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बच्चों का खेल नहीं है ऑनलाइन शिक्षा

प्रमोद भार्गव

बच्चों का खेल नहीं है ऑनलाइन शिक्षा

स्वदेश वेबडेस्क। ऑनलाइन यानी डिजिटल शिक्षा का हश्र सिर मुड़ाते ही, ओले पडऩे की शक्ल में दिखाई देने लगा है। लॉकडाउन के बीच शुरू हुआ ऑनलाइन पढ़ाई का चलन स्कूली बच्चों पर भारी पडऩे लगा है। नतीजतन उन्हें कई-कई घंटे कंप्यूटर, लैपटॉप और मोबाइल पर आंखें गढ़ानी और दिमाग पर जोर डालना पड़ रहा है। इससे विद्यार्थी अनावश्यक रूप से एकांगी और चिंतित दिखाई देने लगे हैं। अपने बच्चों में अचानक आए इन लक्षणों की शिकायतें अनेक अभिभावकों ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय और केंद्रीय विद्यालय संगठन को की हैं।

देश में शिक्षा और शिक्षा पद्धति को लेकर एक विचित्र विरोधाभास और दुविधा की स्थिति बनी हुई है। एक आदर्श और गुणकारी शिक्षा व्यवस्था में कौन से तत्व शामिल होने चाहिए, इस संदर्भ में पिछले 72-73 साल में कोई एक निश्चित धारणा नहीं बन पाई है। मंत्रालय को अभिभावकों की जो थोक में शिकायतें मिली हैं, उनमें कहा है, बच्चों को विद्यालयों की ओर से घंटों ऑनलाइन पढ़ाया जा रहा है। होमवर्क भी उसी अनुपात में दिया जा रहा है। परिणामस्वरूप बच्चे दिन-दिन भर कंप्यूटर, लैपटॉप और मोबाइल से चिपके रहते हैं। इस अनावश्यक व्यस्तता के चलते उनका व्यवहार बदल रहा है। उनमें चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है। वे हठी और गुस्सैल भी हो रहे हैं। मानसिक बोझिलता से जुड़ा यह एकांगीपन निकट भविष्य में उनके स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

दरअसल, शैक्षिक उपकरण, कंप्यूटर, लैपटॉप और मोबाइल निर्माता व इंटरनेट प्रदाता कंपनियां कोरोना विपत्ति को व्यापारिक लाभ की दृष्टि से देख रही हैं। इसलिए प्रचार-प्रसार माध्यमों के जरिए ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि शालेय और उच्च शिक्षा के अध्ययन-अध्यापन में कोरोना के चलते जो बाधा आई है, उसकी भरपाई तकनीकी माध्यमों से की जा सकती है। इस लिहाज से यह नारा भी गढ़ लिया कि धीरे-धीरे चलो स्कूल से, पढ़ो ऑनलाइन से।

हालांकि कंपनियों ने इस दिशा में पहल पहले से ही कर दी है। नतीजतन कई ऑनलाइन प्रारूपों में ई-लर्निंग सामग्री बाजार में उपलब्ध है। वह भारत ही है, जिसमें सबसे विशाल के-12 शिक्षा पद्धति एक दशक पहले विकसित हो चुकी है। इसे किंगरगार्डन और 12 वर्षीय बेसिक शिक्षा के नाम से जाना जाता है। के-12 शिक्षा स्वयंप्रभा के 32 चैनलों में से 12 चैनलों के जरिए स्कूलों में दी जाएगी। पीएम-ई-विद्या के तहत वन क्लास-वन चैनल योजना है। इसमें पहली कक्षा से बारहवीं कक्षा तक के लिए अलग-अलग चैनल होंगे। रेडियो पर भी कक्षाएं चलाने की तैयारी की जा रही है, जिससे दूर-दराज के अंतिम छोर पर रह रहे छात्रों को शिक्षा मिल सके। यह सामग्री सीडी एप और सीबीएसई पाठ्यक्रम की वेबसाइटों पर उपलब्ध रहेगी।

दरअसल भारत में ही नहीं दुनिया में छात्र को पूर्व से सुनिश्चित कर दिए गए अध्ययन-अध्यापन तक ही संयमित रखा जाता है। आज का शिक्षक हो या फिर प्राध्यापक, वह भी विविधतापूर्ण अध्यनशीलता से दूर है। इसलिए शिक्षक और छात्र निर्धारित शिक्षा से आगे की बात सोच ही नहीं पाते ? कमोवेश यही मानसिकता अभिभावकों की है। वे भी अपनी संतान को चिकित्सा, अभियंता सरकारी अधिकारी या बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकर बना देने का लक्ष्य निर्धारित कर लेते हैं। जबकि किसान, सैनिक लेखक-पत्रकार और आदर्श मूल्यों के प्रवचनकर्ता भी देश के सामाजिक ताने-बाने के लिए आवश्यक होते हैं। आधी-सदी बीतने के बाद यह वास्तविकता एक बार फिर से मुखर होकर स्थापित हुई है कि कोरोना संकट काल में अर्थव्यस्था को आधार केवल खेती-किसानी के बूते मिला है। जबकि बीते पचास सालों में सबसे ज्यादा तिरस्कार व अवमूल्यन इसी व्यवसाय का हुआ है। आज अपने बालक को अन्नदाता बनाने की बात शिक्षक और अभिभावक में से कोई नहीं करता ?

शिक्षा के क्षेत्र में ऑनलाइन द्वार खोलने की बड़ी तैयारी है। लेकिन शिक्षा की स्थापित कर दी गईं विषमताएं और संकीर्णताएं तोडऩे का कोई उपाय नहीं है। क्या गुरू से दूर एक कोने में मोबाइल स्क्रीन के सामने बैठे शिष्य के मन-मस्तिष्क में क्या है ? यह जब ठीक से आज का शिक्षक नहीं समझ पा रहा, तो तकनीक कैसे समझेगी ? दरअसल किसी उपकरण में भर दिए गए ज्ञान की एक सीमा होती है और वह तय कर दिए गए प्रोग्रामिंग के अनुसार चलती है। उसमें कोई लचीलापन नहीं होता। जबकि विद्यार्थी की बुद्धि के विकास का क्रम, कोई एक सीधी रेखा में नहीं चलता। ज्ञान नदी की धारा की तरह प्रवाहमान है। उसमें नए-नए रूप लेते और जीवन-मूल्यों को देखते हुए वैचारिक बदलाव आता है।

उपरोक्त कथन के सत्यापन के लिए दुनिया के अत्यंत सफल और आविष्कारक व्यक्ति बिल गेट्स की जीवनी पर दृष्टि डालते हैं। हम सब जानते हैं कि आज बिल गेट्स दुनिया के अमीरतम लोगों में से एक हैं। बिल ने उच्च शिक्षा के लिए कॉलेज में प्रवेश तो लिया था, लेकिन शिक्षा पूरी नहीं कर पाए थे। वे कॉलेज से आकर अपने घर के गैरेज में घुस जाते थे और कोरे कागजों पर आड़ी-तिरछी लकीरें खींचकर किसी दार्शनिक के लहजे में धीर-गंभीर वैचारिक तल्लीनता में लग जाते थे। इस गैरेज में कंप्यूटर नहीं, लेकिन जिज्ञासा थी, सोच थी। आखिरकार, बिल की सोच ने आकार लिया और कंप्यूटर की वृद्धि अर्थात सॉफ्टवेयर का आविष्कार कर डाला। मसलन वास्तविक बुद्धि ने कृत्रिम बुद्धि की सजीव रचना कर दी। लेकिन हम हैं कि ऑनलाइन शिक्षा के बहाने नैसर्गिक वृद्धि पर अंकुश लगाने के उपाय तलाश रहे हैं ? डिजिटल शिक्षा से जुड़ा यह एक बड़ा प्रश्न है, जो विचारणीय है।

अब इससे जुड़े विषमता के पहलू पर आते हैं। दिल्ली के गैर सरकारी संगठन स्माइल फाउंडेशन ने हाल ही में एक सर्वेक्षण किया है। इसके अनुसार लैपटॉप, कंप्यूटर की बात तो छोडि़ए 56 प्रतिशत विद्यार्थियों के पास इंटरनेट की सुविधा वाला फोन भी एक सपना है। बाल अधिकारों के लिए काम करने वाली इस संस्था ने कोविड-19 परिदृश्य जमीनी स्थिति एवं संभावित समाधान शीर्षक वाले अध्ययन में 42,831 बच्चों को शामिल किया। यह अध्ययन 23 राज्यों में किया गया। निष्कर्ष के अनुसार 31.01 प्रतिशत बच्चों के घर में टीवी नहीं है। 43.99 प्रतिशत छात्र-छात्राओं के पास स्मार्टफोन उपलब्ध है। 43.99 प्रतिशत विद्यार्थियों के पास बेसिक फोन है। 12.02 प्रतिशत छात्र ऐसे भी हैं, जिनके पास किसी भी प्रकार का मोबाइल, कंप्यूटर या लैपटॉप नहीं हैं। ऐसे में शालेय शिक्षा से जुड़े करीब 25 करोड़ और उच्च शिक्षा में अध्ययनरत दस करोड़ छात्र-छात्राओं को ऑनलाइन शिक्षा से जोड़ पाना संभव होगा ? चुनांचे ऑनलाइन शिक्षा शुरू करने से पहले, डिजिटल विषमता दूर करने की जरूरत है। अन्यथा, शैक्षिक विसंगति और बढ़ती जाएगी।

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

Updated : 26 July 2020 3:21 PM GMT
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स्वदेश वेब डेस्क

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