जो खर्च होता है यदि उसके आधार पर पत्रिका का मूल्य निर्धारण किया जाए तो पत्रिका की लागत इतनी अधिक हो जाएगी कि आम पाठक उसे अफोर्ड ही नहीं कर सकेगा। इसलिए तमाम दूसरे प्रिंट मीडिया प्रोडक्ट्स की तरह इन पत्रिकाओं का आर्थिक आधार भी इन में प्रकाशित होने वाले विज्ञापन ही हुआ करते हैं। लेकिन यदि हम पिछले दो ढाई दशक की ओर मुड़कर देखें तो बंद होने वाले हिंदी पत्र-पत्रिकाओं की यह सूची काफी लंबी और चौंकाने वाली नजऱ आएगी। तथ्य यह भी है कि बंद हुईं कई पत्र पत्रिकाओं के सामने कोई बहुत बड़ा आर्थिक संकट भी नहीं था क्योंकि वह इतने बड़े समाचार पत्र समूह का हिस्सा थीं कि छोटे-मोटे घाटे वाली पत्रिकाएं उनके संस्थान के आर्थिक स्वास्थ्य के लिए कोई विशेष महत्व नहीं रखती थीं और वह उन्हें बख़ूबी चालू रख सकते थे। विचारणीय बात यह है कि, देश में इतना व्यापक हिंदी भाषी क्षेत्र होने पर भी हिंदी की पत्र और पत्रिकाएं निरंतर क्यों बंद हो रही हैं? उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान की हिंदी पट्टी के अलावा भी देश के बहुत सारे दूसरे हिस्सों में भी हिंदी भली प्रकार से पढ़ी-लिखी और समझी जाती है और वहां के आम नागरिक हिंदी की पत्रिकाओं को रुचि से पढ़ते भी हैं। हिंदी भाषी राज्यों की यदि हम बात करें तो इन राज्यों में देश के राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिकों द्वारा अपने संस्करण प्रारंभ किए जाने के बावजूद भी अंग्रेजी पत्रकारिता बहुत अधिक जड़ें नहीं जमा सकी हंै और इसीलिए अंग्रेजी के बहुत सफल समाचार पत्र भी चलन में नहीं है। इस परिस्थिति के बावजूद भी हिंदी पत्रकारिता और हिंदी पत्र-पत्रिकाओं द्वारा इन क्षेत्रों में भी अधिक फल फूल नहीं पाना चिंतनीय है। हिंदी का क्षेत्र बहुत व्यापक होने के बाद भी दूसरी प्रादेशिक भाषाओं की तुलना में हिंदी पत्रकारिता आज भी अंग्रेजी पत्रकारिता के मुकाबले मजबूत जड़ें नहीं जमा सकी है। जबकि प्रादेशिक भाषाओं के सामान्य अखबार भी अंग्रेजी अखबारों के मुकाबले मजबूती से जमे हैं। इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं, यह विचारणीय है। एक गंभीर पहलू यह भी है कि जिन पत्र समूहों में अंग्रेजी के साथ हिंदी अखबार निकलते हैं वहां हिंदी की उपेक्षा भी होती है। इस उपेक्षा का कोई आधार नहीं होता है इसलिए अच्छे संस्थान के हिंदी अखबार भी पनप नहीं पाते हैं। उन्हें पूरा स्टाफ ही नहीं मिलता लेकिन साथ ही कहीं-कहीं यह भी शिकायत आती है कि अच्छे वेतन और सुविधा के बाद भी हिंदी वाले इतनी मेहनत या प्रदर्शन नहीं कर पाते हैं। इस पर गहराई से विचार करके गुणवत्ता में सुधार की जरूरत है। हिंदी के अलावा अन्य प्रादेशिक भाषाओं यानी बांग्ला, मराठी, तेलुगू, तमिल, मलयालम, गुजराती आदि के भाषा भाषियों की स्थिति भी ऐसी है कि इस भाषा के बोलने वाले पहले अपनी भाषा की पत्र पत्रिका पढ़ते हैं उसके बाद अंग्रेजी अखबार पढ़ते हैं। कितना ही पढ़ लिख जाए अपनी भाषा की पत्रिका या अखबार पढऩा बंद नहीं करते। हिंदी भाषी इलाकों में यह देखने में आता है कि जहां अच्छा पढ़ लिख गए और आर्थिक स्थिति कुछ सुधरी अंग्रेजी अखबार की ओर आकर्षित हो जाते हैं यह लगता है कि शायद हिंदी पढऩा पिछड़ेपन और हीनता की निशानी है ऐसी हीन भावना दूसरे भाषा भाषियों में कम देखने को मिलती है।

हमें यह सोचने की भी जरूरत है कि पत्र-पत्रिकाएं जन भावनाओं और जागरण का माध्यम क्यों नहीं बन सकी हैं? श्रेष्ठ पठनीय सामग्री क्यों नहीं दे पा रही हैं? क्या वे ऐसी सामग्री परोस रही हैं जो जन भावनाओं के अनुकूल नहीं है? क्या पत्र पत्रिकाएं अपनी जमीन से हटकर सामग्री दे रही हैं, जिससे वे पाठकों से जुड़ नहीं पा रही हैं। जो भी हो यह गंभीरता से विचार करने की बात है। एक और चिंतनीय पहलू यह भी है कि आज हिंदी पत्रकारिता में संपादक नाम की संस्था, 'इंस्टिट्यूशन ऑफ एडिटरÓ खो रही है। पहले अखबार संपादक के नाम से जाने पहचाने जाते थे, आज अधिकांश उद्योग समूह के नाम से जाने जाते हैं। आज संपादक या प्रबंध संपादक के बतौर मालिक या उनके बेटों के नाम छापने का दौर है क्योंकि वह पूंजी लगाता है। वैसे इनमें अधिकांश योग्य भी हैं। लिखने के लिए ऐसे बहुत से लोग मिल जाते हैं जिनका नाम नहीं जाता।अंग्रेजी लेखकों के सिंडिकेटेड लेखों के अनुवाद करते-करते हिंदी वाले ओरिजिनल लिखना ही भूल जाते हैं। इस सबसे पत्रकारिता के स्तर और विश्वसनीयता पर असर होता है।

कादम्बनी के संपादक रहे वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु नागर जी ने कादम्बनी बंद होने पर सोशल मीडिया पर जो टिप्पणी डाली थी वह हालत को काफी हद तक सही बयां करती है, साठ साल का सफर पूरा कर 'कादम्बिनीÓ आखिर लॉकडाउन की बलि चढ़ा दी गई- बाल पत्रिका 'नंदनÓ के साथ। टाइम्स ऑफ इंडिया समूह की राह पर देर से ही सही, हिंदुस्तान टाइम्स समूह भी आ गया। जब मृणाल पांडेय हिन्दुस्तान की प्रमुख संपादक बन कर आने के करीब दो साल बाद 2002 के अंत में प्रबंधन को यह विश्वास दिला पाईं कि कादम्बिनी और नंदन का भी कायाकल्प करना जरूरी है। मैंने मृणाल जी के सहयोग और समर्थन से पत्रिका का कायाकल्प करने

की कोशिश की। भूत-प्रेतों, ज्योतिष, बाबाओं का निष्कासन पहले ही अंक से किया, गुणाकर मुले जैसे अत्यंत विश्वसनीय विज्ञान लेखक से लिखवाया। आधुनिक और महत्वपूर्ण लेखकों से इसे जोडऩे का सिलसिला बहुत आगे तक बढ़ा। भीष्म साहनी, कृष्णा सोबती आदि सब बड़े लेखक जुड़ते चले गए। लेकिन अंतत: पत्रिका को समुचित महत्व नहीं मिलने के चलते मुझे संपादन छोडऩा पड़ा।

यह दुखद है,लेकिन संभावित था,कुछ अन्य पत्रिकाएं भी लाइन में हैं। सवाल यह है कि क्या दोष सिर्फ प्रकाशकों का है? शायद नहीं,हम सब हिन्दी के पाठक, हिंदी के लेखक और हिन्दी के संपादक भी इसके लिए काफी कुछ उत्तरदायी हैं। हमने हमेशा अंग्रेजी पत्रकारिता की तुलना में स्वयं को दोयम दर्जे का समझा, हम उन्हीं के अनुगामी रहे और धीरे-धीरे हमारी भूमिका अनुवादक तक सीमित होती गई। हमारे कई प्रतिष्ठित हिंदी समाचार पत्र और लेखक आज भी अंग्रेजी पुस्तकों की समीक्षा लिख और छाप कर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते हैं। पत्र पत्रिकाओं में अक्सर लेखक को स्टोरी लाइन किसी अंग्रेजी आर्टिकल की तर्ज पर बताई जाती है।सामग्री चयन की नीति में मैनेजमेंट के उन युवा प्रबंधकों की दखलअंदाजी होती है जिनका हिन्दी के गौरव से कोई वास्ता नहीं होता। अंग्रेजी के सेलेब्रिटी लेखकों को अनुवाद कर के छापने वाले हिन्दी के संपादक क्या यह बताएंगे कि अंग्रेजी की कितनी पत्र-पत्रिकाएं हिन्दी लेखक को अनुवाद करके छापते हैं या हिन्दी की कितनी किताबों की समीक्षा छापते हैं? हम अभी भी यदि गुटबाजी,खेमेबाजी और पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर, खुले दिलो दिमाग के साथ हिन्दी पत्रिकाओं की पुनस्र्थापना का प्रयास करें तो यह असम्भव नहीं है।

- दिनेश पाठक

Updated : 20 Sep 2020 2:10 PM GMT

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