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षड्यंत्र विदेशी चंदे का

सुरेश हिन्दुस्थानी

षड्यंत्र विदेशी चंदे का
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-भारत में एनजीओ की समानांतर सरकार

-संस्कृति के विरोध में गैर सरकारी संस्थाओं का दुष्चक्र

भारत का भाग्योदय संकेत इन दिनोंं बहुत सी शक्तियों के लिए उनके दिन पूरे होने का संकेत भी है। इसलिए इस विजय यात्रा को रोकने के लिए तरह तरह के षड्यंत्र सामने आ रहे हैें। देश के भीतर और बाहर रहकर काम करने वाली ऐसी शक्तियों को पहचानना और उनसे मुकाबले के लिए सिद्ध होना आज की बड़ी आवश्यकता है। ऐसी ही एक महाशक्ति है जिसे हम एनजीओ के लोकप्रिय नाम से जानते हैं। इन गैरसरकारी स्वयंसेवी संस्थाओं के कारनामे और इन्हें विदेशों से मिलने वाली मोटी आर्थिक सहायता बरसों से चर्चा का विषय रही है लेकिन पहली बार इनके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई का साहस शासन ने दिखाया है। आमतौर पर भारत में इस प्रकार के एनजीओ के पीछे जहां चर्च की शक्तियां दिखाई देती हैं वहीं इस्लामिक संस्थाएं भी ऐसे कार्यों में पीछे नहीं हैं। केन्द्र सरकार द्वारा विदेशों से प्राप्त धन पर कठोर कदम उठाए जाने के बाद इन संस्थाओं के कर्ताधर्ताओं के पेट में मरोड़ होने लगी है। इसके साथ ही जिन कथित बुद्धिजीवियों, संचारकर्मियों, माओवादियों और प्रशासनिक अधिकारियों को इनसे मोटा लाभ होता रहा है, वह भी अब छटपटाहट की मुद्रा में हैं। भारत में कार्य कर रहे इन एनजीओ को विदेशों से करोड़ों रुपए की सहायता अधिकतर यूरोप, अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात से आती है। इस सहायता का एक बड़ा अंश भारत में सांप्रदायिक सौहार्द खराब करने और मतांतरण करने में मुख्य भूमिका निभाता है।

भारत को तोडऩे के लिए काम कर रहे एनजीओ कभी ऐसे आंदोलनों के पीछे भी दिखाई देते हैं, जिसके कारण साम्प्रदायिक उन्माद फैलता है और राष्ट्रीय प्रवाह से जुड़े समाज को भ्रमित कर उकसाने का काम किया जाता है। भारतीय समाज को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने के खेल में भी ऐसे एनजीओ प्रवीण हैं। तो उसके बाद भारतीय समाज को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने का दुष्चक्र रचा जाता है। उसके बाद विदेशों से भारत के विरोध में बयान भी दिलवाए जाते हैं, इन बयानों को मीडिया भी खूब प्रचारित करता है। आखिर भारत में रहकर विदेशी धन की चाह में एनजीओ के माध्यम से ऐसे खेल कब तक चलते रहेंगे? जो भारत को तोडऩे के लिए काम कर रहे हैं।

देश विरोधी षड्यंत्र करने वाले इन एनजीओ को संचालित करने वाले व्यक्तियों की पृष्ठभूमि का अध्ययन किया जाता है, तब यह स्पष्ट दिखाई देता है कि यह सभी वैचारिक रूप से कहीं न कहीं जुड़े हुए दिखाई देते हैं। इसलिए इनके द्वारा चलाए जा रहे षड्यंत्रों को सामूहिक अभियान कहा जाए तो ही ठीक होगा। वाममार्गी विचारधारा के लोग भी ऐसे ही एनजीओ के माध्यम से भारत को सांस्कृतिक धारा से काटने का दुष्चक्र कर रहे हैं। भीमा कोरेगांव की घटना और इसके पीछे खड़े शहरी नक्सलियों की गिरफ्तारी इस बात का प्रमाण है।

बड़ी विसंगति यह है कि इनमें से कई संस्थाओं को मिलने वाली विदेशी आर्थिक सहायता घोषित तौर पर भारत में मतांतरण के काम में भी लग रही है। यह सबसे बड़ा अराष्ट्रीय कार्य है। महात्मा गांधी को विदेशी एजेंट कहने वाली और अपनी पहली ही पुस्तक पर बुकर सम्मान पाने वाली अरुंधती रॉय का एनजीओ, ग्रीनपीस, तीस्ता सीतलवाड़ के सबरंग सहित दो एनजीओ और इंदिरा जयसिंह का लायर्स कलेक्ट्रिव के विरोध में अब कार्यवाही की गई है। तीस्ता के एनजीओ को अमेरिकी फोर्ड फाउंडेशन से विदेशी सहायता मिलती थी, उस पर सरकार ने रोक लगा दी। अब इस संगठन का पंजीयन समाप्त होने के कारण तीस्ता भी सरकार के कदम से नाराज हैं। इस सूची में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल का नाम भी लिया जा सकता है। उनके द्वारा स्थापित की गई परिवर्तन और कबीर नाम की दो संस्थाओं ने भी देशी और विदेशी आर्थिक सहायता लेने से किसी प्रकार का परहेज नहीं किया। अमेरिका की फोर्ड फाउंडेशन ने इनकी संस्था की भी भरपूर मदद की है। उनकी संस्था Óकबीर ने फोर्ड फाउंडेशन से वर्ष 2005 में 1,72000 एवं वर्ष 2006 में 1,97,000 डालर प्राप्त किए। उन्होंने वर्ष 2010 में भी लाखों डालर फोर्ड फाउंडेशन से प्राप्त किए। इन सभी अनुदानों का क्या उपयोग हुआ और और किन उद्देश्यों के लिए प्राप्त किए गए, आज तक रहस्य बने हुए हैं।

इन संस्थाओं के आर्थिक व्यभिचार को लेकर सरकार कोई बड़ा कदम उठाती है, तब ये जनता को भ्रमित करने के उद्देश्य को लेकर सरकार विरोधी कार्य करते हैं। पुरस्कार वापसी भी ऐसे ही कार्यों का परिणाम है। नक्सली विचारधारा के पक्ष में खड़े होने वाले ये लोग ही समानांतर सरकार चलाने की तरह कार्य करते रहे हैं। अब जरूरत इस बात की है कि इन एनजीओ का काला चिट्ठा जनता के सामने भी आना चाहिए।

6 हजार एनजीओ को नोटिस

सरकार ने पिछले तीन वर्षों या उससे भी अधिक समय से अपनी वार्षिक आय एवं खर्चों का विवरण न देने वाले 6,000 के करीब गैर सरकारी संगठनों को कारण बताओ नोटिस जारी किया। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी सर्कुलर में कहा गया है कि 5,992 संगठनों को कारण बताओ नोटिस भेजा गया है, क्योंकि इन संगठनों ने पर्याप्त मौका दिए जाने के बावजूद विदेशी योगदान नियमन अधिनियम के तहत अपना वार्षिक रिटर्न अपलोड नहीं किया है। उनमें शिक्षा एवं मिशनरी न्यास और श्राइन प्रबंधन से जुड़े संगठन भी शामिल हैं। कथित रूप से राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में संलिप्त पाए जाने वाले 25 गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) को एफसीआरए पंजीकरण से वंचित कर दिया था। साथ ही पंजीकरण के लिये आवेदन करने में विफल रहे 11 हजार से अधिक एनजीओ की मान्यता भी खत्म कर दी गई थी।

क्या है एफसीआरए

एफसीआरए का संबंध 70 के दशक के उत्तराद्र्ध में देश में लगे आपातकाल से है। विदित हो कि विदेशी सहायता नियामक कानून अर्थात एफसीआरए को पहली बार वर्ष 1976 में लाया गया था। इसका उद्देश्य राजनैतिक दलों, न्यायाधीशों, सांसदों और यहां तक कि कार्टून बनाने वालों को भी विदेशी अनुदान लेने से रोकना था। गौरतलब है कि कार्टूनिस्ट को भी इस कानून के दायरे में लाना यह दिखाता है कि यह राजनैतिक विरोध को दबाने का एक प्रयास भी था। देश की आंतरिक सुरक्षा में विदेशों से प्राप्त सहयोग की चिंताओं के बीच एफसीआरए दलगत राजनैतिक विरोध को दबाने का भी हथियार था।

Updated : 2018-10-02T19:03:16+05:30
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Swadesh Digital

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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