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भावुक और लोकप्रिय राजनेता थे माधवराव सिंधिया

  • पुण्यतिथि पर विशेष
  • विवेक कुमार पाठक, स्वतंत्र पत्रकार

भावुक और लोकप्रिय राजनेता थे माधवराव सिंधिया
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स्वदेश वेबडेस्क। साल 2001 में अपनी मां और भाजपा की शैशवास्था की साक्षी रहीं राजमाता विजयाराजे सिंधिया के निधन पर जिस कदर माधवराव सिंधिया फूट फूटकर रोए थे उससे लाखों लोगों ने देख और जान लिया था कि वे बहुत ही भावुक किस्म के व्यक्ति थे।

वे ग्वालियर और गुना लोकसभा से निरंतर जीतते रहे। 1984 के चुनाव में जिस तरह उन्होंने देश के तत्कालीन बड़े नेता एवं 1998 में देश के प्रधानमंत्री बने स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी को बड़े अंतर से हराया था उससे साफ हो गया था कि ग्वालियर के लोगों में माधवराव सिंधिया के प्रति अपनेपन का भाव था। यहां की जनता ने राष्ट्रीय राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी की जगह माधवराव की जीत पर मुहर लगाई थी।

दोनों ही दल उन्हें नमन कर रहे

आगे भी ग्वालियर और गुना के मतदाता सिंधिया परिवार को अपने बीच का ही मानते हुए उन्हें दशकों तक लगातार जिताते रहे मगर 2019 में मोदी लहर और फिर एक बार मोदी सरकार के नारे ने माधवराव सिंधिया के पुत्र व तत्कालीन कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया का विजयी रथ रोक लिया। उन्हें भाजपा के डाॅ. के. पी. यादव ने हराया। करीब एक साल बाद आज अप्रत्याशित रुप से सब कुछ बदल गया है। के. पी. यादव और ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा के भगवा ध्वज को थामे हुए हैं। ज्योतिरादित्य अब भाजपा से राज्यसभा सांसद हैं।गौर करने वाली बात ये है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में आने के बाद भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों पार्टियां उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें नमन कर रही हैं।

मप्र के मुख्यमंत्री के रुप में दर्ज होते

निश्चित ही दलों से उपर ऐसी राजनैतिक स्वीकार्यता एवं आदरभाव माधवराव सिंधिया की लोकप्रियता का उदाहरण है। निश्चित ही माधवराव सिंधिया ने अपने पूरे राजनैतिक जीवन में गरिमापूर्ण राजनीति की। वे अगर एग्रेसिव और राजनैतिक उठापठक में सिद्ध होते तो संभवत वे भी चुरहट नरेश अर्जुन सिंह की तरह मप्र की सामान्य ज्ञान किताबों में मप्र के मुख्यमंत्री के रुप में दर्ज होते।

ग्वालियर वासियो द्वारा निरंतर जिताए गए

राजीव गांधी की पसंद होने के बाबजूद वे दो दफा मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बनते बनते रह गए। अर्जुन सिंह के आशीर्वाद से मुख्यमंत्री बने 10 साल राज करने वाले दिग्विजय सिंह ग्वालियर चंबल में अपना नेटवर्क जमा पाए तो इसके पीछे सिंधिया की उदार राजनीति भी बड़ा कारण रही। माधवराव सिंधिया ने दिग्विजय सिहं की बढ़ती ताकत को उस तरह राजनैतिक जवाब नहीं दिया जिस तरह उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कुछ साल पहले ग्वालियर चंबल में जवाबी सभाओं और रैलियों से दिया था। सिंधिया एग्रेसिव राजनेता नहीं रहे। वे पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हाराव के समय में भी राजनैतिक निशानों का शिकार होने से खुद को नहीं बचा पाए। उन्हें मप्र विकास कांग्रेस बनाकर इसी दौर मे पंजे के छोड़कर उगते सूरज के नाम पर चुनाव लड़ना पड़ा। वे लोकप्रिय थे और विकास के प्रति उत्साहित रहते थे इसलिए ग्वालियर वासियो द्वारा निरंतर जिताए भी गए।

टॉप 5 मंत्रियों में से किसी भी स्थान पर होते -

सिंधिया अगर उस प्लेन दुर्घटना का शिकार न होते तो कांग्रेस के दस साल की सरकार में डॉ.मनमोहन सिंह से लेकर टॉप 5 मंत्रियों में से किसी भी स्थान पर हो सकते थे। प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी पसंद तय करते समय सोनिया गांधी उनके नाम पर भी गंभीरता से विचार करतीं। माधवराव सिंधिया के अचानक यूं जाने के बाद कांग्रेस की केन्द्रीय राजनीति में ग्वालियर के प्रतिनिधित्व में निसंदेह एक रिक्तता आयी थी। उनके बेटे और सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया उस स्थान को पूरा करने में काफी हद तक सफल हुए हैं। अपने राजनैतिक जीवन में वे पहले कांग्रेस में थे एवं अब भाजपा में मध्यप्रदेश के नेता हैं।

ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि माधवराव सिंधिया की राजनैतिक विरासत और महल की लोकप्रियता को ज्योतिरादित्य सिंधिया कितना आगे लेकर जाते हैं। फिलहाल ग्वालियर के पूर्व सांसद स्वर्गीय माधवराव सिंधिया को फिर एक बार पुष्पों के साथ पुण्यस्मरण।


Updated : 2020-09-30T15:18:21+05:30
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स्वदेश वेब डेस्क

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