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लहर किनारे, ठीकरों के लिए सिर ढूंढने के बजाय सिर सलामत रखें

गिरीश उपाध्याय

लहर किनारे,  ठीकरों के लिए सिर ढूंढने के बजाय सिर सलामत रखें
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वेबडेस्क। उपचुनाव के बाद मध्य प्रदेश में राजनीति और प्रशासन की गाड़ी पटरी पर लौटने लगी है। उपचुनाव न होने तक जो संशय की स्थिति थी कि ऊंट किस करवट बैठेगा, वह अब नहीं रही है। इस बीच उपचुनाव के नतीजों को लेकर तरह-तरह की बातें और विश्लेषण भी सामने आ रहे हैं। कांग्रेस के लिहाज से इसमें पूर्व मुख्य्मंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यहक्ष कमलनाथ व पूर्व मुख्यूमंत्री दिग्विजयसिंह के भविष्यक को तलाशा जा रहा है, वहीं भाजपा के लिहाज से मुख्यवमंत्री शिवराजसिंह चौहान और राज्यैसभा सांसद ज्योलतिरादित्यय सिंधिया के कद को।

दरअसल उपचुनाव में सीटों की संख्याा को लेकर जो भी विश्लेषण हो रहा है उसमें एक बुनियादी खामी है। मैंने महसूस किया है कि यह खामी ऐसे 'राजनीतिक विश्लेैषण'में हर बार रहती है। विश्लेोषण करने वाला पता नहीं क्योंन यह मानकर चल रहा होता है कि चुनाव लड़ने वाली पार्टियों में से कोई एक पार्टी सारी की सारी सीटें ले जाएगी और दूसरी पार्टी सारी की सारी सीटें हार जाएगी। उपचुनाव से पूर्व भी ऐसी ही बातें हुई थीं कि कांग्रेस को सारी की सारी सीटें जीतनी होंगी या कि सिंधिया को अपना कद बचाना है तो उन्हेंस अपने सारे के सारे लोगों को चुनाव जिताना होगा।

राजनीति में ऐसे सौ फीसदी परिणाम कभी नहीं आते। उपचुनाव के जो भी नतीजे आए हैं उन्हेंप समग्र रूप से देखा जाना चाहिए। वैसे भी इस बार के चुनावी संघर्ष में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही तमाम ऊपरी दावों के बावजूद, परिणामों को लेकर भीतर से आशंकित थे। इसलिये नतीजे दोनों को चौंकाने वाले भी हैं और थोड़ा बहुत संतोष देने वाले भी। कांग्रेस को यह सोचकर खुद को तसल्लीर देनीचाहिए कि सरकार में न रहने और पुख्ताय सांगठनिक ढांचा न होने के बावजूद उसने 28 में से 9 सीटें जीत लीं। इनमें से आगर सीट तो उसने भाजपा से छीनी है।

दूसरी तरफ भाजपा को भी खैर मनाना चाहिये कि अप्रत्याशित स्थितियों और भीतरी चुनौतियों के बावजूद वह अपनी साख और सरकार दोनों बचाने में कामयाब रही। जो लोग इस उपचुनाव से सिंधिया का कद माप रहे हैं उन्हें यह भी याद रखना होगा कि सिंधिया अब भारतीय जनता पार्टी में हैं और भाजपा के ही सांसद हैं। सिंधिया को यदि हार का जिम्मेदार बताया जाएगा तो उन छींटों से भााजपा भी नहीं बच सकेगी। खुद सिंधिया और भाजपा को यह बात अच्छीा तरह पता थी कि वे सारी की सारी सीटें जीतने की स्थिति में नहीं हैं।

सिंधिया के खिलाफ जहां व्यक्तिगत गुस्सा था वहीं भाजपा के सामने खुद अपने ही कार्यकर्ताओं की नाराजगी मुंह बाए खड़ी थी। उपचुनाव खत्मअ हो जाने के चंद घंटों के भीतर ही सुमावली में गजराजसिंह सिकरवार और सांची में डॉ. गौरीशंकर शेजवार जैसे कद्दावर नेताओं के खिलाफ अनुशासन की कार्रवाई शुरू करना इसी बात का संकेत है कि भाजपा संगठन ने परोक्ष रूप से भितरघात की बात मानी है। संगठन शुरू से ही ऐसी भितरघात पर नजर रखे हुए था।

अक्स र चुनावों के बाद समीक्षा की बात होती है और उस दौरान यही कहा जाता है कि पार्टी हार के कारणों की समीक्षा करेगी। कोई पार्टी या उम्मी दवार क्यों हारा इसके कारणों का पता लगाना भी चाहिए। लेकिन मेरे विचार से इस प्रक्रिया में थोड़ा बदलाव जरूरी है। हार के कारणों के साथ साथ पार्टियों को जीत के कारणों की भी समीक्षा करनी चाहिए। ऐसा करने से उन्हेंय अपनी उस ताकत का पता चलेगा जो चुनाव जिताने में मददगार होती है। नकारात्मक कारणों पर छाती पीटने के बजाय सकारात्मोक पहलुओं को मजबूत करना जरूरी है।

जीत के कारणों की समीक्षा के दौरान आए ब्योूरे का विश्लेाषण, चुनाव में टिकट देने से लेकर प्रचार और मतदान तक की गतिविधियों के सकारात्म क पहलुओं को सामने ला सकता है। इन्हेंं ध्यावन में रखते हुए भविष्यस में चुनाव की रणनीति को और पुख्ता तरीके से तैयार किया जा सकता है। दरअसल परिणाम आने के बाद हार को हावी होने देना किसी भी पार्टी को कमजोर ही करता है। यह नहीं भूलना चाहिए कि न तो जुमलों के जुलाब से हार की कब्ज। ठीक होती है और न ही जयजयकार के जीरामन से जीत की भूख मिटती है। ठीकरा फोड़ने के लिए सिर ढूंढने के बजाय ठीकरा और सिर दोनों को सलामत रखने के जतन हों तो बेहतर है।

Updated : 20 Nov 2020 1:00 AM GMT

स्वदेश वेब डेस्क

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